बड़ा खेल : उच्च शिक्षा मे कोर्ट के आदेश से भी खेल। जीरो टोलरेंस का निकाला तेल

हाई कोर्ट की अवमानना राज्य सरकार शासन और उच्च शिक्षा निदेशालय की मिलीभगत नियमितीकरण प्रक्रिया निरस्त होने के बावजूद नहीं हटाए गए 175 असिस्टेंट प्रोफेसर भ्रष्टाचार का एक बहुत बड़ा मामला शासन में चल रहा है। माननीय उच्च न्यायालय नैनीताल के आदेश के बाद भी शासन में उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों एवं कुछ मंत्रियों […]

हाई कोर्ट की अवमानना राज्य सरकार शासन और उच्च शिक्षा निदेशालय की मिलीभगत नियमितीकरण प्रक्रिया निरस्त होने के बावजूद नहीं हटाए गए 175 असिस्टेंट प्रोफेसर
भ्रष्टाचार का एक बहुत बड़ा मामला शासन में चल रहा है। माननीय उच्च न्यायालय नैनीताल के आदेश के बाद भी शासन में उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों एवं कुछ मंत्रियों द्वारा अनिवार्य शैक्षिक अर्हता पूरी ना करने वाले और नियम विरुद्ध क्लास वन की सेवा के समकक्ष संविदा शिक्षकों को पिछले दरवाजे से राजकीय महाविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर विनियमित कर दिया गया था।
न्याय विभाग ने भी बताया था अवैध
माननीय मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन एवं न्यायमूर्ति रमेश खुल्बे जी की संयुक्त खंडपीठ ने मामले का तत्काल संज्ञान लेते हुए 15 फरवरी 2019 को विनियमितीकरण की इस प्रक्रिया को संविधान के अनुच्छेद 14 के साथ ही माननीय उच्चतम न्यायालय उमा देवी बनाम कर्नाटक सरकार के ऐतिहासिक फैसले के खिलाफ मानते हुए एक माह के अंदर शासन को संबंधित 175 असिस्टेंट प्रोफेसरों को हटाने के निर्देश दिए थे।
 शासन द्वारा समय-समय पर संबंधित असिस्टेंट प्रोफेसरों से जाने किस अज्ञात प्रलोभन मे माननीय उच्च न्यायालय की अवमानना करते हुए मामले को रफा-दफा किया जा रहा है।
16अगस्त को सचिवालय के उच्च शिक्षा सेवा अनुभाग 2 से माननीय उच्च न्यायालय के आदेश का अनुपालन करते हुए संबंधित 175  अयोग्य असिस्टेंट प्रोफेसरों को हटाने का आदेश निर्गत किया जा रहा था। परंतु प्रभावित अयोग्य असिस्टेंट प्रोफेसरों ने यह आदेश रुकवा दिया है।
17 अप्रैल 2018 को हाईकोर्ट ने जब यह सेवाएं समाप्त कर दी तो सरकार ने न्याय विभाग को बीच का रास्ता निकालने के लिए यह मामला न्याय विभाग को रेफर कर दिया लेकिन न्याय विभाग ने भी इसे अवैध मान लिया।
 यह मामला सरकार की जीरो टोलरेंस पॉलिसी पर करारा तमाचा है। इस मामले में सरकार के खिलाफ जल्दी ही हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर होने जा रही है। ऐसे कई दर्जन मामले हैं जब लोग सरकारों से न्याय की मांग करते हैं, उनकी न्याय पूर्ण मांग पूरी ना होने पर लोग हाईकोर्ट जाते हैं। न्यायपालिकाएं उनके पक्ष में फैसला देती हैं, लेकिन सरकार अपनी हठधर्मिता दिखाते हुए अपने ही निर्णय पर अडिग रहकर बाद में मुंह की खाती है।
 सरकार पिछले काफी दिनों से खुद को नियम कानूनों से ऊपर मानकर चलने लगी है यही कारण है कि सरकार पर जन विरोधी होने का दाग गहराता जा रहा है।

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