डीडीहाट। 08 अगस्त 2026,नीरज उत्तराखंडी
- लद्दाख की 6,250 मीटर ऊंची कांग यात्से–II पर लहराया शौका समाज का परचम, पहाड़ की बेटी ने रचा गौरवशाली इतिहास
- बर्फीले ग्लेशियर, ऑक्सीजन की कमी और कड़ाके की ठंड के बीच हासिल की ऐतिहासिक सफलता; डीडीहाट, उत्तराखंड और देश का नाम किया रोशन
असीम साहस, दृढ़ संकल्प और कठिन परिस्थितियों से जूझने के जज्बे ने एक बार फिर पहाड़ की बेटी को नई ऊंचाई तक पहुंचाया है। डीडीहाट की दीपिका तोलिया ने लद्दाख की प्रसिद्ध कांग यात्से–II (Kang Yatse II) चोटी पर सफलतापूर्वक आरोहण कर शौका समाज, डीडीहाट और पूरे उत्तराखंड को गौरवान्वित किया है। समुद्र तल से करीब 6,250 मीटर (20,505 फीट) की ऊंचाई पर स्थित इस दुर्गम शिखर पर पहुंचकर दीपिका ने शौका जनजाति का परचम लहराया।
मार्खा वैली से होकर गुजरने वाला कांग यात्से–II अभियान अपनी कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के लिए जाना जाता है। बर्फ से ढके ग्लेशियर, बेहद कम ऑक्सीजन, तीखी चढ़ाई, तेज बर्फीली हवाएं, अत्यधिक ठंड और मौसम में अचानक होने वाले बदलाव पर्वतारोहियों के सामने बड़ी चुनौती पेश करते हैं। ऐसी विषम परिस्थितियों के बीच दीपिका का शिखर तक पहुंचना उनकी शारीरिक क्षमता के साथ-साथ मानसिक मजबूती और अदम्य इच्छाशक्ति का परिचायक है।
चोट और सनबर्न भी नहीं डिगा सके हौसला
कांग यात्से–II के अभियान के दौरान दीपिका को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी और अत्यधिक ठंड के अलावा उनके हाथ की एक उंगली और पैर के अंगूठे में चोट भी लगी। तेज धूप तथा बर्फ से परावर्तित सूर्य की किरणों के कारण उनके चेहरे और हाथों पर गंभीर सनबर्न हुआ।
इसके बावजूद उन्होंने अभियान बीच में छोड़ने के बजाय अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित रखा। हर कदम पर सामने आती चुनौती का सामना करते हुए उन्होंने आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प के साथ शिखर की ओर बढ़ना जारी रखा और आखिरकार कांग यात्से–II की चोटी पर तिरंगा और शौका समाज की गौरवपूर्ण पहचान को पहुंचाकर अपने सपने को साकार किया।
‘यह सफलता केवल मेरी नहीं, आप सभी की है’
शिखर पर पहुंचने के बाद दीपिका ने अपनी इस उपलब्धि को उन सभी लोगों को समर्पित किया, जिन्होंने अभियान के दौरान उनका आर्थिक, नैतिक और भावनात्मक सहयोग किया। उन्होंने कहा कि परिवार, समाज और शुभचिंतकों के विश्वास तथा आशीर्वाद के बिना इस कठिन सपने को पूरा करना संभव नहीं होता।
दीपिका के लिए यह सफलता केवल एक पर्वत शिखर को जीतने की कहानी नहीं है। यह उस विश्वास की भी जीत है, जो किसी व्यक्ति को कठिन से कठिन परिस्थितियों में आगे बढ़ने की ताकत देता है।
शौका समाज और बेटियों के लिए बनीं प्रेरणा
दीपिका तोलिया की उपलब्धि का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह सफलता एक महिला पर्वतारोही के साहस और क्षमता को सामने लाती है। उन्होंने यह संदेश दिया है कि ऊंचाइयां केवल भौगोलिक नहीं होतीं, बल्कि वे सपनों, संघर्ष और संकल्प की भी होती हैं।
उनकी सफलता डीडीहाट और शौका समाज के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई है। विशेष रूप से बेटियों के लिए दीपिका का अभियान यह संदेश देता है कि यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और उसे हासिल करने का संकल्प मजबूत हो तो कठिन परिस्थितियां भी रास्ता रोक नहीं सकतीं।
पहाड़ की बेटी का सपना अभी जारी है
दीपिका का कहना है कि उनका प्रयास आगे भी जारी रहेगा। वह पर्वतारोहण के क्षेत्र में नए-नए अभियान करते हुए डीडीहाट, शौका जनजाति, उत्तराखंड और भारत का नाम देश-दुनिया में रोशन करना चाहती हैं। उन्होंने संकेत दिया है कि जल्द ही अपने अगले पर्वतारोहण अभियान की जानकारी भी साझा करेंगी।
कांग यात्से–II की चोटी पर पहुंचना उनके लिए एक मंजिल जरूर है, लेकिन इसे वह अपने पर्वतारोहण सफर का अंत नहीं मानतीं। उनके सामने अब नए शिखर और नई चुनौतियां हैं।
एक शिखर, अनेक सपने
दीपिका तोलिया की कहानी सिर्फ 6,250 मीटर ऊंचे पर्वत तक पहुंचने की कहानी नहीं है। यह उस जिद की कहानी है जो कहती है—मुश्किल रास्ते मंजिल को रोक नहीं सकते। चोट, ठंड, कम ऑक्सीजन और प्रतिकूल मौसम के बावजूद शिखर तक पहुंचने वाली दीपिका ने साबित किया कि पर्वतारोहण में सबसे बड़ी ताकत शरीर से पहले मन की होती है।
कांग यात्से–II की बर्फीली चोटी पर लहराता शौका समाज का परचम अब डीडीहाट की उस बेटी के साहस का प्रतीक बन गया है, जिसने अपने संघर्ष से साबित किया कि जिसके हौसले बुलंद हों, उसके लिए कोई भी शिखर अंतिम नहीं होता।
दीपिका तोलिया की इस गौरवपूर्ण उपलब्धि पर डीडीहाट, शौका समाज और उत्तराखंड में खुशी की लहर है। उन्हें पर्वतारोहण के आगामी अभियानों के लिए हार्दिक शुभकामनाएं और नए शिखरों की विजय की कामना की जा रही है







