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धिक्कार : मात्र 18 हज़ार रुपये प्रति एंबुलेंस बचत के कारण 717 परिवार 73 दिन से धरना-अनशन पर

ब्रेकिंग
दुःखद पुलिस ने किया बल लाठी का प्रयोग। सभी कर्मचारी सुद्धोवाला जेल मे गये। चम्पावत की 2 महिला कर्मचारी बेहोशदोनों दून हॉस्पिटल मे शिफ्ट

आज 108 सेवा के बर्खास्त कर्मचारियों ने अपनी सुनवाई के लिए  सचिवालय कूच का कार्यक्रम रखा था लेकिन पुलिस ने इनको परेड ग्राउंड पर रोक दिया तो यह सब वहीं पर नारेबाजी करने लगे। कनक चौक पर इनकी पुलिस से हलकी झड़प भी हुई तो लाठी चार्ज हो गया। इस दौरान दो महिला कर्मचारी बेहोश हो गई जिन्हे दून अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। सभी कर्मचारियों को सुद्धोवाला जेल भेज दिया गया।
सरकार ने उत्तराखंड में 108 सेवा का संचालन का कार्य जब से टेंडर करा कर कम रेट भरने वाली कैंप कंपनी को सौंपा है, तब से इस सेवा के अंतर्गत कार्यरत 717 कर्मचारियों के परिवारों के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
देखिए वीडियो 

 नई कंपनी ने पिछली कंपनी से मात्र ₹18000 प्रति एंबुलेंस कम रेट भरकर जब से टेंडर हासिल किया है, तब से 73 दिन से परेड ग्राउंड यह कर्मचारी धरना दे रहे हैं और लगभग 65 दिन से क्रमिक अनशन पर बैठे हुए हैं।
अहम सवाल यह है कि हर महीने प्रति एंबुलेंस पर मात्र ₹18000 की बचत करके इन 717 कर्मचारियों और उनके परिवार  के पेट पर लात मार के उत्तराखंड की कल्याणकारी सरकार कौन सा खजाने की बचत करके आखिर क्या हासिल कर लेगी !
नई कंपनी के विषय में यह जानकारी संभवत कितने अफसरों और जिम्मेदारों को होगी कि यह नई कंपनी मध्य प्रदेश में 104 सेवा चलाती थी, जिसका काम मुर्दों को ढोना है।
 मुर्दों को ढोने वाली कंपनी की विचारधारा उत्तराखंड में आखिर कितना बदल जाएगी, यह इस बात से समझा जा सकता है कि नई कंपनी के स्टेट हेड पहले बोल चुके हैं कि उनका काम सिर्फ मरीजों को अस्पताल में ले जाना है। जबकि कोई भी समझदार व्यक्ति यह जानता है कि किसी भी दुर्घटना में शुरुआत के एक-दो घंटे बेहद अहम होते हैं ऐसे में यदि पूरी संजीदगी और संवेदनशीलता के साथ प्राथमिक उपचार न दिया जाए तो फिर 108 पर इतना भारीभरकम खरचा क्यों किया जा रहा है ! मरीज को तो किसी भी वाहन से ढोया जा सकता है।
स्वास्थ्य जैसी सेवाओं का टेंडर करने के लिए केवल कम लागत वाली कंपनी को टेंडर दिए जाने का तर्क कोई बेहद असंवेदनशील व्यक्ति दे सकता है।
 पिछले दो महीनों में जितनी एंबुलेंस दुर्घटनाएं हुई है उससे साफ हो जाता है कि नई कंपनी ने पैसे बचाने के चक्कर में आठ-नौ सालों  से काम कर रहे उत्तराखंड के 717 कर्मचारियों को बाहर करके बहुत कम दरों पर अन्य राज्यों के अप्रशिक्षित चालकों को नौकरी पर रख लिया है।
गौरतलब है कि ताजा आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड मे बेरोजगारी की दर आज देश भर मे सबसे अधिक है। एक गहन चिंतन का विषय है कि क्या यह उचित नहीं होता की विधायकों के वेतन भत्तों और बंदरबांट की जाने वाली विधायक निधि बढ़ाने की बजाए यदि 108 सेवा के इन कर्मचारियों की आजीविका के विषय में भी सोच लिया जाता !
 ये 717 कर्मचारियों के परिवार प्रचंड बहुमत की सरकार के दौर में भले ही काफी नगण्य संख्या लगे लेकिन यह सभी को याद रखना चाहिए कि जब नेताजी वोट के लिए मतदाता की दहलीज पर खड़े होते हैं तो एक-एक वोट बेहद कीमती होता है।
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