- 40 लाख की जमा पूंजी के बावजूद लकड़ी के चूल्हे पर निर्भर थीं पार्वती देवी; अनुपयोगी सरकारी भवन में अकेली जिंदगी और अग्निशमन व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
आराकोट/बंगाण, उत्तरकाशी। 30 सितंबर। नीरज उत्तराखंडी
आराकोट के पुराने स्वास्थ्य केंद्र भवन में लगी आग ने एक बुजुर्ग महिला पार्वती देवी की जिंदगी छीन ली, लेकिन आग बुझने के बाद भी कई सवाल धधक रहे हैं। सवाल सिर्फ यह नहीं कि आग कैसे लगी, बल्कि यह भी कि एक सेवानिवृत्त स्वास्थ्यकर्मी वर्षों से जीर्ण-शीर्ण सरकारी भवन में अकेली कैसे रह रही थीं और उनकी सुरक्षा के लिए जिम्मेदार व्यवस्था ने कभी पीछे मुड़कर क्यों नहीं देखा?
पार्वती देवी स्वास्थ्य विभाग में लंबे समय तक सेवा देने के बाद वर्ष 2006-07 के आसपास सेवानिवृत्त हुई थीं। पति की मृत्यु के बाद आराकोट में अकेली रह रही थीं। स्थानीय लोग उन्हें ‘जैन माता’ के नाम से जानते थे। स्वास्थ्य केंद्र का नया भवन बनने के बाद पुराने भवन का उपयोग बंद हो गया, लेकिन यही अनुपयोगी भवन आगे चलकर उनकी अंतिम शरणस्थली बन गया।
बैंक में लाखों, रसोई में जंगल की लकड़ी
सबसे मार्मिक पहलू यह है कि पार्वती देवी के खाते में सेवा के दौरान अर्जित पेंशन, ग्रेच्युटी, जीपीएफ और अन्य धनराशि मिलाकर 40 लाख रुपये से अधिक जमा होने की बात सामने आ रही है। इसके बावजूद वह भोजन पकाने के लिए जंगल से लकड़ी बीनकर लाती थीं।
यानी जीवनभर सरकारी सेवा करने वाली महिला के पास बैंक में जमा पूंजी थी, लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में आधुनिक सुविधा या सुरक्षित ईंधन की व्यवस्था नहीं थी।
बताया जा रहा है कि वह कभी-कभी आराकोट में लोगों से भिक्षा भी मांगती थीं। यह स्थिति केवल गरीबी का सवाल नहीं, बल्कि अकेले बुजुर्गों के सामाजिक और संस्थागत सहारे की कमी का सवाल भी है।
जिस भवन से स्वास्थ्य सेवा चली, वही बना मौत का घर
सबसे बड़ा सवाल स्वास्थ्य विभाग की भूमिका को लेकर है।
- यदि पुराना स्वास्थ्य केंद्र भवन जर्जर और अनुपयोगी हो चुका था और विभाग ने उसके बगल में नया भवन बनाकर स्वास्थ्य केंद्र को वहां स्थानांतरित कर दिया था, तो पुराने भवन की स्थिति का क्या हुआ?
- क्या भवन को असुरक्षित घोषित किया गया था?
- क्या उसमें किसी व्यक्ति के रहने की अनुमति थी?
- क्या विभाग अथवा स्थानीय प्रशासन ने यह देखा कि एक बुजुर्ग महिला वर्षों से वहां अकेली रह रही है?
- यदि भवन में रहना सुरक्षित नहीं था तो उन्हें वहां से हटाने या सुरक्षित आवास उपलब्ध कराने की कोशिश क्यों नहीं हुई?
इन सवालों के जवाब जांच से ही सामने आएंगे, लेकिन आराकोट की घटना ने सरकारी संपत्तियों के उपयोग और सुरक्षा की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न जरूर खड़े कर दिए हैं।
आग की एक चिंगारी और खत्म हो गया जीवनभर का संघर्ष
चूल्हे से निकली एक छोटी सी चिंगारी ने देखते ही देखते उस कमरे को आग के हवाले कर दिया, जहां पार्वती देवी का जीवन सिमटा हुआ था।
कमरे में जमा लकड़ी ने आग को और भड़काया। आग इतनी भीषण थी कि महिला को बचने का अवसर तक नहीं मिला। उनके शव के कुछ अवशेष ही मिल सके, जिन्हें पहचान और डीएनए सैंपलिंग के लिए सुरक्षित रखा गया है।
एक मां की मौत के बाद उसकी इकलौती बेटी को अंतिम संस्कार तक का अवसर नहीं मिल पाना इस त्रासदी को और अधिक पीड़ादायक बना देता है।
आराकोट में अग्निशमन केंद्र की मांग क्यों नहीं बनी प्राथमिकता?
आराकोट बंगाण क्षेत्र का महत्वपूर्ण कस्बा है। आसपास के कई गांवों के लिए यह बाजार और आवागमन का प्रमुख केंद्र है। बावजूद इसके यहां स्थायी अग्निशमन व्यवस्था का सवाल लंबे समय से उठता रहा है।
सामाजिक कार्यकर्ता मनमोहन सिंह चौहान ने आराकोट में अग्निशमन केंद्र स्थापित करने की मांग की है। उनका कहना है कि जिला मुख्यालय उत्तरकाशी से आराकोट की दूरी करीब 200 किलोमीटर है। आसपास त्यूणी, मोरी और हिमाचल के जुब्बल क्षेत्र से संसाधन उपलब्ध होने के बावजूद पहाड़ी मार्गों और दूरी के कारण आपातकालीन प्रतिक्रिया में समय लग सकता है।
आग बुझाने की व्यवस्था ऐसी क्यों हो कि दमकल पहुंचने तक मकान बचाने के लिए कुछ बचा ही न हो? यही सवाल अब आराकोट के लोग पूछ रहे हैं।
आपदा प्रबंधन सिर्फ बैठक और कागज तक सीमित न रहे
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में आपदा प्रबंधन का अर्थ केवल भूस्खलन, बादल फटने और बाढ़ से निपटना नहीं है। आग भी पहाड़ के गांवों और कस्बों के लिए उतनी ही गंभीर आपदा है।
दुर्गम क्षेत्रों में लकड़ी के मकान, संकरे रास्ते, बाजारों में घनी बसावट और अग्निशमन संसाधनों की दूरी जोखिम को कई गुना बढ़ा देती है।
ऐसे में आराकोट की घटना के बाद प्रशासन को केवल घटना की जांच तक सीमित नहीं रहना चाहिए। पुराने सरकारी भवनों की सुरक्षा, अकेले रह रहे बुजुर्गों की पहचान, स्थानीय स्तर पर अग्निशमन संसाधन, पानी के स्रोत और आपातकालीन पहुंच मार्ग—इन सभी की समीक्षा जरूरी है।
पार्वती देवी की राख पूछ रही है सवाल
पार्वती देवी चली गईं। पीछे रह गए बैंक खाते, वर्षों की सेवा की स्मृतियां और एक ऐसी मौत जिसका जवाब सिर्फ पोस्टमार्टम या डीएनए रिपोर्ट से पूरा नहीं होगा।
उनकी राख में एक सवाल दबा है—
क्या सरकारी व्यवस्था किसी बुजुर्ग को तब याद करती है, जब वह सहायता मांगती है, या तब जब उसकी मौत की खबर सुर्खियां बन जाती है?
आराकोट का अग्निकांड प्रशासन के लिए सिर्फ एक घटना की फाइल न बने। यदि इस त्रासदी से सबक लेकर पुराने सरकारी भवनों की सुरक्षा, अकेले बुजुर्गों की निगरानी और आराकोट में अग्निशमन सुविधा की ठोस व्यवस्था होती है, तभी पार्वती देवी की दर्दनाक मौत से निकला सवाल किसी सार्थक बदलाव तक पहुंच सकेगा।


