- चौहान दंपति की मुलाकात से गरमाई सियासत, चकराता से विकासनगर तक टिकट के समीकरणों पर नजर
देहरादून। 22 अक्तूबर ,नीरज उत्तराखंडी
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 अभी सामने हैं, लेकिन भाजपा में टिकट की राजनीति ने दस्तक देनी शुरू कर दी है। संभावित दावेदार दिल्ली से देहरादून तक अपनी राजनीतिक फील्डिंग सजाने में जुट गए हैं। इस पूरी कवायद के केंद्र में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की बढ़ती राजनीतिक भूमिका को लेकर भी चर्चा तेज है।
पार्टी के भीतर यह धारणा मजबूत हुई है कि अंतिम टिकट चयन में संघ, केंद्रीय नेतृत्व और प्रदेश संगठन की अपनी-अपनी भूमिका होगी, लेकिन चुनावी मैदान में उतरने वाले कई दावेदार मुख्यमंत्री की राजनीतिक सहमति को भी महत्वपूर्ण मानकर चल रहे हैं। यही वजह है कि मुख्यमंत्री से मुलाकातों और राजनीतिक नजदीकियों को लेकर भाजपा की अंदरूनी राजनीति में अटकलों का दौर शुरू हो गया है।
चौहान दंपति की तस्वीर ने बढ़ाया सियासी ताप
विकासनगर विधायक मुन्ना सिंह चौहान और उनकी पत्नी मधु चौहान की मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के साथ हालिया तस्वीर ने भाजपा के भीतर चर्चाओं को और हवा दे दी है। तस्वीर महज शिष्टाचार मुलाकात थी या इसके पीछे आने वाले चुनाव का कोई राजनीतिक संकेत भी है—इसका जवाब फिलहाल स्पष्ट नहीं है, लेकिन इसके बाद संभावित टिकटों को लेकर कयास तेज हो गए हैं।
मुन्ना सिंह चौहान 2022 में विकासनगर से भाजपा के टिकट पर निर्वाचित हुए थे, जबकि उनकी पत्नी मधु चौहान भी क्षेत्र की सक्रिय राजनीति में लंबे समय से प्रभाव रखती हैं। 2027 में पार्टी यदि फिर दोनों को अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों से मैदान में उतारती है तो यह 2017 की रणनीति की पुनरावृत्ति होगी।
चकराता में बदला समीकरण
चकराता विधानसभा सीट पर भी भाजपा के लिए परिस्थितियां पहले की तुलना में बदली हुई हैं। 2022 में भाजपा प्रत्याशी रहे रामशरण नौटियाल के कांग्रेस में जाने के बाद पार्टी के सामने नए चेहरे और नए समीकरण तलाशने की चुनौती है। इसी बीच मधु चौहान की संभावित दावेदारी की चर्चा ने चकराता की राजनीति को गर्म कर दिया है।
यदि भाजपा चकराता में मधु चौहान को गंभीर विकल्प के रूप में देखती है तो यह मुकाबला केवल एक सीट का टिकट तय करने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जौनसार-बावर की स्थानीय राजनीति, संगठनात्मक समीकरण और जीत की संभावनाओं का भी परीक्षण होगा।
विकासनगर में कुलदीप कुमार की चुनौती
विकासनगर सीट पर पूर्व विधायक कुलदीप कुमार लंबे समय से मुन्ना सिंह चौहान के खिलाफ राजनीतिक मोर्चा खोले हुए हैं। उनकी दावेदारी का सबसे बड़ा तर्क यही है कि पार्टी को सामान्य सीट पर स्थानीय राजनीतिक समीकरणों और सामाजिक प्रतिनिधित्व को ध्यान में रखना चाहिए।
कुलदीप कुमार की ओर से मुन्ना सिंह चौहान की सामाजिक श्रेणी को लेकर उठाए जा रहे सवाल ने राजनीतिक बहस को भी जन्म दिया है। दूसरी ओर चौहान समर्थक इस तर्क को राजनीतिक विरोध से प्रेरित बताते हुए उनके चुनाव लड़ने और जनाधार को प्रमुख आधार मानते हैं।
यानी विकासनगर में 2027 का टिकट केवल एक नाम का फैसला नहीं होगा। यह मौजूदा विधायक की राजनीतिक पकड़ बनाम चुनौती पेश कर रहे पुराने चेहरे के बीच संगठन के भरोसे का परीक्षण भी होगा।
भाजपा के सामने सबसे बड़ा सवाल—जीत या सामाजिक संतुलन?
भाजपा के टिकट वितरण की राजनीति में सबसे अहम कसौटी चुनाव जीतने की क्षमता होती है। 2017 में पार्टी ने एक ही परिवार से दो-दो चेहरों को टिकट देकर यह संकेत दिया था कि चुनावी गणित में जीत की संभावना परिवार आधारित टिकट वितरण पर भारी पड़ सकती है। उस समय मुन्ना सिंह चौहान और मधु चौहान के अलावा यशपाल आर्य और उनके बेटे संजीव आर्य को भी टिकट दिया गया था।
हालांकि 2027 की परिस्थितियां अलग हैं। पार्टी को सत्ता विरोधी रुझानों, स्थानीय असंतोष, नए दावेदारों की महत्वाकांक्षा और संगठन के भीतर प्रतिस्पर्धा—इन सभी को एक साथ साधना होगा।
‘धामी दरबार’ में बढ़ेगी हाजिरी
जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएंगे, टिकट के दावेदारों की मुख्यमंत्री से मुलाकातें और राजनीतिक सक्रियता स्वाभाविक रूप से बढ़ेंगी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पिछले वर्षों में सरकार और संगठन के बीच अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता मजबूत की है। यही कारण है कि टिकट के इच्छुक नेताओं के लिए मुख्यमंत्री की राजनीतिक राय को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।
हालांकि अंतिम निर्णय भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व और पार्टी की निर्धारित चुनावी प्रक्रिया ही करेगी। इसलिए किसी मुलाकात, तस्वीर या राजनीतिक नजदीकी को टिकट की गारंटी मान लेना जल्दबाजी होगी।
2027 की असली लड़ाई टिकट से पहले शुरू
उत्तराखंड में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी औपचारिक रूप से शुरू नहीं हुआ है, लेकिन टिकट की लड़ाई ने अपनी जमीन तैयार करनी शुरू कर दी है। चकराता और विकासनगर इसका शुरुआती उदाहरण हैं। आने वाले महीनों में ऐसी ही तस्वीर प्रदेश की दूसरी सीटों पर भी दिखाई दे सकती है।
सवाल यह नहीं है कि कौन मुख्यमंत्री से मिला। असली सवाल यह है कि कौन पार्टी के लिए जीत का सबसे मजबूत विकल्प साबित होगा।
भाजपा के सामने चुनौती साफ है—पुराने चेहरों के अनुभव, नए दावेदारों की महत्वाकांक्षा, सामाजिक समीकरण और चुनावी जीत के गणित के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
2027 में टिकट की खिड़की खुलने से पहले ही दावेदारों की कतार लग चुकी है। अब देखना यह होगा कि उस खिड़की का पहला पासकोड वास्तव में किसके हाथ लगता है—संगठन के पुराने भरोसेमंद चेहरों के हाथ, नए दावेदारों के हाथ या फिर ‘धामी फैक्टर’ के राजनीतिक समीकरणों से निकले किसी नए नाम के हाथ।






