- BRIDCUL के निर्माण कार्यों पर उठे सवाल
- कहीं पुल का स्पान 36 से 42 और फिर 60 मीटर हुआ, कहीं धीमी प्रगति पर ठेका समाप्त; सौर-ओसला में गुणवत्ता जांच के बाद परियोजना प्रबंधक निलंबित
- उत्तरकाशी में करोड़ों की परियोजनाओं की लागत, संशोधित DPR और वास्तविक भुगतान का पूरा हिसाब अब भी जांच के घेरे में
उत्तरकाशी।31 अक्तूबर
रिपोर्ट–नीरज उत्तराखंडी
उत्तरकाशी की दुर्गम यमुना घाटी में सड़क और पुल निर्माण के लिए उत्तराखंड ब्रिज, रोपवेज, टनल एंड अदर इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (BRIDCUL) की ओर से कराए जा रहे कार्यों की पड़ताल में परियोजनाओं की लागत, डिजाइन में बदलाव, ठेकों की समाप्ति, पुनर्निविदा और निर्माण गुणवत्ता को लेकर कई गंभीर सवाल सामने आए हैं।
उपलब्ध सरकारी अभिलेख बताते हैं कि कुछ परियोजनाओं में मूल स्वीकृति और बाद की लागत में अंतर आया, जबकि कम से कम एक पुल का ठेका धीमी प्रगति के कारण समाप्त किया गया और दूसरे निर्माण में गुणवत्ता संबंधी प्राथमिक जांच के बाद विभागीय कार्रवाई हुई।
हालांकि उपलब्ध दस्तावेजों से सीधे किसी वित्तीय घोटाले का निष्कर्ष निकालना अभी उचित नहीं होगा। लेकिन मूल DPR, संशोधित DPR, तकनीकी स्वीकृति, माप पुस्तिका, भुगतान बिल और अंतिम जांच रिपोर्ट के मिलान की जरूरत स्पष्ट रूप से सामने आती है।
36 मीटर से 42 और फिर 60 मीटर तक पहुंचा पुल का डिजाइन
पड़ताल का सबसे अहम मामला राणा-बनास–दुर्बिल मोटर मार्ग के किमी एक का सामने आया है। उपलब्ध PMGSY रिकॉर्ड में यहां मूल रूप से 36 मीटर स्पान स्टील गर्डर पुल का प्रावधान था। इसके निर्माण के लिए BRIDCUL के माध्यम से निविदा प्रक्रिया हुई और उपलब्ध परिणाम रिकॉर्ड में ठेका लगभग 1.60 करोड़ रुपये का बताया गया है।
बाद की प्रगति संबंधी जानकारी में इसी पुल का स्पान 36 से बढ़ाकर 42 मीटर किए जाने का उल्लेख मिलता है। इसके पीछे साइट कंडीशन को कारण बताया गया तथा नई DPR तैयार कर स्वीकृति लेने की बात दर्ज है। उपलब्ध रिकॉर्ड में इस चरण पर करीब 42.44 लाख रुपये व्यय भी दर्ज है।
लेकिन मामला यहीं नहीं रुका। BRIDCUL ने मार्च 2024 में इसी किमी एक पर 60 मीटर स्पान मोटर ब्रिज के डिजाइन एवं प्लानिंग के लिए कंसल्टेंसी आमंत्रित की।
अब सवाल यह है कि आखिर एक ही स्थान पर पुल का स्पान पहले 36, फिर 42 और बाद में 60 मीटर करने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या नदी की हाइड्रोलॉजी, बाढ़ स्तर अथवा साइट की वास्तविक स्थिति में बदलाव आया? क्या 42 मीटर की संशोधित DPR स्वीकृत हुई? यदि हुई तो 60 मीटर की नई डिजाइन की आवश्यकता क्यों पड़ी? और मूल पुल पर खर्च धनराशि का समायोजन किस प्रकार किया जाएगा?
इन सवालों का जवाब संबंधित DPR और तकनीकी स्वीकृति फाइल से ही स्पष्ट होगा।
जखोल-लिवाड़ी में धीमी प्रगति पर ठेका हुआ समाप्त
जखोल-लिवाड़ी मोटर मार्ग के किमी 15 पर 42 मीटर स्पान पुल की कहानी भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। उपलब्ध प्रगति दस्तावेज में परियोजना की स्वीकृत लागत करीब 2.57 करोड़ रुपये दर्ज है, जबकि उस समय तक 1.086 करोड़ रुपये से अधिक व्यय बताया गया।
रिकॉर्ड में काम की धीमी प्रगति के कारण कार्य अनुबंध समाप्त किए जाने तथा पुनर्निविदा की प्रक्रिया शुरू किए जाने का उल्लेख है।
बाद में इस पुल के बैलेंस वर्क के लिए लगभग 1.32 करोड़ रुपये का टेंडर सामने आया, लेकिन वह निविदा भी बाद में रद्द हो गई।
इससे सवाल उठता है कि करोड़ों की परियोजना में पहले ठेका समाप्त होने की नौबत क्यों आई और उसके बाद बैलेंस वर्क की निविदा क्यों रद्द करनी पड़ी? मूल ठेकेदार को कितना भुगतान हुआ और अधूरे काम को पूरा कराने में अतिरिक्त कितना खर्च आएगा—इसका जवाब भुगतान अभिलेख और टर्मिनेशन फाइल से ही मिलेगा।
सौड़-ओसला के दो पुल : लागत बढ़ी, गुणवत्ता पर भी सवाल
सौड़-ओसला मोटर मार्ग पर दो 30 मीटर स्पान स्टील गर्डर पुलों का मामला भी जांच के केंद्र में है। उपलब्ध प्रगति रिकॉर्ड में पहले पुल की स्वीकृत लागत करीब 2.19 करोड़ रुपये और दूसरे की करीब 1.89 करोड़ रुपये दर्ज है। दोनों को मिलाकर मूल स्वीकृत लागत लगभग 4.08 करोड़ रुपये बैठती है।
बाद के उपलब्ध विवरण में इनकी लागत क्रमशः करीब 2.57 करोड़ और 2.26 करोड़ रुपये बताई गई है। यानी दोनों परियोजनाओं में मिलाकर करीब 75 लाख रुपये का अंतर दिखाई देता है।
यह अंतर वास्तविक अतिरिक्त खर्च है या संशोधित स्वीकृति/लागत का परिणाम—इसकी पुष्टि संशोधित DPR और variation statement से होना बाकी है।
गुणवत्ता विवाद ने मामले को और गंभीर बनाया
इसी क्षेत्र में निर्माणाधीन पुल के संबंध में विभागीय प्राथमिक जांच में निर्माण सामग्री और प्लम कंक्रीट के उपयोग को लेकर अनियमितताएं सामने आने की रिपोर्टें प्रकाशित हुईं। इसके बाद BRIDCUL के परियोजना प्रबंधक अजय कुमार को निलंबित किया गया।
विभागीय कार्रवाई के बावजूद अभी यह स्पष्ट होना बाकी है कि दोषपूर्ण कार्य का कितना हिस्सा हटाया गया, कितना पुनर्निर्माण हुआ, उसका खर्च किसके खाते में गया और संबंधित ठेकेदार के विरुद्ध अंतिम कार्रवाई क्या हुई।
यहां अंतिम निष्कर्ष के लिए Final Inquiry Report और Material Testing Reports निर्णायक होंगी।
डाबरकोट-कुठार : वन स्वीकृति और बाद की लागत में अंतर
डाबरकोट-कुठार मोटर मार्ग की पड़ताल में भी लागत से जुड़ा महत्वपूर्ण अंतर सामने आया है।
वन स्वीकृति संबंधी अभिलेख में Stage-I के लिए करीब 4.10 करोड़ रुपये की परियोजना लागत का उल्लेख है। दूसरी ओर बाद के PMGSY/प्रगति रिकॉर्ड में Stage-I की लागत करीब 6.26 करोड़ रुपये और Stage-II की करीब 5.48 करोड़ रुपये दर्ज है।
यानी केवल Stage-I में ही लगभग 2.16 करोड़ रुपये का अंतर दिखाई देता है।
यह जरूरी नहीं कि यह राशि अनियमित रूप से बढ़ाई गई हो। सड़क निर्माण में संशोधित DPR, अतिरिक्त सुरक्षा कार्य, रिटेनिंग वॉल, वन प्रतिपूरक मद, दर वृद्धि अथवा अन्य तकनीकी कारणों से लागत संशोधित हो सकती है। लेकिन इतनी बड़ी वृद्धि के लिए संशोधित प्रशासनिक एवं तकनीकी स्वीकृति की जांच आवश्यक है।
वन स्वीकृति रिकॉर्ड में Stage-I के लिए करीब 5.6 हेक्टेयर वन भूमि की आवश्यकता भी दर्ज है।
चिन्यालीसौड़ में 8.15 करोड़ रुपये के दो पैकेज
BRIDCUL ने राजकीय डिग्री कॉलेज चिन्यालीसौड़ में परीक्षा भवन एवं मल्टीस्किल डेवलपमेंट सेंटर के निर्माण के लिए करीब 7.55 करोड़ रुपये का सिविल वर्क टेंडर निकाला है। इसके अलावा इसी परियोजना से संबंधित इलेक्ट्रिकल एंड एलाइड वर्क का अलग टेंडर करीब 60.57 लाख रुपये का है।
दोनों निविदा मूल्यों को जोड़ने पर राशि करीब 8.16 करोड़ रुपये होती है।
हालांकि इसे परियोजना की अंतिम लागत कहना अभी उचित नहीं होगा। दोनों पैकेजों की मूल BOQ में किसी मद की पुनरावृत्ति तो नहीं है, इसकी पुष्टि के लिए दोनों BOQ का तकनीकी मिलान जरूरी है।
यमुनोत्री में हेलिपैड और पैदल पुल की अलग-अलग परियोजनाएं
यमुनोत्री धाम में हेलिपैड से संबंधित कार्य भी BRIDCUL के दायरे में सामने आए हैं। हेलिपैड के लिए करीब 55.13 लाख रुपये की निविदा दूसरी बार जारी होने का रिकॉर्ड है।
वहीं हेलिपैड तक पहुंच के लिए प्रस्तावित पैदल पुल की निविदा करीब 95.52 लाख रुपये की थी और कार्य अवधि 365 दिन रखी गई थी।
अब 2026 के अंतिम चरण में दोनों परियोजनाओं की वास्तविक स्थिति—कार्यादेश, भौतिक प्रगति, समयवृद्धि और भुगतान—की पुष्टि जरूरी है।
पुरोला में सड़क और अस्पताल की परियोजनाएं भी जांच के दायरे में
राजकीय पीजी कॉलेज पुरोला की एप्रोच रोड के लिए BRIDCUL ने करीब 1.17 करोड़ रुपये की निविदा जारी की। उपलब्ध निविदा परिणामों में करीब 1.20 करोड़ रुपये की सफल बोली का संकेत मिलता है।
उप जिला चिकित्सालय पुरोला में तीन लिफ्ट लगाने के लिए करीब 93.10 लाख रुपये का टेंडर भी सामने आया है। इसकी कार्य अवधि 540 दिन निर्धारित की गई थी।
इन दोनों परियोजनाओं में अब असली सवाल निविदा से आगे का है—क्या कार्यादेश जारी हुआ, काम शुरू हुआ, कितना भुगतान हुआ और मौके पर कितनी प्रगति है?
कुल तस्वीर क्या कहती है?
उपलब्ध 2024 के प्रमुख BRIDCUL/PMGSY अभिलेखों में ही डाबरकोट-कुठार, राणा-बनास-दुर्बिल, सौड़-ओसला और जखोल-लिवाड़ी जैसे छह प्रमुख कार्यों की मूल स्वीकृत लागत करीब 19.65 करोड़ रुपये बैठती है।
इसके अतिरिक्त 2026 में चिन्यालीसौड़ की करीब 8.16 करोड़ रुपये की दो निविदाएं, पुरोला, यमुनोत्री और अन्य कार्य अलग हैं।
इससे साफ है कि उत्तरकाशी में BRIDCUL का निर्माण कार्य करोड़ों रुपये के बड़े सार्वजनिक निवेश से जुड़ा है।
लेकिन इन सभी रकमों को जोड़कर BRIDCUL के उत्तरकाशी में कुल खर्च का आंकड़ा घोषित करना अभी उचित नहीं होगा, क्योंकि अलग-अलग वर्षों में स्वीकृत, संशोधित, निविदा और वास्तविक भुगतान की रकम अलग-अलग है।
चार मामले सबसे ज्यादा सवाल खड़े करते हैं
पड़ताल के आधार पर फिलहाल चार परियोजनाएं विशेष जांच की मांग करती हैं—
- पहली—राणा-बनास–दुर्बिल, जहां पुल का डिजाइन 36 से 42 और फिर 60 मीटर तक पहुंचता दिखाई देता है।
- दूसरी—जखोल–लिवाड़ी, जहां धीमी प्रगति के कारण ठेका समाप्त हुआ और बाद का बैलेंस वर्क टेंडर भी रद्द हो गया।
- तीसरी—सौड़–ओसला, जहां लागत में बदलाव के साथ निर्माण गुणवत्ता पर विभागीय कार्रवाई हुई।
- चौथी—डाबरकोट–कुठार, जहां वन स्वीकृति में दर्ज लागत और बाद के परियोजना रिकॉर्ड में उल्लेखित लागत में उल्लेखनीय अंतर दिखाई देता है।
अब गेंद BRIDCUL के पाले में
इन मामलों में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले BRIDCUL से यह स्पष्ट होना चाहिए कि प्रत्येक परियोजना की मूल DPR, संशोधित DPR, प्रशासनिक एवं तकनीकी स्वीकृति, कार्यादेश, अनुबंध राशि, संशोधित लागत, माप पुस्तिका, भुगतान विवरण, गुणवत्ता परीक्षण और वर्तमान भौतिक प्रगति क्या है।
यही दस्तावेज यह तय करेंगे कि सामने आए अंतर सामान्य तकनीकी संशोधन और प्रशासनिक प्रक्रिया हैं या कहीं वित्तीय/तकनीकी अनियमितता भी हुई है।
उत्तरकाशी की जनता के पैसे से बन रहे इन पुलों और सड़कों की असली परीक्षा कागजों पर नहीं, मौके पर होनी है—कितना पैसा लगा और उसके बदले जमीन पर कितना मजबूत निर्माण खड़ा हुआ।






