नैनीताल/देहरादून: उत्तराखंड में IAS, IPS और IFS अधिकारियों के तबादलों एवं तैनाती को लेकर दायर जनहित याचिका पर उत्तराखंड हाईकोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार से जवाब मांगा है। याचिका में पिछले करीब 12 वर्षों से अखिल भारतीय सेवा अधिकारियों के तबादलों और पोस्टिंग में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों तथा कैडर नियमों के कथित उल्लंघन का आरोप लगाया गया है। मामले की अगली सुनवाई तीन सप्ताह बाद तय की गई है।
याचिका बागेश्वर निवासी सामाजिक कार्यकर्ता और नागरिक मंच से जुड़े पंकज पांडे की ओर से दायर की गई है। इसमें केंद्र के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT), उत्तराखंड के मुख्य सचिव, जो सिविल सर्विसेज बोर्ड के अध्यक्ष हैं, सहित कार्मिक, गृह और वन विभाग के प्रमुख सचिवों को पक्षकार बनाया गया है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं होने का आरोप
याचिका में वर्ष 2013 के सुप्रीम कोर्ट के टीएसआर सुब्रमण्यम बनाम भारत सरकार मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने प्रशासनिक अधिकारियों के बार-बार होने वाले तबादलों को रोकने और अधिकारियों को न्यूनतम कार्यकाल देने के लिए सिविल सर्विसेज बोर्ड की व्यवस्था लागू करने के निर्देश दिए थे।
इसके बाद केंद्र सरकार ने 28 जनवरी 2014 को IAS, IPS और IFS कैडर नियमों में बदलाव किए। याचिका के अनुसार, अधिकारियों की नियुक्ति और तबादले में सिविल सर्विसेज बोर्ड की भूमिका तय की गई और अधिकारियों को सामान्य तौर पर कम से कम दो साल का कार्यकाल देने का प्रावधान किया गया।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि यदि किसी अधिकारी का निर्धारित अवधि से पहले तबादला किया जाता है तो उसके लिए कारण दर्ज किया जाना चाहिए और ऐसे मामलों की रिपोर्ट भी निर्धारित प्रक्रिया के तहत केंद्र को भेजी जानी चाहिए।
IAS अधिकारियों के तबादलों को लेकर RTI दस्तावेजों का हवाला
याचिका में सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त दस्तावेजों का हवाला देते हुए दावा किया गया है कि वर्ष 2014 के बाद उत्तराखंड में बड़ी संख्या में IAS अधिकारियों के तबादले सिविल सर्विसेज बोर्ड की सिफारिश के बिना किए गए।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि कई मामलों में पहले उच्च स्तर पर मौखिक निर्देश दिए गए और बाद में तबादलों को मंजूरी दी गई। याचिका में यह भी कहा गया है कि अधिकारियों का दो साल का न्यूनतम कार्यकाल कई मामलों में पूरा नहीं हुआ।
हालांकि, ये सभी दावे याचिका में लगाए गए आरोप हैं और हाईकोर्ट ने अभी इन आरोपों पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है।
IPS अधिकारियों के तबादलों की प्रक्रिया पर भी सवाल
याचिका में IPS अधिकारियों के तबादलों और पोस्टिंग की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए हैं। इसके अनुसार अगस्त 2018 में IPS अधिकारियों के लिए बोर्ड के गठन से जुड़ा प्रस्ताव सामने आया था, लेकिन इसे आगे नहीं बढ़ाया गया।
याचिका में पुलिस अधिकारियों के तबादलों को लेकर पुलिस एस्टैब्लिशमेंट बोर्ड की व्यवस्था और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्देशों का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि अधिकारियों के तबादलों में निर्धारित प्रक्रिया का पूरी तरह पालन नहीं किया गया।
IFS तबादलों और कारण दर्ज करने को लेकर भी आरोप
वन सेवा यानी IFS अधिकारियों के तबादलों को लेकर भी याचिका में कई दस्तावेजों का हवाला दिया गया है। याचिकाकर्ता का दावा है कि तबादलों से संबंधित प्रस्तावों पर प्रक्रिया कई बार औपचारिकता तक सीमित रही और अधिकारियों के समय से पहले तबादले के कारण हमेशा स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं किए गए।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि समय से पहले किए गए तबादलों से संबंधित त्रैमासिक रिपोर्ट केंद्र सरकार को भेजे जाने की प्रक्रिया का भी पर्याप्त रूप से पालन नहीं हुआ।
संपत्ति विवरण की जांच पर भी उठाए सवाल
जनहित याचिका में अखिल भारतीय सेवा अधिकारियों की संपत्ति की जानकारी और उसके सत्यापन से जुड़े नियमों का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि All India Services (Conduct) Rules, 1968 के तहत अधिकारियों की संपत्ति संबंधी घोषणाओं की जांच की प्रक्रिया कई मामलों में केवल औपचारिकता बनकर रह गई है।
याचिका में अलग-अलग अधिकारियों के तबादलों और संपत्ति संबंधी मामलों का उदाहरण देते हुए यह सवाल उठाया गया है कि नियमों के अनुसार निगरानी और जांच की प्रक्रिया कितनी प्रभावी ढंग से लागू हो रही है।
16 दिसंबर 2025 के पत्र का भी हवाला
याचिका में DoPT की ओर से 16 दिसंबर 2025 को भेजे गए एक पत्र का भी उल्लेख किया गया है। इसमें सिविल सर्विसेज बोर्ड के कामकाज और उससे संबंधित जानकारी मांगे जाने की बात कही गई है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि इस पत्र के संबंध में भी अपेक्षित जानकारी या जवाब उपलब्ध नहीं कराया गया।
हाईकोर्ट के सामने क्या है मुख्य मांग?
जनहित याचिका में अधिकारियों के तबादलों और पोस्टिंग में निर्धारित नियमों का पालन सुनिश्चित करने, सिविल सर्विसेज बोर्ड की भूमिका को प्रभावी बनाने और निर्धारित कार्यकाल से पहले किए जाने वाले तबादलों के कारणों को रिकॉर्ड करने की मांग की गई है।
फिलहाल हाईकोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार से जवाब मांगा है। अब सरकारों की ओर से दाखिल किए जाने वाले जवाब के बाद यह स्पष्ट होगा कि याचिका में लगाए गए आरोपों और दस्तावेजों पर उनका क्या पक्ष है।






