एक्सक्लूसिव: महिला तकनीकी संस्थान पर सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला!

लंबे समय से आंदोलन का शिकार रहे देहरादून के महिला तकनीकी संस्थान पर आज सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने 2 से 3 महीने के अंदर-अंदर नियमित निदेशक और नियमित स्टाफ की भर्ती के विषय में निर्देश जारी किए हैं।

सुप्रीम कोर्ट आर्डर 

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह यूनिवर्सिटी एक्ट 2005 के अंतर्गत 3 महीने की समय सीमा के अंदर-अंदर तमाम रेगुलेशन निर्मित करें और उसी के अनुसार निदेशक तथा रेगुलर स्टाफ की नियुक्ति सुनिश्चित करें। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस बात का जरूर ध्यान रखा जाए कि रेगुलर निदेशक की नियुक्ति के बाद ही रेगुलर स्टाफ की नियुक्ति की जाए।

गौरतलब है कि महिला तकनीकी संस्थान में कार्यरत अध्यापक कॉन्ट्रैक्ट रिनुअल प्रक्रिया में भाग न लेकर  महिला तकनीकी संस्थान की निदेशक अलकनंदा अशोक के द्वारा की गई प्रक्रिया के खिलाफ पहले हाई कोर्ट गए थे किंतु हाई कोर्ट द्वारा प्रक्रिया अपनाते हुए हड़ताली शिक्षकों को अवसर देने हेतु कहा हाईकोर्ट के आदेशों के पालन करने के बजाय यह मामला सुप्रीम कोर्ट चला गया।

गौरतलब है कि महिला तकनीकी संस्थान का स्टाफ इस बात पर अड़ा हुआ था कि बिना किसी प्रक्रिया के  पहले उन्हें रेगुलर किया जाए, उसके बाद ही वे लोग अपनी हड़ताल वापस लेंगे। जबकि हाई कोर्ट ने उनको ताकीद की थी कि वे लोग पहले अपनी हड़ताल समाप्त करें तथा अध्यापन की व्यवस्थाएं ठीक करें। हाई कोर्ट ने कहा था कि वह अपने कॉन्ट्रैक्ट नवीनीकरण को लेकर कानून व्यवस्था को अपने हाथ में लेने जैसा कोई कार्य न करें, साथ ही उन्होंने निदेशक को सहानुभूति पूर्वक स्टाफ के हितों को प्रक्रिया अपनाते हुए बहाल करने के निर्देश भी दिए थे।

सुप्रीम कोर्ट  द्वारा 1.8.18 को स्टाफ की नियुक्ति as per law करने के निर्देश दिए। किंतु शिक्षकों द्वारा इस प्रक्रिया में भाग नहीं लिया गया, जिसका संज्ञान लेते हुए तथा स्टाफ के द्वारा तालाबंदी कर विद्यालय के पठन-पाठन को बाधित करने का संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस पर काफी नाराजगी जाहिर की। इसी बात को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें किसी भी तरह की राहत नहीं दी।

सुप्रीम कोर्ट ने भी हाई कोर्ट का ही फैसला लगभग यथावत रखा और निर्देश दिए कि रेगुलर स्टाफ की नए सिरे से ओपन प्रक्रिया में सभी योग्य अभ्यर्थियों को समान अवसर देते हुए योग्यता के आधार पर तैनाती की जाएगी। साथ ही यह नियुक्तियां बोर्ड ऑफ गवर्नर के अनुसार की जाएगी और निदेशक ही इन नियुक्तियों को करने के लिए अधिकृत रहेंगे।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने स्टाफ को इतनी राहत जरूर दी कि यदि इनके द्वारा संस्थान में कार्य किया गया है तो उनको काम करने के दौरान के वेतन तथा अन्य लाभ एक महीने के अंदर-अंदर दिए जाने सुनिश्चित किए जाएं। मामले की अगली सुनवाई फरवरी 2019 में रखी गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि कॉन्ट्रैक्ट फैकल्टी को रेगुलर किए जाने का कोई प्रावधान नहीं है इनको ओपन प्रक्रिया के तहत ही अवसर प्रदान किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा साफ किया गया कि नियमों और प्रक्रिया के पालन सभी को करना पड़ेगा। हड़ताली शिक्षकों के लिए यह एक बड़ा झटका माना जा रहा है।

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