देहरादून। उत्तराखंड शिक्षा विभाग में दिव्यांग कोटे से हुई नियुक्तियों को लेकर बड़ा खुलासा सामने आया है। राज्य मेडिकल बोर्ड की जांच में अब तक 36 ऐसे शिक्षक पकड़े गए हैं, जिनके दिव्यांगता प्रमाणपत्र संदिग्ध या गलत पाए गए हैं। मामले के सामने आने के बाद शिक्षा विभाग में हड़कंप मच गया है।
हाईकोर्ट के आदेश पर चल रही जांच में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। कुछ शिक्षक पुराने और एक्सपायर प्रमाणपत्र लेकर पहुंचे, जबकि कई मामलों में दिव्यांगता का प्रतिशत निर्धारित मानक से कम पाया गया।
794 शिक्षक-कर्मचारी जांच के दायरे में
जानकारी के अनुसार दिव्यांग कोटे से नियुक्त शिक्षक और कर्मचारियों के प्रमाणपत्रों की जांच ऋषिकेश स्थित एम्स में कराई जा रही है।
राज्य मेडिकल बोर्ड अब तक 10 बैठकों में प्रमाणपत्रों की जांच कर चुका है। कुल 794 शिक्षक-कर्मचारियों को जांच के लिए चिन्हित किया गया था, जिनमें से 587 ही मेडिकल बोर्ड के सामने उपस्थित हुए।
40% जरूरी, कई प्रमाणपत्रों में सिर्फ 30% दिव्यांगता
जांच में सामने आया कि कुछ शिक्षकों के दिव्यांग प्रमाणपत्र तो वैध थे, लेकिन उनमें दिव्यांगता का प्रतिशत केवल 30 प्रतिशत दर्ज था।
जबकि सरकारी नौकरी में दिव्यांग आरक्षण का लाभ लेने के लिए न्यूनतम 40 प्रतिशत दिव्यांगता अनिवार्य होती है। ऐसे मामलों में अब नियुक्तियों पर सवाल उठने लगे हैं।
1995 का प्रमाणपत्र लेकर पहुंचा शिक्षक
मेडिकल बोर्ड की जांच के दौरान कई पुराने प्रमाणपत्र भी सामने आए। चमोली के एक शिक्षक का अस्थि विकार से जुड़ा दिव्यांग प्रमाणपत्र वर्ष 1995 का पाया गया।
इसके अलावा कुछ शिक्षकों के प्रमाणपत्रों की वैधता वर्ष 2020 में ही समाप्त हो चुकी थी, लेकिन वे पुराने प्रमाणपत्रों के साथ जांच में पहुंचे। मेडिकल बोर्ड ने ऐसे मामलों में नए प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।
जांच से छूटे शिक्षकों को मिलेगा एक और मौका
अपर निदेशक माध्यमिक शिक्षा परमेंद्र कुमार बिष्ट ने बताया कि जांच से छूटे शिक्षकों को एक और अवसर दिया जा रहा है। ऐसे सभी शिक्षक-कर्मचारियों की 11 मई को दोबारा एम्स में जांच कराई जाएगी।
सभी मुख्य शिक्षा अधिकारियों को संबंधित शिक्षकों को जल्द सूचना देने के निर्देश जारी किए गए हैं।
जांच में सामने आईं कई तकनीकी गड़बड़ियां
जांच के दौरान कुछ अजीब मामले भी सामने आए। दो मामलों में दिव्यांगता बेटे की थी, लेकिन संदिग्ध सूची में पिता का नाम शामिल कर दिया गया। वहीं दो ऐसे अभ्यर्थियों के नाम भी सूची में पाए गए, जिन्होंने दिव्यांगता के आधार पर नौकरी ही नहीं ली थी।
सूत्रों के मुताबिक ‘नेशनल फेडरेशन ऑफ द ब्लाइंड बनाम उत्तराखंड’ मामले में हाईकोर्ट ने दिव्यांग प्रमाणपत्रों की जांच के आदेश दिए थे। इसके बाद शिक्षा विभाग में बड़े स्तर पर सत्यापन अभियान शुरू किया गया।
अब जांच रिपोर्ट के बाद संबंधित शिक्षकों पर कार्रवाई की तलवार लटक गई है।




