कोर्ट के आदेश व ट्रांसफर एक्ट की धज्जियां उड़ा रहे शिक्षा विभाग के अधिकारी

मालूम हो कि आचार संहिता में प्रदेश की हरीश रावत सरकार ने कुछ गंभीर बीमार शिक्षकों के साथ-साथ लगभग 500 प्राथमिक शिक्षकों के तबादले उनका संवर्ग परिवर्तन किए बिना ही एक निर्धारित समय अवधि के लिए नियम विरुद्ध किए थे। वर्तमान की जीरो टोलरेंस बताने वाली भाजपा सरकार ने इन तबादलों को लेकर हरीश रावत सरकार पर धांधली के गंभीर आरोप लगाए थे तथा अन्य शिक्षकों ने भी इनका खुलकर विरोध किया था।
देहरादून जनपद में राजधानी में बड़ी संख्या में तैनात शिक्षकों के कारण अन्य पात्र शिक्षकों के समायोजन में समस्या आ रही है। इस समस्याओं को देखते हुए देहरादून के प्राथमिक शिक्षक संघ द्वारा भी इन शिक्षकों को उनके मूल तैनाती स्थलों पर वापसी के लिए लगातार सरकार पर दबाव बनाया जा रहा है।


इसी क्रम में त्रिवेंद्र रावत सरकार ने इन तबादलों को निरस्त करते हुए इन शिक्षकों को उनके मूल तैनाती वाले स्थलों पर वापसी का आदेश 25 अप्रैल 2018 को कर दिया था, किंतु इन शिक्षकों ने अपनी तिकड़मबाजी लगाते हुए उच्च न्यायालय नैनीताल में इस आदेश पर रोक लगवाकर वर्तमान तैनाती स्थलों पर महीनों तक बने रहे, लेकिन न्यायालय द्वारा रोक हटाकर स्थानांतरण एक्ट में परिभाषित गंभीर बीमारी द्वारा अधिक शिक्षकों को राहत प्रदान करते हुए 26 अक्टूबर 2018 को बाकी सभी की याचिका निरस्त कर दी और मूल तैनाती स्थलों पर बहाल कर दिया।


सूत्रों की मानें तो ऊंची पहुंच वाले लोगों की पत्नियों के स्थानांतरण हुए हैं, जिनको सरकार का राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है। इसलिए इन शिक्षकों को स्थलों पर रखने के लिए अलग-अलग बहाने बना कर शिक्षा विभाग द्वारा बार-बार आदेश निकाली जा रहे हैं। इससे सरकार की मंशा पर भी सवाल खड़े होते हैं तथा जीरो टोलरेंस की सरकार बैकफुट पर नजर आती है।


प्रारंभिक शिक्षा निदेशालय के सूत्रों द्वारा ज्ञात हुआ है कि 1 जुलाई 2019 को गंभीर बीमारी वाले शिक्षकों की सूची शासन को उपलब्ध कराई गई है। जिसके सोशल मीडिया में वायरल होने के बाद संज्ञान में आया है कि उस सूची में अनेक शिक्षक ऐसे हैं जो स्थानांतरण एक्ट में परिभाषित बीमारी के अंतर्गत नहीं आते हैं, लेकिन निदेशालय के अधिकारियों की मिलीभगत के कारण उनके नाम सूची में शामिल किए गए हैं। अब वायरल सूची को देखकर अन्य शिक्षक भी जुगत लगाकर राज्य मेडिकल बोर्ड का प्रमाण पत्र बनाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं तथा अपने नामों को गंभीर बीमारी वाली सूची में शामिल करवाने की जुगत में लगे हुए हैं।
सूत्रों की मानें तो इन शिक्षकों में एक्ट के अनुसार लगभग ६० से 70 शिक्षक ही गंभीर बीमारी वाले हैं, लेकिन निदेशालय के अधिकारी अपनों को बचाने के लिए सामान्य बीमारी वाले शिक्षकों के नाम भी गंभीर बीमारी वाली सूची में शामिल कर शासन को गुमराह कर रहे हैं।
पर्वतजन न्यूज पोर्टल में इस प्रकरण पर 5 जुलाई 2019 को समाचार प्रसारित किए जाने के बाद शिक्षा विभाग के अधिकारी हरकत में आ गए हैं। सूत्रों से ज्ञात हुआ है कि अपर निदेशक प्रेम रावत द्वारा इन शिक्षकों को मूल तैनाती स्थलों के लिए कार्य मुक्त करके वापस भेजे जाने हेतु शासन से दिशा-निर्देश मांगे गए हैं।
अब देखना है कि स्थानांतरण एक्ट के अनुसार गंभीर बीमार शिक्षकों को राहत देते हुए शासन से अगला आदेश बाकी शिक्षकों को यथावत रखने का निकलता है या कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए इनको मूल तैनाती स्थलों पर वापस करने का निकलता है।

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