देहरादून/नैनीताल: उत्तराखंड में वनाग्नि प्रबंधन को लेकर एक बड़ा विवाद सामने आया है। फायर लाइन के खर्च का हिसाब मांगने के बाद संजीव चतुर्वेदी (मुख्य वन संरक्षक) को नोडल अधिकारी पद से हटाए जाने पर कई सवाल खड़े हो गए हैं।
राज्य में हर साल वनाग्नि से करोड़ों की वन संपदा राख हो जाती है। ऐसे में फायर लाइन निर्माण और वनाग्नि प्रबंधन में पारदर्शिता बेहद जरूरी मानी जाती है।
फायर लाइन पर उठे सवाल
ब्रिटिश काल से वन विभाग जंगलों में आग रोकने के लिए फायर लाइन बनाता आ रहा है, लेकिन इसके बावजूद हर साल जंगलों में भीषण आग लगती है।
सूत्रों के मुताबिक, नैनीताल और ऊधम सिंह नगर के लिए नोडल अधिकारी बनाए गए संजीव चतुर्वेदी ने 4 अप्रैल को बैठक बुलाकर पिछले 10 वर्षों में फायर लाइन निर्माण पर हुए खर्च का पूरा हिसाब मांगा था।
खर्च का ब्योरा मांगना पड़ा भारी?
चतुर्वेदी ने अधिकारियों से 6 अप्रैल तक वनाग्नि प्रबंधन में खर्च की गई राशि और फायर वाचरों के बीमा से जुड़ी जानकारी भी मांगी थी।
लेकिन इसी दिन शाम को उन्हें हटाकर विवेक पांडे को नया नोडल अधिकारी नियुक्त कर दिया गया।
राजनीतिक दबाव की चर्चा
सूत्रों का दावा है कि एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस कार्रवाई के पीछे “राजनीतिक दबाव” का हवाला दिया। इससे यह सवाल उठने लगा है कि आखिर फायर लाइन के खर्च का खुलासा कौन नहीं होने देना चाहता।
वहीं, रंजन मिश्रा (प्रमुख वन संरक्षक) ने कहा कि नोडल अधिकारियों का बदलाव “सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया” के तहत किया गया है।
इस पूरे मामले ने वन विभाग की कार्यप्रणाली और वनाग्नि प्रबंधन में पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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