उत्तराखंड सचिवालय, जो कभी प्रशासनिक गरिमा और पारदर्शिता का प्रतीक माना जाता था, अब भ्रष्टाचार और मनमानी का गढ़ बन चुका है।
सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री ने अपने अधीनस्थों को साफ निर्देश दिए हैं कि सचिवालय के उन दागी अधिकारियों की गोपनीय फाइल तैयार की जाए, जिन्होंने वर्षों से राजनीतिक रसूख और विभागीय पकड़ का इस्तेमाल कर मनमानी की है।
मुख्यमंत्री की सीधी पकड़, अब होगी कार्रवाई
पिछले छह महीनों में मुख्यमंत्री ने कई अनुभाग अधिकारियों और समीक्षा अधिकारियों पर सीधा हस्तक्षेप किया है। भ्रष्टाचार और अनियमितताओं में फंसे कई अफसरों को उनके विभागों से हटाया जा चुका है।
सूत्र बताते हैं कि सचिवालय में बैठे कुछ अधिकारी अपने वरिष्ठ आईएएस तक को दरकिनार कर विभाग को अपनी मर्जी से चला रहे थे।
अनुभाग अधिकारी का साम्राज्य
सबसे चर्चित मामला अनुभाग अधिकारी का रहा, जिसने सचिवालय प्रशासन में वर्षों तक मनमानी की। जांच में खुलासा हुआ कि उनकी फाइलें सीधे अपर मुख्य सचिव को भेजी जा रही थीं।
इतना ही नहीं, हाल ही में उन्होंने 10 अधिकारियों की डीपीसी (Departmental Promotion Committee) के बाद विभाग आवंटन की फाइल एक महीने तक दबाकर रखी। मामला मुख्यमंत्री तक पहुंचा तो तत्काल उन्हें विभाग से हटा दिया गया।
‘नेता टाइप’ अधिकारी और डीपीसी का खेल
सचिवालय सेवा का एक और अधिकारी सुविधा शुल्क लेकर गलत डीपीसी कराने के आरोप में सुर्खियों में आया। जांच में दोषी पाए जाने के बाद प्रतिकूल प्रविष्टि का प्रस्ताव भेजा गया, लेकिन राजनीतिक दबाव में फाइल दब गई। यही नहीं, इस अधिकारी पर फर्जी हस्ताक्षर से ट्रांसफर कराने का भी आरोप लगा, जिसके चलते एफआईआर दर्ज हुई, लेकिन जिम्मेदारी जूनियर पर डालकर मामला दबा दिया गया।
‘आरडीएक्स’ नाम से कुख्यात अफसर
सचिवालय का एक अधिकारी ‘आरडीएक्स’ नाम से कुख्यात है। वित्त विभाग में रहते हुए उसने कई महत्वपूर्ण फाइलें गायब कर दीं। मुख्यमंत्री की नाराजगी के बाद उसे विभाग से हटाना पड़ा। उस पर मंत्री से जुड़े मामलों को निपटाने के एवज में लाखों रुपये वसूलने के आरोप भी लगे।
महिला अफसर भी पीछे नहीं
भ्रष्टाचार के मामलों में महिला अधिकारी भी शामिल रही हैं। एक महिला अनुभाग अधिकारी पर आरोप है कि उसने विभागीय ढांचा बढ़ाने वाली फाइल पर ₹15 लाख लिए। दूसरी महिला अधिकारी ‘मिस 50,000’ के नाम से मशहूर है, क्योंकि हर मालदार फाइल पर सिग्नेचर की उनकी दर ₹50,000 तय है।
मुख्यमंत्री कार्यालय के स्थायी सदस्य
एक अधिकारी ऐसा भी है जो पिछले 20 साल से मुख्यमंत्री कार्यालय में जमे हुए हैं। चार प्रमोशन पाने के बावजूद उन्होंने कभी मुख्यमंत्री कार्यालय से बाहर कदम नहीं रखा। इनकी वजह से सचिवालय कार्मिकों की स्थानांतरण नीति बार-बार ध्वस्त हुई।
आईएएस अफसर भी राडार पर
सिर्फ सचिवालय सेवा ही नहीं, बल्कि पांच आईएएस अधिकारी भी मुख्यमंत्री की निगरानी सूची में हैं। इनमें से एक दंपति ने लंदन में संपत्ति खरीदी और उसकी देखरेख के लिए बारी-बारी विदेश जाते रहे। वहीं, एक अन्य आईएएस पर आपदा को अवसर बनाकर 50 से अधिक इंजीनियरों के तबादले कराने और करोड़ों रुपये कमाने के आरोप हैं।
सचिवालय की साख दांव पर
पिछले दस वर्षों में सचिवालय की गरिमा और परंपराएं लगातार गिरावट पर हैं। प्रमुख सचिव और सचिव स्तर के अफसरों पर भी आरोप है कि वे अपने चहेते अनुभाग अधिकारियों को मनमानी की छूट देते हैं और ईमानदार अफसरों को किनारे कर देते हैं। यही वजह है कि सचिवालय आज भ्रष्टाचार की प्रयोगशाला में तब्दील हो गया है।



