- 2017 की ऑडिट रिपोर्ट ने खोली परतें—आश्रम पद्धति विद्यालय में 46 से 50% तक SC विद्यार्थी पढ़ रहे थे, फिर किस आदेश से बदली व्यवस्था?
देहरादून/चकराता। रिपोर्ट—नीरज उत्तराखंडी
जौनसार-बावर के आवासीय एवं आश्रम पद्धति विद्यालयों में अनुसूचित जाति (SC) के बच्चों के प्रवेश को लेकर चल रहा विवाद अब महज आरोप-प्रत्यारोप का विषय नहीं रह गया है। सामने आए सरकारी लेखा परीक्षा अभिलेख इस मामले में एक महत्वपूर्ण और चौंकाने वाली तस्वीर सामने रखते हैं।
लेखा परीक्षा दस्तावेज बताते हैं कि जिस आश्रम पद्धति विद्यालय को अनुसूचित जनजाति (ST) के विद्यार्थियों के लिए स्थापित बताया गया था, वहां वर्ष 2012-13 से जुलाई 2017 तक SC विद्यार्थी बड़ी संख्या में अध्ययनरत थे। कई वर्षों में उनकी संख्या कुल विद्यार्थियों की लगभग आधी रही।
सबसे अहम सवाल यह है कि यदि वर्ष 2016 से SC बच्चों के प्रवेश पर प्रतिबंध था, जैसा कि अब दावा किया जा रहा है, तो 2016-17 में उसी विद्यालय में 84 SC विद्यार्थी नामांकित कैसे थे? हालांकि केवल नामांकन का यह आंकड़ा यह साबित नहीं करता कि इन सभी विद्यार्थियों का नया प्रवेश वर्ष 2016 में हुआ था। लेकिन यह जरूर बताता है कि 2016 के आसपास व्यवस्था में वास्तव में क्या बदलाव हुआ, इसकी मूल फाइल और शासनादेश सामने रखना जरूरी है।
ऑडिट में दर्ज है SC विद्यार्थियों का वर्षवार आंकड़ा
लेखा परीक्षा रिपोर्ट में राजकीय आश्रम पद्धति विद्यालय के अभिलेखों के आधार पर वर्षवार छात्र संख्या दर्ज की गई है।
शैक्षणिक वर्ष| SC विद्यार्थी| ST विद्यार्थी| कुल
2012-13| 85| 90| 175
2013-14| 81| 94| 175
2014-15| 85| 90| 175
2015-16| 86| 89| 175
2016-17| 84| 91| 175
2017-18 (जुलाई तक)| 87| 88| 175
अर्थात उपलब्ध पंक्ति-वार आंकड़ों के अनुसार इन छह अवधियों में SC विद्यार्थियों की संख्या 508 और ST विद्यार्थियों की संख्या 542 बैठती है। दस्तावेज की कुल योग पंक्ति में आंकड़ों की स्थिति असंगत दिखाई देती है, इसलिए अंतिम संख्या को मूल अभिलेख से मिलान किया जाना आवश्यक है।
लेकिन एक बात निर्विवाद रूप से सामने आती है—2012 से 2017 तक इस विद्यालय में SC विद्यार्थी नियमित रूप से बड़ी संख्या में नामांकित थे।
असली विवाद प्रवेश नहीं, ‘अनुमति’ और बजट का था?
लेखा परीक्षा की आपत्ति का स्वर बेहद महत्वपूर्ण है। इसमें कहा गया कि ST विद्यार्थियों के लिए स्थापित आश्रम पद्धति विद्यालय में SC विद्यार्थियों को शासन/निदेशालय की अनुमति के बिना नामांकित किया गया और उनके भोजन, वर्दी, पुस्तकें आदि पर सरकारी धन खर्च किया गया।
एक अन्य लेखा परीक्षा आपत्ति में वर्ष 2017-18 के लिए 175 विद्यार्थियों में 87 SC और 88 ST विद्यार्थी दर्ज हैं। कुल 45.59 लाख रुपये के खर्च में से लगभग आधा, यानी 22.80 लाख रुपये, SC विद्यार्थियों पर खर्च हुआ बताया गया और इसे नियमों के संदर्भ में अनुचित व्यय माना गया।
यहां से विवाद की असली तस्वीर सामने आती है। क्या सरकार ने SC बच्चों की शिक्षा पर रोक लगाई थी या केवल ST मद से उनके खर्च पर आपत्ति थी? दोनों बातें एक नहीं हैं।
लेखा परीक्षा आपत्ति स्वयं किसी नए कानून अथवा प्रवेश-प्रतिबंध का शासनादेश नहीं है। वह मुख्य रूप से यह सवाल उठाती है कि निर्धारित नियमों के अनुरूप अनुमति के बिना SC विद्यार्थियों को प्रवेश देकर उन पर ST मद से धन क्यों खर्च किया गया।
2016 की कथित रोक पर सबसे बड़ा सवाल
वर्ष 2016 को लेकर अब सबसे गंभीर प्रश्न खड़ा होता है।
यदि 2016 में ही SC विद्यार्थियों के प्रवेश पर पूर्ण रोक लगाने का निर्णय लिया गया था तो—
2016-17 में 84 SC विद्यार्थी विद्यालय में कैसे मौजूद थे?
इसके कई संभावित प्रशासनिक स्पष्टीकरण हो सकते हैं। संभव है कि ये विद्यार्थी पुराने वर्षों में प्रवेश लेकर पढ़ रहे हों और नए प्रवेश पर कोई अलग व्यवस्था लागू हुई हो। इसलिए केवल यह आंकड़ा 2016 में नए प्रवेश का प्रमाण नहीं है।
लेकिन तब सरकार को स्पष्ट करना होगा—
2016 में वास्तव में कौन-सा शासनादेश जारी हुआ?
क्या उसमें नए प्रवेश पर रोक थी?
क्या रोक केवल नए प्रवेश पर थी या अध्ययनरत विद्यार्थियों पर भी?
क्या यह आदेश पूरे जौनसार-बावर पर लागू था या किसी विशेष विद्यालय पर?
और क्या यह आदेश आज भी प्रभावी है?
यही वे सवाल हैं जिनके जवाब के बिना दस साल की कहानी अधूरी है।
2008 का शासनादेश भी महत्वपूर्ण
30 जुलाई 2008 के उत्तराखंड शासन के समाज कल्याण अनुभाग-01 के शासनादेश में जौनसार-बावर क्षेत्र में SC और ST जाति प्रमाण-पत्रों की व्यवस्था को लेकर विशेष निर्देश दिए गए थे।
शासनादेश में स्पष्ट किया गया था कि कोई व्यक्ति एक साथ SC और ST दोनों के रूप में मान्य नहीं हो सकता तथा प्रमाण-पत्र जारी करने के संबंध में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाएगा। शासनादेश की विशेष व्यवस्था देहरादून जनपद के जौनसार-बावर क्षेत्र के लिए लागू किए जाने का उल्लेख भी है।
लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि 2008 का यह शासनादेश स्वयं SC विद्यार्थियों के आश्रम पद्धति विद्यालयों में प्रवेश पर रोक का आदेश नहीं है। इसका संबंध जाति प्रमाण-पत्र की व्यवस्था से है।
इसलिए इसे प्रवेश प्रतिबंध का आधार बताना दस्तावेज की सीमा से बाहर जाना होगा।
2017 की ऑडिट आपत्ति ने बदल दी तस्वीर
लेखा परीक्षा के दस्तावेजों से यह भी सामने आता है कि वर्ष 2017 में विद्यालय का निरीक्षण/ऑडिट हुआ और SC विद्यार्थियों के नामांकन तथा उनके ऊपर हुए सरकारी खर्च को गंभीर आपत्ति के रूप में दर्ज किया गया।
एक दस्तावेज में इसे ऐसी गंभीर अनियमितता बताया गया जिसे वार्षिक लेखा परीक्षा प्रतिवेदन में शामिल किए जाने की संभावना जताई गई थी। अनुपालन आख्या भी मांगी गई थी।
इससे यह सवाल और बड़ा हो जाता है कि—
क्या 2017 की ऑडिट आपत्ति के बाद विभाग ने SC विद्यार्थियों के प्रवेश की पुरानी व्यवस्था समाप्त कर दी?
यदि हां, तो उस निर्णय की फाइल कहां है?
और यदि नहीं, तो बाद में SC बच्चों के प्रवेश को लेकर पैदा हुई स्थिति का आधार क्या था?
85.82 लाख बनाम 22.80 लाख—आंकड़ों की भी होगी जांच
उपलब्ध दस्तावेजों में एक ऑडिट आपत्ति के शीर्षक में 85.82 लाख रुपये के अनुचित व्यय का उल्लेख है, जबकि अलग 2017-18 की आपत्ति में SC विद्यार्थियों पर 22.80 लाख रुपये खर्च होने का आंकड़ा दर्ज है।
दोनों आंकड़ों को एक-दूसरे का पर्याय मानना उचित नहीं होगा। संभवतः एक आंकड़ा विस्तृत अवधि/मामले के कुल आपत्तिजनक व्यय से संबंधित है और दूसरा केवल 2017-18 में SC विद्यार्थियों पर हुए खर्च से।
इसलिए मूल ऑडिट फाइल, बिल-वाउचर और वर्षवार व्यय विवरण सार्वजनिक होना चाहिए।
दस साल की जांच के लिए खुलने चाहिए ये दस्तावेज
इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच के लिए सरकार को कम से कम निम्न अभिलेख सार्वजनिक करने चाहिए—
1. वर्ष 2016 का वह मूल शासनादेश, जिसके आधार पर SC प्रवेश रोकने का दावा किया जा रहा है।
2. आश्रम पद्धति विद्यालयों की स्थापना और संचालन की मूल नियमावली।
3. वर्ष 2012 से 2017 तक SC विद्यार्थियों को प्रवेश देने का विभागीय आधार।
4. 2017 की लेखा परीक्षा आपत्ति और उसके जवाब में विभाग की अनुपालन आख्या।
5. संबंधित विद्यालय की प्रवेश पंजिका और छात्रवार विवरण।
6. 2017 के बाद SC प्रवेश व्यवस्था में किए गए सभी शासनादेश/निदेशालय आदेश।
7. वर्ष 2023 में जारी आदेश और उसके पीछे की फाइल/ऑडिट आपत्ति।
8. वर्ष 2024 में रिक्त सीटों पर SC विद्यार्थियों को प्रवेश देने की व्यवस्था का मूल आदेश।
9. 2012 से वर्तमान तक विद्यालयवार SC/ST प्रवेश एवं सीटों का आंकड़ा।
10. यदि किसी अधिकारी की जिम्मेदारी तय की गई तो उसकी जांच/अनुशासनात्मक कार्रवाई का विवरण।
सवाल बच्चों से नहीं, व्यवस्था से है
इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विवाद का केंद्र बच्चे नहीं, सरकारी नीति और प्रशासनिक निर्णय होने चाहिए।
यदि किसी विद्यालय को विशेष रूप से ST विद्यार्थियों के लिए बनाया गया था तो सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उसमें SC विद्यार्थियों को प्रवेश देने की वैधानिक व्यवस्था क्या थी।
यदि SC विद्यार्थियों को प्रवेश दिया गया था तो वर्षों तक विभाग ने उसे क्यों जारी रहने दिया?
यदि यह नियम विरुद्ध था तो कार्रवाई किस पर हुई?
और यदि बाद में व्यवस्था बदली गई तो क्या उन बच्चों और अभिभावकों को वैकल्पिक गुणवत्तापूर्ण आवासीय शिक्षा की व्यवस्था दी गई?
अब सरकार को बताना होगा—दस साल में बदला क्या?
उपलब्ध दस्तावेजों से फिलहाल इतना स्पष्ट है कि 2012 से 2017 तक जौनसार-बावर के कम से कम एक आश्रम पद्धति विद्यालय में SC विद्यार्थी बड़ी संख्या में पढ़ रहे थे और उन पर सरकारी संसाधन खर्च हो रहे थे।
2017 में इस व्यवस्था पर लेखा परीक्षा ने सवाल उठाया।
इसके बाद व्यवस्था में क्या-क्या बदलाव हुए, यह मूल शासनादेशों और विभागीय फाइलों से ही स्पष्ट होगा।
इसलिए अब मामला किसी राजनीतिक आरोप से आगे बढ़कर दस्तावेजी जवाबदेही का है।
सरकार को यह बताना चाहिए कि यदि वर्ष 2016 से SC बच्चों के प्रवेश पर रोक थी तो उसका मूल आदेश सार्वजनिक क्यों नहीं है? और यदि ऐसी कोई पूर्ण रोक नहीं थी, तो जौनसार-बावर के SC बच्चों के प्रवेश की व्यवस्था में बदलाव किस निर्णय से और किस आधार पर हुआ?
दस साल का सवाल यही है—बच्चों का प्रवेश किसने रोका, किस नियम के तहत रोका और उस निर्णय की जवाबदेही आखिर किसकी है?






