- जखोल पीएचसी भवन निर्माण में बड़ा सवाल: पहले भूगर्भीय जांच क्यों नहीं? सात साल से 13 गांवों की स्वास्थ्य सुविधा अधर में
मोरी, उत्तरकाशी ।26 अक्तूबर। नीरज उत्तराखंडी
मोरी प्रखंड के दूरस्थ जखोल गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) भवन निर्माण में गंभीर लापरवाही का मामला सामने आया है। करीब 56 लाख रुपये खर्च होने और नींव व पिलर का लगभग 30 प्रतिशत काम पूरा होने के बाद अब निर्माणाधीन भूमि को भू-वैज्ञानिकों ने अनुपयुक्त बता दिया है। भूमि अनुपयुक्त पाए जाने के बाद निर्माण कार्य रोक दिया गया है और अब स्वास्थ्य केंद्र के लिए नए स्थान की तलाश की जा रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब निर्माण शुरू करने से पहले भूमि की तकनीकी और भूगर्भीय उपयुक्तता की जांच जरूरी थी, तो यह जांच पहले क्यों नहीं कराई गई? यदि भूमि वास्तव में भवन निर्माण के लिए अनुपयुक्त थी तो उस पर लाखों रुपये खर्च कर नींव और पिलर खड़े करने की अनुमति किस स्तर से मिली?
सात साल बाद भी स्वास्थ्य केंद्र अधूरा
जखोल में पीएचसी भवन निर्माण की घोषणा वर्ष 2018 में तत्कालीन मुख्यमंत्री ने की थी। इसके करीब एक वर्ष बाद निर्माण कार्य शुरू हुआ, लेकिन नींव और पिलर बनने के बाद काम ठप हो गया। देखते ही देखते सात वर्ष का लंबा समय बीत गया, लेकिन क्षेत्र के लोगों को स्वास्थ्य केंद्र की सुविधा नहीं मिल सकी।
अब निर्माणाधीन स्थल को ही अनुपयुक्त घोषित किए जाने से परियोजना एक बार फिर नए सिरे से शुरू होने की स्थिति में पहुंच गई है। नई भूमि का चयन, उसकी तकनीकी जांच, स्वीकृति और फिर निर्माण प्रक्रिया पूरी होने में कितना समय लगेगा, यह भी स्पष्ट नहीं है।
56 लाख खर्च के बाद बदलेगी जमीन, जवाबदेही किसकी?
इस मामले ने सरकारी निर्माण कार्यों में योजना, तकनीकी परीक्षण और निगरानी की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि भूमि का चयन निर्माण से पहले हुआ था तो क्या संबंधित विभाग अथवा निर्माण एजेंसी ने भू-वैज्ञानिक परीक्षण कराया था? यदि परीक्षण हुआ था तो उसकी रिपोर्ट क्या थी? और यदि जांच नहीं हुई थी तो बिना भू-तकनीकी परीक्षण के निर्माण की अनुमति किस आधार पर दी गई?
ग्रामीणों का आरोप है कि सरकारी धन खर्च होने के बाद जमीन अनुपयुक्त घोषित होना सीधे तौर पर योजना और निगरानी की खामी को दर्शाता है। उनका कहना है कि निर्माण कार्य शुरू होने से पहले ही जमीन की मजबूती और भवन निर्माण की उपयुक्तता सुनिश्चित की जाती तो लाखों रुपये के संभावित अपव्यय को रोका जा सकता था।
13 गांवों की उम्मीदों को झटका
प्रस्तावित पीएचसी पंचगाई पट्टी के करीब 13 गांवों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण यहां के ग्रामीणों को छोटी बीमारी अथवा प्राथमिक उपचार के लिए भी लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्षों से क्षेत्र में स्वास्थ्य केंद्र की मांग उठती रही है। भवन निर्माण शुरू होने पर लोगों को उम्मीद जगी थी कि अब उन्हें स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध होगी, लेकिन निर्माण रुकने के बाद वह उम्मीद भी अधर में लटक गई है।
अब जमीन बदलने की प्रक्रिया शुरू होने से ग्रामीणों को आशंका है कि पीएचसी भवन बनने में कई वर्ष और लग सकते हैं।
निर्माण एजेंसी पर उठे सवाल
जखोल के सामाजिक कार्यकर्ता किशन रावत ने निर्माण एजेंसी मंडी परिषद की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यदि जमीन पहले से अनुपयुक्त थी तो उस पर नींव और पिलर का निर्माण क्यों कराया गया। उन्होंने पूरे मामले में जिम्मेदारी तय करने और सरकारी धन के इस्तेमाल की जांच की मांग की है।
ग्रामीणों का सवाल भी सीधा है—जिस जमीन को अब भू-वैज्ञानिक अनुपयुक्त बता रहे हैं, उसे निर्माण के लिए उपयुक्त किसने माना था?
मंडी परिषद ने क्या कहा?
मंडी परिषद के डीडीएम मनीष पाल के अनुसार, वर्तमान में जिस स्थान पर स्वास्थ्य भवन की नींव और पिलर का कार्य हुआ है, उस भूमि को भू-वैज्ञानिकों ने अनुपयुक्त बताया है। इसके बाद अब गांव के आसपास नई भूमि तलाशी जा रही है।
अब जांच के घेरे में ये सवाल
- निर्माण से पहले भूमि की भूगर्भीय/भू-तकनीकी जांच क्यों नहीं कराई गई?
- 56 लाख रुपये खर्च करने से पहले जमीन की उपयुक्तता सुनिश्चित किस अधिकारी ने की?
- क्या निर्माण स्थल का कोई तकनीकी परीक्षण अथवा स्वीकृति प्रमाणपत्र उपलब्ध है?
- 30 प्रतिशत निर्माण के बाद भूमि अनुपयुक्त पाए जाने पर खर्च धन की जिम्मेदारी किसकी होगी?
- सात वर्ष तक परियोजना अधूरी रहने के कारणों की विभागीय समीक्षा हुई या नहीं?
- नींव और पिलर पर खर्च हुई राशि का क्या होगा?
- नई भूमि के चयन के बाद पुराने निर्माण की लागत और जिम्मेदारी कैसे तय होगी?
- 13 गांवों को स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने की परियोजना की नई समयसीमा क्या है?
सिर्फ जमीन बदलने से नहीं चलेगा काम
जखोल पीएचसी का मामला केवल एक अधूरे भवन का मामला नहीं है, बल्कि यह सरकारी निर्माण परियोजनाओं की पूर्व-योजना, तकनीकी जांच और जवाबदेही की पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है। अगर निर्माण से पहले जमीन की वैज्ञानिक जांच नहीं हुई तो यह गंभीर प्रशासनिक चूक है और यदि जांच के बावजूद अनुपयुक्त जमीन पर निर्माण शुरू किया गया तो मामला और भी गंभीर हो जाता है।
56 लाख रुपये खर्च होने के बाद जमीन बदलने की कवायद यह सवाल छोड़ रही है कि सरकारी योजनाओं में पहले जांच होती है या पहले खर्च? सात वर्ष से स्वास्थ्य सुविधा की प्रतीक्षा कर रहे 13 गांवों के लोगों को अब केवल नई जमीन की तलाश नहीं, बल्कि जिम्मेदारी तय होने और समयबद्ध तरीके से अस्पताल भवन पूरा होने का इंतजार है।






