- मुख्यमंत्री के संकल्प, जिला प्रशासन की पहल और किसानों की मेहनत से पारंपरिक दून बासमती के पुनर्जीवन की नई कहानी
देहरादून, 26 जुलाई 2026।नीरज उत्तराखंडी
एक समय अपनी अनूठी खुशबू और बेमिसाल स्वाद के कारण देश-विदेश में पहचान बनाने वाली देहरादून की प्रसिद्ध दून बासमती अब फिर से अपने घर-आंगन लौट रही है। वर्षों तक उपेक्षा और खेती के घटते रकबे के कारण विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी इस पारंपरिक धान की किस्म को अब नया जीवन मिलने लगा है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के संकल्प, जिला प्रशासन की दूरदर्शी पहल और किसानों की मेहनत ने इस उम्मीद को मजबूत किया है कि आने वाले वर्षों में दून बासमती फिर से उत्तराखंड की पहचान बनेगी।
वर्ष 2025 में किए गए सफल ट्रायल के बाद इस बार दून बासमती 2.2 की खेती का दायरा बढ़ाकर 75 हेक्टेयर कर दिया गया है। जिले के 160 किसान इसकी रोपाई में जुटे हैं। यह केवल खेती का विस्तार नहीं, बल्कि देहरादून की कृषि विरासत को बचाने का एक व्यापक अभियान बन चुका है।
विरासत को बचाने की मुहिम
जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान ने बताया कि दून बासमती के संरक्षण और संवर्धन के लिए जिला प्रशासन लगातार कार्य कर रहा है। प्रारंभिक चरण में करीब 65 हेक्टेयर क्षेत्र में इसका ट्रायल किया गया था, जिसके परिणाम अत्यंत उत्साहजनक रहे। इसी सफलता के आधार पर इस वर्ष खेती का क्षेत्र बढ़ाया गया है।
उन्होंने कहा कि पहले केवल सहसपुर और विकासनगर तक सीमित यह पहल अब रायपुर और डोईवाला के किसानों तक भी पहुंच चुकी है। किसानों का बढ़ता उत्साह इस बात का संकेत है कि दून बासमती की खोई हुई पहचान फिर लौट सकती है।
किसानों को मिला भरोसा और बेहतर बाजार
मुख्य विकास अधिकारी अभिनव शाह ने बताया कि वर्ष 2025 में 100 से अधिक किसानों ने दून बासमती की खेती की थी। उस दौरान रीप (ग्रामीण उद्यमिता एवं आजीविका परियोजना) के माध्यम से किसानों से सीधे खरीद की गई।
प्रशासन ने 200 क्विंटल से अधिक दून बासमती धान ₹65 प्रति किलोग्राम की दर से खरीदा, जिससे किसानों के खातों में 13 लाख रुपये से अधिक की राशि सीधे हस्तांतरित की गई। इससे किसानों का विश्वास बढ़ा और इस वर्ष अधिक किसान इस अभियान से जुड़े।
उन्होंने कहा कि खेती को बढ़ावा देने के साथ-साथ हिलान्स और रीप के माध्यम से दून बासमती की ब्रांडिंग और मार्केटिंग पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है, ताकि किसानों को स्थायी और लाभकारी बाजार मिल सके।
अब बनेगा सीड बैंक और टेस्टिंग सेंटर
दून बासमती की शुद्धता बनाए रखने और गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध कराने के लिए विकासनगर में सीड बैंक स्थापित किया जाएगा। इसके साथ ही आधुनिक टेस्टिंग सुविधा भी विकसित की जाएगी, जिससे इसकी गुणवत्ता और विशिष्ट सुगंध का वैज्ञानिक परीक्षण संभव होगा।
जिलाधिकारी का कहना है कि दून बासमती को केवल एक कृषि उत्पाद नहीं, बल्कि देहरादून की सांस्कृतिक और कृषि विरासत के रूप में विकसित किया जाएगा।
550 हेक्टेयर से सिमटकर रह गई थी खेती
मुख्य कृषि अधिकारी देवेंद्र सिंह ने बताया कि एक समय दून बासमती की खेती करीब 550 हेक्टेयर क्षेत्र में होती थी, लेकिन समय के साथ इसका रकबा घटकर मात्र 150 से 200 हेक्टेयर रह गया।
अब प्रशासन का लक्ष्य इसे फिर से बड़े स्तर पर स्थापित करना है। इसके लिए गुणवत्तापूर्ण बीज संरक्षण, किसानों का प्रशिक्षण और बेहतर विपणन व्यवस्था पर एक साथ काम किया जा रहा है।
किसानों की उम्मीद फिर जागी
हरबर्टपुर निवासी किसान सूर्य प्रकाश बहुगुणा कहते हैं कि प्रशासन, कृषि विभाग और ग्रामोत्थान के सहयोग से किसानों का उत्साह लगातार बढ़ रहा है। उनके क्षेत्र के 25 से 30 किसान इस अभियान से जुड़ चुके हैं।
उनका कहना है कि यदि सरकार इसी तरह समर्थन देती रही तो दून बासमती एक बार फिर किसानों की आय का मजबूत आधार बन सकती है।
बीज से ब्रांड तक की समग्र रणनीति
दून बासमती के पुनर्जीवन के लिए जिला प्रशासन केवल खेती बढ़ाने तक सीमित नहीं है। बीज संरक्षण, वैज्ञानिक परीक्षण, किसानों से सीधी खरीद, आधुनिक विपणन, ब्रांडिंग और मूल्य संवर्धन को एकीकृत रणनीति के रूप में अपनाया गया है।
यही कारण है कि इस बार यह अभियान केवल कृषि कार्यक्रम नहीं, बल्कि उत्तराखंड की पारंपरिक पहचान को पुनर्जीवित करने का मिशन बन गया है।
नई उम्मीद की खुशबू
दून बासमती की वापसी केवल एक फसल की वापसी नहीं है। यह उत्तराखंड की मिट्टी, किसानों की मेहनत और पारंपरिक कृषि ज्ञान के पुनर्जागरण की कहानी है। यदि सरकार, प्रशासन और किसान इसी समर्पण के साथ आगे बढ़ते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब “दून की बासमती” फिर से अपनी प्राकृतिक सुगंध के साथ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में विशेष पहचान बनाएगी।
यह पहल न केवल किसानों की आय बढ़ाने का माध्यम बनेगी, बल्कि उत्तराखंड की कृषि विरासत को नई पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाने का भी महत्वपूर्ण आधार सिद्ध होगी।






