देहरादून। उत्तराखंड का उद्यान विभाग एक बार फिर गंभीर विवादों के केंद्र में है। इस बार पॉलीहाउस योजना में करोड़ों रुपये के भुगतान को लेकर बड़े वित्तीय घोटाले के आरोप सामने आए हैं।
आरोप है कि Draithwet & Company को सरकार द्वारा 112 करोड़ रुपये का भुगतान कर दिया गया, जबकि जमीनी स्तर पर केवल 8 से 10 पॉलीहाउस ही निर्धारित मानकों के अनुरूप निर्मित पाए गए।
आरोपों के अनुसार, अधिकांश कार्य पूरे हुए बिना ही संबंधित अधिकारियों ने कंपनी को पूरी भुगतान राशि जारी कर दी। सबसे बड़ा सवाल यह है कि बिना पर्याप्त भौतिक सत्यापन, तकनीकी निरीक्षण और गुणवत्ता परीक्षण के 112 करोड़ रुपये का भुगतान किस आधार पर किया गया? यदि कार्य अधूरा था, तो इतनी बड़ी राशि जारी करने की अनुमति किसने दी और इसकी जवाबदेही किसकी है?
जानकारी के अनुसार, जब यह मामला सामने आया तो विभाग ने आनन-फानन में कंपनी पर दबाव बनाकर लगभग 38 करोड़ रुपये वापस जमा कराए। इसके बावजूद अभी भी करीब 74 करोड़ रुपये की राशि कंपनी पर बकाया बताई जा रही है। यदि इन आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह उत्तराखंड की कृषि एवं उद्यान योजनाओं से जुड़े सबसे बड़े वित्तीय घोटालों में से एक माना जा सकता है।
इस पूरे प्रकरण में उन अधिकारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है, जिन्होंने बिना पर्याप्त सत्यापन के सरकारी धन जारी किया। मांग उठ रही है कि पूरे मामले की उच्च स्तरीय एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए, सरकारी धन की पूरी वसूली की जाए तथा जिन अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध पाई जाए, उनके विरुद्ध कड़ी विभागीय एवं कानूनी कार्रवाई की जाए।
पहले भी विभिन्न विवादों को लेकर चर्चा में रहे कृषि एवं उद्यान मंत्री गणेश जोशी के कार्यकाल में सामने आए इस कथित घोटाले ने सरकार और विभाग की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्ष और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि 112 करोड़ रुपये के भुगतान में भारी अनियमितताएं हुई हैं और इस पूरे प्रकरण की स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जानी चाहिए ताकि दोषियों की जवाबदेही तय हो सके।
अब यह मामला केवल वित्तीय अनियमितता का नहीं, बल्कि सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता, जवाबदेही और जनता के टैक्स के पैसे की सुरक्षा का भी बड़ा प्रश्न बन गया है। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई और सरकारी धन की पूरी वसूली सुनिश्चित की जानी चाहिए।







