- उत्तरकाशी के मोरी में 16 हजार से घटकर 3 से 3.5 हजार मीट्रिक टन रह गया उत्पादन, पुरोला-नौगांव में सामान्य उत्पादन का महज 10-20 प्रतिशत
- मंडी में स्थानीय सेब की आवक 70 फीसदी तक घटी, खराब गुणवत्ता के चलते 60-70 रुपये किलो तक गिरे दाम
उत्तरकाशी/देहरादून/6 सितंबर।नीरज उत्तराखंडी
उत्तराखंड के सेब उत्पादक क्षेत्रों में इस वर्ष मौसम की बेरुखी ने बागवानों की उम्मीदों को बड़ा झटका दिया है। असमय बारिश, फ्लावरिंग के दौरान मौसम में बदलाव और ओलावृष्टि के कारण जहां सेब की पैदावार में भारी गिरावट आई है, वहीं पेड़ों पर बचे फल की गुणवत्ता भी प्रभावित हुई है। कई क्षेत्रों में सेब दागदार और काला पड़ने के कारण बाजार में कम कीमत पर बिक रहा है। उत्पादन और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होने से बागवानों को दोहरी आर्थिक मार झेलनी पड़ रही है।
मोरी में 16 हजार से घटकर 3-3.5 हजार मीट्रिक टन उत्पादन
उत्तरकाशी जिले में सबसे अधिक सेब उत्पादन वाले मोरी क्षेत्र में इस बार हालात बेहद खराब बताए जा रहे हैं। सामान्य वर्षों में यहां करीब 16 हजार मीट्रिक टन सेब का उत्पादन होता है, लेकिन इस वर्ष उत्पादन घटकर महज तीन से साढ़े तीन हजार मीट्रिक टन रहने का अनुमान है।
वहीं पुरोला और नौगांव में भी सेब की स्थिति चिंताजनक है। इन दोनों क्षेत्रों में सामान्य परिस्थितियों में करीब 8 से 9 हजार मीट्रिक टन सेब का उत्पादन होता है, लेकिन इस वर्ष सामान्य उत्पादन का केवल 10 से 20 प्रतिशत ही सेब हो पाया है।
जिले के यमुना घाटी क्षेत्र में मोरी, पुरोला और नौगांव तथा गंगा घाटी के हर्षिल क्षेत्र में बड़े पैमाने पर सेब की खेती होती है। सामान्य वर्षों में उत्तरकाशी जिले में करीब 25 से 30 हजार मीट्रिक टन सेब का उत्पादन होता है। इस बार मौसम की मार के कारण यह आंकड़ा काफी नीचे आने की आशंका है।
बागवानों जगमोहन चंद, मनमोहन सिंह, चैन सिंह, प्रदीप गोयल, विरेन्द्र चौहान, भोपाल दत्त जोशी, किशोर सिंह राणा, के अनुसार मार्च-अप्रैल में सेब के पेड़ों में फ्लावरिंग के समय बारिश और मौसम में लगातार बदलाव हुआ। इसके कारण फल सेट नहीं हो पाया और उत्पादन पर सीधा असर पड़ा।
मंडी में स्थानीय सेब की आवक 70 फीसदी तक कम
उत्तरकाशी और देहरादून की मंडियों में भी मौसम की मार का असर साफ दिखाई दे रहा है। स्थानीय सेब की आवक पिछले वर्ष की तुलना में करीब 70 फीसदी तक घट गई है। पिछले वर्ष इस समय मंडी में रोजाना लगभग 10 हजार पेटी सेब पहुंच रहा था, जबकि इस बार यह आंकड़ा घटकर केवल 2500 से 3000 पेटी प्रतिदिन रह गया है।
मंडी में करीब दो सप्ताह पहले से सेब की आवक शुरू हुई थी। शुरुआती दौर में हिमाचल और इसके बाद उत्तरकाशी के मोरी तथा देहरादून के त्यूणी क्षेत्र से सेब पहुंचा। शुरुआत में स्थानीय सेब 80 से 90 रुपये प्रति किलो तक बिका, लेकिन जैसे-जैसे खराब गुणवत्ता वाली फसल मंडी में पहुंची, इसके दाम गिरते चले गए।
वर्तमान में त्यूणी और मोरी क्षेत्र से आने वाले कई सेब काले पड़ने तथा दागदार होने के कारण थोक बाजार में केवल 60 से 70 रुपये प्रति किलो तक बिक रहे हैं।
फल कारोबारी जीसीआर व असगर के अनुसार स्थानीय सेब के दाम गिरने की प्रमुख वजह इसकी खराब गुणवत्ता है। दागदार अथवा काला पड़ा सेब देखने में आकर्षक नहीं होने के कारण खरीदार इसकी कम कीमत लगाते हैं।
हिमाचल के अच्छे सेब से दोगुने तक का अंतर
स्थानीय सेब की खराब गुणवत्ता का असर उसके बाजार भाव पर भी पड़ रहा है। मंडी में जहां उत्तराखंड के प्रभावित क्षेत्रों का सेब 60 से 70 रुपये किलो तक बिक रहा है, वहीं हिमाचल प्रदेश के अच्छी गुणवत्ता वाले सेब को 120 से 130 रुपये किलो तक थोक भाव मिल रहा है।
इससे स्थानीय बागवानों की परेशानी और बढ़ गई है। एक ओर उत्पादन कम हुआ है और दूसरी ओर जो फल तैयार हुआ, उसकी गुणवत्ता खराब होने के कारण उसका उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है।
ज्योतिर्मठ में ओलावृष्टि ने आधा किया सेब उत्पादन
चमोली जिले के ज्योतिर्मठ क्षेत्र में भी अत्यधिक ओलावृष्टि ने सेब उत्पादन को बड़ा नुकसान पहुंचाया है। क्षेत्र में पिछले वर्ष करीब 300 मीट्रिक टन सेब का उत्पादन हुआ था, लेकिन इस वर्ष यह घटकर लगभग 150 मीट्रिक टन रह गया है।
सुनील, औली, परसारी, मेरग, बड़ागांव, उर्गम, सलूड़ सहित नीती घाटी के कई गांवों में सेब का उत्पादन होता है। मार्च-अप्रैल में हुई भारी ओलावृष्टि से बड़ी संख्या में सेब के फूल और फल झड़ गए। पेड़ों पर जो फल बचा, उसमें भी ओलावृष्टि के कारण दाग पड़ गए।
कश्मीरी सेब की भी मंडी में दस्तक
स्थानीय और हिमाचली सेब के साथ अब मंडी में कश्मीर के सेब की आवक भी शुरू हो गई है। बेहतर गुणवत्ता और आकर्षक रूप के कारण कश्मीरी सेब को शुरुआती दौर में करीब 130 रुपये प्रति किलो तक का थोक भाव मिल रहा है।
आने वाले दिनों में कश्मीर से सेब की आवक बढ़ने की संभावना है। इसके साथ ही चमोली और उत्तरकाशी के अन्य सेब उत्पादक क्षेत्रों से भी फसल मंडियों में पहुंचने लगेगी।
बागवानों के सामने बढ़ी आर्थिक चुनौती
सेब उत्पादन में आई भारी गिरावट केवल बागवानों की आय तक सीमित समस्या नहीं है। इससे स्थानीय मंडियों, परिवहन, पैकिंग, मजदूरी और फल कारोबार से जुड़े लोगों की आर्थिक गतिविधियां भी प्रभावित होंगी।
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में सेब बागवानी हजारों परिवारों की आजीविका का प्रमुख आधार है। ऐसे में लगातार बदलता मौसम, असमय बारिश और ओलावृष्टि बागवानों के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। इस वर्ष के आंकड़े बताते हैं कि मौसम की एक असामान्य मार किस तरह पूरे उत्पादन चक्र को प्रभावित कर सकती है।
बागवानों की मांग है कि फसल क्षति का वास्तविक आकलन कर उन्हें उचित मुआवजा और राहत दी जाए तथा मौसम आधारित कृषि बीमा और वैज्ञानिक बागवानी तकनीकों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए, ताकि भविष्य में ऐसी प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।


