पुरोला/नौगांव, उत्तरकाशी, 21 जुलाई। नीरज उत्तराखंडी
प्रदेश के सबसे बड़े टमाटर उत्पादक क्षेत्र रंवाई घाटी में इस बार टमाटर उत्पादक किसानों पर दोहरी मार पड़ रही है। पहले फसल में बीमारी ने उत्पादन को प्रभावित किया और अब बाजार में टमाटर के बेहद कम दाम मिलने से किसान आर्थिक संकट में घिर गए हैं। हालात यह हैं कि अधिकांश किसानों ने टमाटर की तुड़ान बंद कर दी है और खेतों में बची करीब आधी फसल सड़कर नष्ट हो रही है।
रंवाई घाटी में प्रतिवर्ष करीब 25 हजार मीट्रिक टन टमाटर का उत्पादन होता है। क्षेत्र के 70 प्रतिशत से अधिक किसानों की आजीविका इसी नकदी फसल पर निर्भर है, लेकिन इस बार उन्हें लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है।
किसानों का कहना है कि एक कैरेट (25 से 28 किलो) टमाटर को देहरादून मंडी तक पहुंचाने में भाड़ा, लोडिंग-अनलोडिंग, आढ़त और ट्रांसपोर्ट एजेंट का कमीशन मिलाकर 100 रुपये से अधिक खर्च आ रहा है, जबकि मंडी में उसी कैरेट के केवल 200 से 250 रुपये मिल रहे हैं।
कई किसानों का आरोप है कि मंडी से मिलने वाली बिक्री पर्चियों में तमाम खर्च काटने के बाद उनके हिस्से में बेहद कम राशि बच रही है। कुछ मामलों में तो किसानों पर ही बकाया दिखाया जा रहा है। ऐसे में टमाटर तोड़ना भी घाटे का सौदा साबित हो रहा है।
काश्तकार जयवीर परमार, हरिमोहन सिंह और सुनील रावत ने बताया कि मजदूरी देकर फसल तुड़वाने और मंडी तक पहुंचाने के बाद भी लागत नहीं निकल रही है।
मजबूरन किसानों को तैयार फसल खेतों में ही छोड़नी पड़ रही है, जिससे टमाटर सड़ रहे हैं और भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है। किसानों का कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो फसली ऋण चुकाना भी मुश्किल हो जाएगा।
देवराना घाटी फल एवं सब्जी उत्पादक एसोसिएशन के अध्यक्ष जयेंद्र सिंह राणा ने कहा कि यदि स्थानीय कृषि उत्पादन मंडी समिति पूरी तरह सक्रिय होती तो किसानों को अतिरिक्त परिवहन खर्च और आढ़त का बोझ नहीं उठाना पड़ता।
उन्होंने सरकार से तत्काल हस्तक्षेप कर टमाटर उत्पादकों को उचित मूल्य दिलाने, स्थानीय खरीद व्यवस्था शुरू करने तथा राहत पैकेज घोषित करने की मांग की है।
रंवाई घाटी के किसानों का कहना है कि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो हजारों टमाटर उत्पादक परिवार गंभीर आर्थिक संकट में फंस जाएंगे और क्षेत्र की प्रमुख नकदी फसल का भविष्य भी प्रभावित होगा।






