देहरादून: देशभर में बाघ संरक्षण को लेकर लगातार अभियान चलाए जा रहे हैं, लेकिन हाल ही में सामने आए आंकड़ों ने एक चिंताजनक तस्वीर पेश की है। इन आंकड़ों से यह साफ संकेत मिलता है कि साल के कुछ विशेष महीने बाघों के लिए बेहद खतरनाक साबित हो रहे हैं। यही समय उत्तराखंड में इंसानों के लिए भी जोखिम भरा बन जाता है, जब मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ जाती हैं।
नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (NTCA) की रिपोर्ट ने इस पूरे पैटर्न को उजागर किया है, जिसने वन विभाग और वन्यजीव विशेषज्ञों को भी चौंका दिया है।
बदलता पर्यावरण और वन्यजीवों का व्यवहार
विशेषज्ञों के अनुसार बदलते मौसमीय चक्र, जंगलों में बढ़ती मानवीय गतिविधियां और शिकार करने वाले वन्यजीवों के व्यवहार में हो रहे बदलाव कई सालों से अध्ययन का विषय रहे हैं। पर्यावरणीय दबाव के कारण जंगली जानवरों की गतिविधियों और उनके व्यवहार में भी परिवर्तन देखा जा रहा है।
हालांकि इस बार जो आंकड़े सामने आए हैं, उन्होंने बाघों की मौत के एक ऐसे पैटर्न की ओर ध्यान खींचा है, जो पहले ज्यादा चर्चा में नहीं रहा। ये आंकड़े बताते हैं कि साल के कुछ महीनों में बाघों की मौत असामान्य रूप से अधिक दर्ज की जाती है।
NTCA की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा
देश में बाघों के संरक्षण और सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाली प्रमुख संस्था NTCA समय-समय पर बाघों की संख्या, उनकी मौत और संरक्षण से जुड़े उपायों की निगरानी करती है।
संस्था ने हाल ही में वर्ष 2012 से 2025 तक के बीच देशभर में बाघों की मौत के आंकड़े सार्वजनिक किए हैं। इन आंकड़ों में वर्षवार के साथ-साथ माहवार विवरण भी शामिल है।
14 वर्षों में 1581 बाघों की मौत
रिपोर्ट के अनुसार पिछले 14 सालों में देशभर में कुल 1581 बाघों की मौत दर्ज की गई।
2023 में सबसे अधिक 182 बाघों की मौत हुई।
इसके बाद 2025 में 167 बाघों की मौत दर्ज की गई।
जब इन आंकड़ों को महीनों के हिसाब से देखा गया तो एक चौंकाने वाला पैटर्न सामने आया।
जनवरी सबसे घातक महीना
रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 14 वर्षों में जनवरी का महीना बाघों के लिए सबसे ज्यादा जोखिम भरा रहा है। इस महीने में कुल 190 बाघों की मौत दर्ज की गई।
इसके बाद दिसंबर दूसरे स्थान पर है, जब 165 बाघों की मौत हुई।
इससे साफ संकेत मिलता है कि सर्दियों का मौसम बाघों के लिए अधिक खतरनाक साबित हो रहा है।
उत्तराखंड में भी वही तस्वीर
यदि उत्तराखंड के आंकड़ों पर नजर डालें तो यहां भी स्थिति कुछ अलग नहीं है। पिछले 14 वर्षों में राज्य में 139 बाघों की मौत दर्ज की गई है।
इसी अवधि के दौरान बाघों के हमलों में 88 लोगों की मौत हुई, जबकि 96 लोग गंभीर रूप से घायल हुए।
हाल के वर्षों के आंकड़े भी यही संकेत देते हैं कि जनवरी का महीना मानव-वन्यजीव संघर्ष के लिहाज से बेहद संवेदनशील बना हुआ है।
2025 में जनवरी के दौरान 3 लोगों की मौत बाघ के हमले में हुई।
2026 में भी जनवरी में 3 लोगों को बाघ ने मार डाला।
सर्दियों में क्यों बढ़ते हैं हमले?
उत्तराखंड के APCCF वन्यजीव विवेक पांडेय के अनुसार ठंड के मौसम में मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं ज्यादा सामने आती हैं।
उन्होंने बताया कि सर्दियों में कोहरा अधिक होने के कारण जंगलों में दृश्यता कम हो जाती है। ऐसे में जंगल में घास काटने, लकड़ी लाने या अन्य कामों के लिए गए लोगों का अचानक जंगली जानवरों से सामना हो जाता है।
जब शिकारी वन्यजीव खुद को खतरे में महसूस करते हैं तो वे हमला कर देते हैं, जिससे ऐसी घटनाओं में वृद्धि होती है।
साल दर साल बढ़ती घटनाएं
वन विभाग के रिकॉर्ड के मुताबिक बाघों के हमलों में होने वाली मौतों के आंकड़े भी चिंताजनक हैं।
2020: 1 मौत, 10 घायल
2021: 2 मौत, 8 घायल
2022: 16 मौत, 10 घायल
2023: 17 मौत, 9 घायल
2024: 12 मौत, 4 घायल
2025: 12 मौत, 5 घायल
उत्तराखंड में बाघों की मौत का सालाना रिकॉर्ड
2012: 13 बाघ
2013: 12 बाघ
2014: 8 बाघ
2015: 10 बाघ
2016: 14 बाघ
2017: 17 बाघ
2018: 8 बाघ
2019: 7 बाघ
2020: 4 बाघ
2021: 3 बाघ
2022: 6 बाघ
2023: 21 बाघ
2024: 9 बाघ
2025: 7 बाघ
इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि सर्दियों के महीनों में न सिर्फ बाघों की मौत बढ़ती है, बल्कि इंसानों और बाघों के बीच टकराव की घटनाएं भी अधिक सामने आती हैं। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि इस समय विशेष सतर्कता और बेहतर प्रबंधन रणनीति की जरूरत है, ताकि मानव और वन्यजीव दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।




