लाचार कुलपति,कुलाधिपति: तकनीकी संस्थान मे चरम पर मनमानियां

उत्तराखंड तकनीकी शिक्षण संस्थानों में भयंकर प्रशासनिक अनियमितताएं

पिछले तेरह वर्षों में तकनीकी विश्वविद्यालय की परिनियमावली के न बनने से विश्वविद्यालय में “अपनी-अपनी डफली अपना-अपना राज” वाली कहावत इन दिनों पूरी तरह से चरिर्तार्थ है। कोई किसी की नहीं सुन रहा है। शासन अपनी चला रहा है व कुलपति तथा कुलाधिपति आजतक किसी भी संघटक संस्थान को मनमाने ढंग से स्वायत्तता प्राप्त कर संचलित होने से नहीं रोक पा रहे हैं।

उदाहरण के तौर पर हाइड्रो इंजीनियरिंग टेक्नोलॉजी इंस्टिट्यूट के निदेशक गीतम सिंह तोमर ( निदेशक THDC-IHET ) को कुलसचिव, कुलपति तथा कुलाधिपति से कोई सरोकार नहीं रह गया है।

निदेशक पर न्यायलय की अवमानना की कार्यवाही माननीय उच्चन्यायालय, नैनीताल में चल रही है। निदेशक के विरुद्ध माननीय सर्वोच्च न्यायलय की अवमानना में चार्ज शीट भी दाखिल की जा चुकी है।

विश्वविद्यालय में संघटक संस्थानों से सम्बद्ध सभी प्रकार की गतिविधियों में मुख्य तौर पर प्रमुख सचिव तकनिकी शिक्षा श्री ओम प्रकाश के नित नए हस्तक्षेप व शासनादेश से UTU Act 2005 का अस्तित्व ही संकट में पड़ता जा रहा है।

मुख्यमंत्री  के पास ही प्रदेश का तकनीकी  शिक्षा विभाग भी है, परन्तु तकनीकी शिक्षा की दिनोदिन दुर्गति ही देखने को मिल रही है। पिछले पांच वर्षों से तकनीकी विश्वविद्यालय की व्यवस्था चरमरा सी गयी है। जुलाई-अगस्त 2013 तक, जब तक प्रो. दुर्ग सिंह चौहान कुलपति थे, तब तक यह विश्वविद्यालय धन-धान्य व शिक्षा से परिपूर्ण था, परन्तु बाद के कुलपतियों Prof. V K Jain, Prof. P K Garg ने विश्वविद्यालय को गर्त में पहुंचा दिया।

इन्ही कारणों से कुलपति Prof. P K Garg को स्थाई तौर पर पद से निलंबित कर दिया गया था। वर्तमान में अस्थाई तौर पर कुलपति का कार्यभार U S Rawat देख रहे हैं, परन्तु शासन की शह पर विभिन्न निदेशकों ने इन्हें भी ठेंगा दिखाना शुरु कर दिया है। बिना किसी नियम के किसी भी नियमित प्रवक्ता को अनियमित बताना व नियमित वरिष्ठ प्रवक्ता को निलंबित कर देना निदेशकों की आदत सी हो गयी है।

किसी भी प्रकार के आवेदन पर कोई भी सुनवाई व स्पष्ट कार्यवाही विश्वविद्यालय स्तर पर बहुत ही मुश्किल काम हो गया है। संघटक संस्थान में केवल संविदा व मेहमान प्रवक्ताओं से काम चलाया जा रहा है। जिनको अधिकतम 30,000/- के वेतन पर रखा जाता है। इस तरह माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों की धज्जियां भी खुले तौर पर उड़ाई जा रही है।

निदेशक गण बिना किसी परिनियमावली के ही स्वयंभू सरकार बने हुए हैं। THDC-IHET के निदेशक महोदय ने विधिवत अपने वाहन पर “निदेशक, THDC-IHET, उत्तराखंड सरकार” की नेम प्लेट भी बिना किसी आदेश के लगवा रखी है, जबकि ये संस्थान न ही सरकारी संस्थान घोषित है न ही ऐसा कोई आदेश ही प्राप्त हुआ है। संस्थान के सामानों का मुक्त हस्त वितरण भी बिना किसी आदेश के किया जा रहा है। गैर शैक्षणिक तृतीय/ चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की दुर्दशा छुपी नही है, जबकि इन सबका पद उच्चन्यायालय के पूर्ण फैसले में सृजित व सत्यापित है।

तेरह साल बाद भी परिनियमावली न बनाने से तथा शासन के बार बार हस्तक्षेप से संघटक संस्थानों की उपयोगिता कठिन दौर से गुजर रही है।

📢 खबरों को सबसे पहले पाने के लिए पर्वतजन को फॉलो करें

👉 WhatsApp Channel Join करें 👉 WhatsApp Group Join करें 📲 App Download करें

Related Posts