पुरोला/उत्तरकाशी।30 अक्तूबर, नीरज उत्तराखंडी
विभिन्न निर्माण विभागों में पंजीकृत कुछ ठेकेदारों को लाखों रुपये की GST देनदारी के नोटिस मिलने से क्षेत्र में हड़कंप मचा हुआ है। नोटिस मिलने के बाद संबंधित ठेकेदार पुराने निर्माण कार्यों के बिल, भुगतान और GST अभिलेख खंगालने में जुटे हैं।
हालांकि उपलब्ध दस्तावेजों की पड़ताल यह संकेत देती है कि पूरे मामले को केवल ठेकेदारों द्वारा GST जमा न करने के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। सरकारी निर्माण भुगतान में विभागीय स्तर पर GST-TDS की व्यवस्था भी लागू रही है, लिहाजा विभागीय भुगतान और GST रिटर्न का मिलान अब जांच का अहम बिंदु बन गया है।
उत्तराखंड लोक निर्माण विभाग के आधिकारिक रिकॉर्ड में GST लागू होने के बाद ठेकेदारों के भुगतान और GST-TDS को लेकर कई आदेश जारी किए गए थे। विभागीय रिकॉर्ड में 26 सितंबर 2018 और 5 जनवरी 2019 के आदेशों में ठेकेदारों एवं आपूर्तिकर्ताओं के भुगतान से दो प्रतिशत GST-TDS की कटौती का उल्लेख है। वहीं 12 अक्टूबर 2018 के आदेश में GST अधिनियम की धारा 51 के तहत कटौती और कोषागार स्तर पर अपनाई जाने वाली प्रक्रिया निर्धारित की गई थी।
पुराने ठेकों का हिसाब भी जांच के घेरे में
GST लागू होने के समय बड़ी संख्या में सरकारी निर्माण कार्य पहले से चल रहे थे। ऐसे पुराने अनुबंधों के भुगतान और निस्तारण के लिए PWD ने अलग दिशा-निर्देश जारी किए थे। अब यदि वर्तमान नोटिस पुराने निर्माण कार्यों से संबंधित हैं तो उनकी जांच में सिर्फ भुगतान की तारीख देखना पर्याप्त नहीं होगा।
अनुबंध कब हुआ, काम कब हुआ, बिल कब बना, टैक्स इनवॉयस कब जारी हुआ, भुगतान कब हुआ और उस समय कौन-सी GST दर लागू थी—इन सभी तथ्यों का मिलान जरूरी होगा।
यही वह बिंदु है जहां लाखों रुपये की कर मांग का वास्तविक आधार सामने आ सकता है।
12 से 18 प्रतिशत GST दर का बदलाव भी अहम
निर्माण क्षेत्र से जुड़े पुराने मामलों में 18 जुलाई 2022 का GST दर परिवर्तन भी महत्वपूर्ण है। GST Council के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार निर्दिष्ट सरकारी works contract services की GST दर 18 जुलाई 2022 से 12 प्रतिशत से बढ़ाकर 18 प्रतिशत की गई थी।
ऐसे में पुराने निर्माण कार्यों की जांच में संबंधित अनुबंध, काम की अवधि, टैक्स इनवॉयस और आपूर्ति/भुगतान की तारीख के आधार पर उस समय लागू प्रावधान देखना जरूरी होगा।
नोटिस आया तो GST चोरी साबित नहीं
पड़ताल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि GST विभाग का नोटिस मिलना अपने आप में कर चोरी सिद्ध नहीं करता। नोटिस के बाद करदाता को जवाब और दस्तावेज प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है। इसके बाद कर निर्धारण और मांग की अंतिम स्थिति अलग विषय है।
इसलिए संबंधित ठेकेदारों को बिना अंतिम आदेश के “GST चोर” कहना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।
चार आंकड़ों में छिपा है पूरा राज
पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के लिए चार आंकड़ों का मिलान जरूरी है—
- विभाग ने कितना भुगतान किया?
- GST-TDS के रूप में कितना काटा?
- ठेकेदार ने कितना GST रिटर्न में दिखाया और जमा किया?
- GST विभाग ने कितनी देनदारी निर्धारित की?
इन आंकड़ों में अंतर सामने आने पर ही पता चलेगा कि मामला वास्तविक कर बकाया का है या भुगतान, TDS और GST रिटर्न के बीच किसी विसंगति का।
विभागों से जवाब की दरकार
मामले में GST विभाग तथा संबंधित निर्माण विभागों को यह स्पष्ट करना होगा कि पुरोला क्षेत्र में कितने ठेकेदारों को नोटिस जारी किए गए हैं और कुल कितनी रकम की मांग की गई है। नोटिस किन वित्तीय वर्षों से संबंधित हैं, उनमें मूल कर, ब्याज और पेनल्टी कितनी है तथा संबंधित ठेकेदारों के भुगतान से कितना GST-TDS काटा गया था—इन सवालों का जवाब भी सार्वजनिक होना चाहिए।
साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि नोटिस केवल प्रारंभिक कर मांग हैं या किसी मामले में अंतिम कर निर्धारण और वसूली की कार्रवाई भी हो चुकी है।
अब जांच ठेकेदार से आगे बढ़कर सिस्टम तक
सरकारी निर्माण कार्यों में करोड़ों रुपये का भुगतान होता है। ऐसे में GST अनुपालन की जिम्मेदारी और रिकॉर्ड की पारदर्शिता दोनों महत्वपूर्ण हैं। यदि ठेकेदार ने GST लिया लेकिन जमा नहीं किया तो कार्रवाई जायज है। लेकिन यदि विभाग ने GST-TDS काटा, रकम सरकारी खाते में जमा हुई और उसके बावजूद रिकॉर्ड में क्रेडिट या समायोजन नहीं हुआ, तो उस पहलू की भी जांच जरूरी है।
लिहाजा पुरोला के GST नोटिसों का असली सच सिर्फ ठेकेदारों की फाइल में नहीं, बल्कि निर्माण विभाग के भुगतान रिकॉर्ड, GST-TDS और कर विभाग के आंकड़ों के मिलान में छिपा है।
जोर का झटका ठेकेदारों को जरूर लगा है, लेकिन अब यह देखना बाकी है कि हिसाब की गड़बड़ी की जड़ कहां है—ठेकेदार की फाइल में, विभाग के भुगतान रिकॉर्ड में या दोनों के बीच के हिसाब में।






