कहते हैं कि अगर सोच नई हो और इरादा मजबूत, तो कचरे से भी खजाना बनाया जा सकता है। मुंबई के दो दोस्त रमेश धामी और श्रियांश भंडारी ने इसे सच कर दिखाया। दोनों ने मिलकर ग्रीन सोल फाउंडेशन की शुरुआत की और पुराने बेकार जूतों को रीसायकल करके न सिर्फ जरूरतमंदों की मदद की बल्कि खुद भी करोड़पति बन गए।
कैसे शुरू हुई पहल?
यह कहानी साल 2016 से शुरू होती है, जब उत्तराखंड के रमेश धामी और राजस्थान उदयपुर के श्रियांश भंडारी की दोस्ती हुई। रमेश को मैराथन दौड़ने का शौक था, लेकिन उनके महंगे जूते बार-बार खराब हो जाते थे। एक बार उन्होंने अपना फटा हुआ जूता खुद ठीक किया और देखा कि वह लंबे समय तक टिक गया। इसी अनुभव ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर किया कि क्यों न बेकार हो चुके जूतों को नया जीवन दिया जाए।
यहीं से श्रियांश ने रमेश का साथ दिया और दोनों ने मिलकर ग्रीन सोल फाउंडेशन की स्थापना की।
ग्रीन सोल फाउंडेशन की उपलब्धियां
- अब तक 8 लाख से ज्यादा जूते-चप्पल रीसायकल कर जरूरतमंदों तक पहुंचाए।
- हर महीने लगभग 25,000 लोग इनके बनाए जूते इस्तेमाल करते हैं।
- पुराने जूतों के अलावा संस्था स्कूल बैग और चटाइयां भी तैयार करती है।
- रीसाइकल किए गए इन उत्पादों की कीमत सामान्य बाजार से काफी कम होती है।
पर्यावरण और समाज दोनों को लाभ
ग्रीन सोल फाउंडेशन न केवल गरीब और जरूरतमंद बच्चों को जूते उपलब्ध कराता है बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी बड़ी भूमिका निभा रहा है। जूतों को कूड़े में फेंकने के बजाय रीसायकल कर नया जीवन देना एक अनोखी पहल है। यही कारण है कि इनके बनाए जूते और सामान सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और अनाथालयों तक भी भेजे जाते हैं।
रमेश और श्रियांश ने साबित कर दिया कि इनोवेशन और सामाजिक सोच मिलकर बड़ा बदलाव ला सकती है। बेकार जूतों को रीसायकल कर उन्होंने न केवल हजारों जरूरतमंदों की जिंदगी आसान बनाई बल्कि खुद को सफलता की ऊंचाई पर पहुंचा दिया।



