एसटीएफ की साइबर क्राइम टीम ने डिजिटल अरेस्ट ठगी के बड़े मामले का पर्दाफाश किया है। टीम ने शुक्रवार को दिल्ली के करोलबाग से दो आरोपियों को गिरफ्तार किया।
ये आरोपी नैनीताल की रहने वाली रूहेलखंड विश्वविद्यालय की एक सेवानिवृत्त कुलपति से 1.47 करोड़ रुपये ठगने में शामिल थे। इस मामले में तीसरे आरोपी को 31 अगस्त को हिमाचल प्रदेश के सोलन से पकड़ा जा चुका है।
ऐसे रची गई थी ठगी की साजिश
अगस्त 2025 में पीड़िता ने शिकायत दर्ज कराई थी। उन्होंने बताया कि कुछ लोगों ने खुद को महाराष्ट्र साइबर क्राइम विभाग का अधिकारी बताकर संपर्क किया। आरोपियों ने झूठा आरोप लगाया कि उनके नाम पर खुले बैंक खाते में 60 करोड़ रुपये की मनी लॉन्ड्रिंग हुई है।
पीड़िता को लगातार व्हाट्सएप कॉल के जरिये डराया गया और कहा गया कि जांच पूरी होने तक उन्हें डिजिटल अरेस्ट में रहना होगा। इसी बहाने उन्हें विभिन्न खातों में 1.47 करोड़ रुपये ट्रांसफर करने को मजबूर कर दिया गया।
करोलबाग से हुई गिरफ्तारी
तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर एसटीएफ टीम ने मोबाइल नंबरों, बैंक खातों और व्हाट्सएप डाटा की पड़ताल की। जांच में सामने आया कि जिस आईसीआईसीआई बैंक खाते में 33 लाख रुपये ट्रांसफर हुए थे, उसका कनेक्शन दिल्ली से था।
इसके बाद पुलिस टीम ने करोलबाग स्थित कृष्णा स्टे पीजी गेस्ट हाउस में छापा मारकर दो आरोपियों –
- मोहम्मद सैफ (24), निवासी लखनऊ
- शकील अंसारी (23), निवासी झारखंड
को गिरफ्तार कर लिया। आरोपियों के पास से 9 मोबाइल फोन, 14 सिम कार्ड, 3 चेकबुक, 7 चेक, 4 डेबिट कार्ड, एक पासपोर्ट और फर्म की मुहर बरामद की गई।
कई राज्यों में फैला जाल
पुलिस के अनुसार,आरोपियों ने पूछताछ में बड़ा खुलासा किया। वे पीड़िता को लगातार कॉल पर रोके रखते थे और परिवार या किसी परिचित से संपर्क नहीं करने देते थे। ठगी के बाद रुपये तुरंत अन्य खातों में ट्रांसफर कर दिए जाते थे।
जांच में यह भी सामने आया कि जिस बैंक खाते का इस्तेमाल किया गया, उससे उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और उत्तराखंड समेत सात राज्यों में कई लोगों को इसी तरह डिजिटल अरेस्ट ठगी का शिकार बनाया गया है।
पुलिस ने कहा कि मामले से जुड़े सभी राज्यों की एजेंसियों को सूचना भेजी जा रही है।
क्या है डिजिटल अरेस्ट ठगी?
- साइबर अपराधी खुद को पुलिस या सरकारी अधिकारी बताकर कॉल करते हैं।
- पीड़ित को मनी लॉन्ड्रिंग या आपराधिक मामले में फंसाने की धमकी दी जाती है।
- व्हाट्सएप वीडियो कॉल पर लगातार नजर रखी जाती है और उसे “डिजिटल अरेस्ट” कहा जाता है।
- पीड़ित से जांच या सत्यापन के नाम पर मोटी रकम ट्रांसफर करवाई जाती है।




