कोरोना के कारण लौटे लोगों को क्या यहीं रोक पाएंगे हम !

कोरोना के बाद क्या ?

नवल खाली
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कोरोना के कहर ने कयामत की कगार पर इंसानों को ला खड़ा कर दिया है ।
डर, भय , खौप का माहौल तो है ही ,साथ ही चिंता है पेट की , चिंता है रोजगार की।
कि कोरोना के कहर से तो जैसे तैसे हम लोग निपट जाएंगे पर कोरोना के बाद क्या??
ये यक्ष प्रश्न आज उत्तराखंड के उन तमाम युवाओ के सामने भी खड़ा है जो रिवर्स पलायन करके आज गांवो में लौट चुके हैं ।

कभी एक अदद रोजगार की तलाश में ही तो उनकी जवानी तो यहाँ से रुखसत हुई थी ।

किसी को भी अपनी मातृभूमि से विदा होना अच्छा नही लगता । देश प्रदेशो में रह रहे लोगों को अपनी भूमि की खुद तो लग ही जाती है।

हालांकि अभी कोरोना का काल तो चल ही रहा है पर हजारों की सँख्या में गांवो में लौट चुके युवाओं को अपने रोजगार की भी चिंता लगातार बनी हुई है ।
क्योंकि उत्तराखंड के पहाड़ी गाँव अपनी विभिदता,पर्यावरण और भौगोलिक परिस्थितियों की वजह से आज कोरोना से कोसों दूर हैं।

ऐसे में ये प्रश्न हम अभी से उठाना चाहते हैं कि कोरोना के बाद रोजगार की दिशा में क्या होगा ?
और क्या होना चाहिए ?

हालांकि सरकार अभी मनरेगा में रोजगार की बात तो कर रही है पर इस 100 दिन के रोजगार से क्या इस महंगाई में परिवार चल पाएगा? यह भी विचारणीय है।

आप सबका ध्यान पहले एक महत्वपूर्ण बिंदु पर आकृष्ट करना चाहेंगे कि-
जैसा कि आप जानते हैं कि कोरोना के बीच जब से जमाती शब्द का एक धर्मविशेष से तालुक जुड़ा है तो लोगों ने नजीबाबाद की सब्जियों को भी ना करना शुरू कर दिया है । राजनीतिक वर्ग के कुछ लोगों ने तो इस पर अपनी राजनीति भी शुरू कर दी है । सोशल मीडिया से भी क़ई बुद्धिजीवी कह रहे हैं कि नजीबाबाद से आने वाले सब्जी के ट्रकों से आने वाली सब्जी की जगह स्थानीय सब्जियां खाएं ।
उनकी ये हवा हवाई बात तो ठीक है पर उन्हें यह भी सोचना होगा कि वो केला ,अनार ,अनानास ,अंगूर , किन्नू , सेब जैसे फलों को कहां से मंगवाएँगे ?
इसके लिए मंडियों पर तो निर्भर रहना ही होगा ।
पर हां जो चीजें पहाड़ी जलवायु के अनुकूल हैं उनका प्रचुर मात्रा में उत्पादन हो सकता है।
जो सरिया, सीमेंट, राशन के ट्रक पहाड़ो से वापसी में खाली जाते हैं उनमें इन पहाड़ो से भी वापस कुछ न कुछ जाय ,ऐसी ठोस नीति की आवश्यकता होगी ।

क्या हो नीति ?
इस नीति में उत्तराखंड के उन सभी बेरोजगारों की काउंसलिंग ब्लॉकवार की जाय ,जो स्वरोजगार चाहते हैं ।
फिर उनकी कैटगिरी बनाई जाए ।
मसलन एक ही ग्रामसभा के 5 युवकों ने डेरी की मांग की है तो उनको उस डेरी के लिए कम से कम दो सालों के लिए बिना ब्याज का ऋण उपलब्ध करवाया जाए ।
और पंचायत अधिकारी उसकी माॅनिटरिंग भी तय करें।
इसी हिसाब से अन्य स्वरोजगार सब्जी , मशरूम , बकरी पालन ,मुर्गी पालन जैसे स्वरोजगार माध्यमो में लोन के लिए लचीलापन रखकर उनको प्रमोट किया जा सकता है ।

एक सबसे अहम और महत्वपूर्ण विषय यह भी हो कि पहाड़ी हर उस क्षेत्र का अलग से ब्लूप्रिंट तैयार हो जिसकी उत्पादन क्षमता अलग अलग है । मसलन जैसे किसी बेल्ट में आलू होते हैं ,कहीं प्याज ,लहसुन तो कहीं कुछ और ,इनकी भी कैटगिरी बनाकर ठोस नीति बनाने की आवश्यकता होगी ।
दूसरा महत्वपूर्ण विषय यह है कि पहाड़ी क्षेत्रों में तत्काल प्रभाव से सरकार को चकबंदी लागू करनी चाहिए ताकि सब्जी ,फल आदि के क्लस्टर तैयार हो सकें ।

तीसरा महत्वपूर्ण बिंदु है बंदर और सुंवरो से कैसे बचा जाए ?

क्या वन विभाग का काम सिर्फ पेड़ों का आबंटन ही है या इन जानवरों के उन्मूलन के लिए कोई ठोस नीति भी ?

बंदर ,सुवरों के लिए हरीश रावत सरकार ने बात तो की पर वो सिर्फ हवा हवाई ही साबित हुई ।

बंदर, जंगली सुअरों के लिए अनिवार्य रूप से बाड़े बनाये जाएं उनका नाम बाड़े न रखकर जू रखा जाय ताकि उनको देखने भी लोग आएं ।
बंदर खाते कम हैं और नुकसान ज्यादा करते हैं । उनके भोजन की व्यववस्थाएँ बनाने के लिए भले ही कृषि उदपादको से टैक्स ले लिया जाय पर उनका उन्मूलन आवश्यक रूप से किया जाय ।

साथ ही नाई ,मोटर मेकेनिक , दर्जी जैसे स्वरोजगार भी किये जा सकते हैं पर इस तरफ पहाड़ी युवाओ का झुकाव कम लगता है । क्योंकि उन्हें इस काम मे शरम का सा आभास होता प्रतीत होता है ,जबकि नाई अब अत्याधुनिक सैलून हो चुका है और सबसे ज्यादा मुनाफा भी इसी में है ,पचास पैंसे की ब्लेड , दस पैंसे की कैंची घिसाई , दो रुपये का क्रीम ,पाउडर लगाकर, साठ से सौ रुपये तक की कमाई इसी धंधे में है।
मोटर मेकेनिक वाले स्वरोजगार में अच्छा मुनाफा है ।

सरकार से ज्यादा इच्छा शक्ति अब इस प्रदेश के युवाओं में चाहिए होगी ।
उन्हें खुलकर स्वरोजगार पर बहस करनी होगी । उन्हें खुद ही नए प्लान भी बनाने होंगे ।
इस प्राकृतिक रिवर्स पलायन के बाद पलायन आयोग का तो अब कुछ काम रहा नहीं को अब उसे इसी काम मे लगा देना चाहिए कि पहले वो बेरोजगारों का एक सही व सटीक आंकड़ा बनाने में अभी से जुट जाय फिर सरकार एक ठोस नीति बनाकर उसे धरातल पर उतारे ।
बड़े शहरों और कस्बों में एक पहाड़ी मार्केट अनिवार्य रूप से हो।  जैसे देहरादून में तिब्बती मार्केट है, उसी तर्ज पर बड़े शहरों में ये पहाड़ी मार्केट सरकार उपलब्ध करवाये ताकि उत्पादन के साथ साथ पहाड़ी युवा विपणन से भी जुड़कर स्वरोजगार करें ।

इन सारी प्रक्रियाओं में समय तो लगेगा पर यदि चरणबद्ध तरीके से यह सब किया जाय तो आने वाला समय उत्तराखंड के लिए एक स्वर्णिम युग होगा। जब यहां का युवा अपने ही घर मे रहकर स्वरोजगार कर सकेगा और वीरान पहाड़ फिर से आबाद हो सकेंगे ।

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