- अमृत 2.0: सहस्रधारा पेयजल योजना अब पेयजल निगम को हस्तांतरित, 2 दिन में रिकॉर्ड सौंपने के निर्देश
देहरादून, 28 अप्रैल 2026।
अमृत 2.0 योजना के तहत देहरादून की महत्वपूर्ण सहस्रधारा पेयजल योजना को लेकर बड़ा प्रशासनिक फैसला लिया गया है। उत्तराखंड शासन ने इस योजना के निर्माण कार्यों को उत्तराखंड पेयजल निगम को हस्तांतरित करने का निर्णय लिया है।
इसके पीछे समय-सीमा में पूरा करने का तर्क दिया जा रहा है, जबकि जल निगम के पास कई योजनाएं वर्षों से लंबित पड़ी है और जल निगम लगातार इस तरह के निर्माण कार्यों में घोटालों को लेकर काफी चर्चित है।
शासन के इस औचक निर्णय को लेकर विभिन्न तरह की चर्चाएं चल रही है सवाल उठ रहा है कि आखिर किसको उपकृत करने के लिए इस तरह का निर्णय लिया गया और किसके इशारे पर यह कार्य अंजाम दिया गया !
गौरतलब है कि जल संस्थान ने अपने स्तर से सहस्रधारा पेयजल योजना से संबंधित सभी प्राक्कलन, सर्वे रिपोर्ट तैयार कर दी थी फिर ऐसा क्या कारण था कि जल संस्थान द्वारा तैयार सभी प्राक्कलन और सर्वे रिपोर्ट सहित यह कार्य पेयजल निगम को सौंप दिया गया !
शासन की ओर से जारी पत्र के अनुसार, सहस्रधारा पेयजल योजना की निर्माण लागत करीब 92.43 करोड़ रुपये है, जिसे 5 मार्च 2026 को व्यय वित्त समिति की बैठक में अनुमोदित किया जा चुका है।

2 दिन में सौंपनी होगी पूरी फाइल
शासन ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि सहस्रधारा पेयजल योजना से संबंधित सभी प्राक्कलन, सर्वे रिपोर्ट और अन्य अभिलेख दो दिनों के भीतर उत्तराखंड पेयजल निगम को हस्तांतरित किए जाएं। इसके बाद योजना से जुड़ी सभी आगामी कार्यवाही पेयजल निगम स्तर से ही पूरी की जाएगी।
तेजी से काम पूरा करने पर जोर
शासन का मानना है कि इस बदलाव से योजना के निर्माण कार्यों में तेजी आएगी और निर्धारित समय-सीमा के भीतर परियोजना को पूरा किया जा सकेगा। देहरादून शहर के लिए यह योजना बेहद अहम मानी जा रही है, जिससे पेयजल आपूर्ति व्यवस्था को मजबूत करने में मदद मिलेगी।
प्रशासनिक स्तर पर सख्ती
पत्र में साफ संकेत दिए गए हैं कि अब किसी भी प्रकार की देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी और संबंधित विभागों को समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी।
पर्वत जन ने जब शासन के इस निर्णय को लेकर जल संस्थान के अधिकारियों से कारण जानना चाहा तो किसी ने भी कुछ कहने साफ-साफ मना कर दिया।
पहले भी कई विभागों में ऐसा होता रहा है। उदाहरण के तौर पर किसी सड़क का प्राकलन और सर्वे लोक निर्माण विभाग या ब्रिडकुल करता था तो फिर उनसे वापस काम लेकर उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम को सौंप दिया जाता था।
शासन के इस वाचक निर्णय पर सवाल खड़े हो रहे हैं कि आखिर क्या कारण है कि जब दोनों विभाग सरकारी हैं तो एक विभाग को क्या सरकार नकारा मान चुकी है ! और दूसरे विभाग पर ऐसे क्या खासियत है जो उस पर ऐसी मेहरबानी की जा रही है !




