मंदिरों से ‘मंदिर’ की राह पर हरदा।

 कुमार दुष्यंत/हरिद्वार
” विधानसभा चुनाव में दो स्थानों से मिली हार के बाद भविष्य में चुनाव लड़ने के सवाल पर ‘न’ कहने वाले हरदा एक बार फिर से फार्म में हैं।वह मंदिरों में मत्था टेकने के साथ-साथ पद-यात्राएं कर रहे हैं।गली-चौपालों में अपने समर्थकों संग मंत्रणाएं कर रहे हैं।रावत की इस सक्रियता को उनकी 2019 के लोकसभा चुनाव की तैयारियों के रुप में देखा जा रहा है।”

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पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत एकबार फिर से राजनीति में सक्रिय हो गये हैं।वह समर्थकों के साथ स्थान-स्थान पर मंदिरों में जाकर माथा टेक रहे हैं।कभी केदारनाथ तो कभी किसी अन्य मंदिर की पैदल यात्राएं कर रहे हैं।टपकेश्वर महादेव से अपनी मंदिर यात्राओं की शुरुआत करते हुए रावत ने कहा था कि वह इस मंदिर यात्रा से प्रदेश में विकास के उस मोदी मॉडल की तलाश करेंगे।जिसपर भरोसा कर सूबे की जनता ने उन्हें घर बैठा दिया।लेकिन मोदी मॉडल की तलाश से कहीं अधिक रावत की इस सक्रियता को उनकी आसन्न लोकसभा चुनाव की तैयारियों के रुप में देखा जा रहा है।
विधानसभा चुनाव की पराजय के बाद हरीश रावत कांग्रेस की मुख्यधारा से अलग-थलग हो गये थे।हार के साथ-साथ इसका दूसरा कारण संगठन में उनके विरोधी खेमे के लोगों का काबिज हो जाना भी था।इस बाबत जब पिछले दिनों ‘पर्वतजन’ ने उनसे सवाल किया था तो हरीश रावत का कहना था कि राजनीति में बने रहने के लिए संसाधनों की जरूरत होती है।जो उनके पास नहीं हैं।रावत ने भविष्य में चुनाव न लडने का भी ऐलान किया था।लेकिन अब कुछ समय के अंतराल बाद रावत फिर पूरे जोशो-खरोश से सक्रिय हो गये हैं।वह धर्मस्थलों में जा रहे हैं।भजन-कीर्तन कर रहे हैं और समर्थकों से मंत्रणा भी।माना जा रहा है कि उन्होंने आने वाले लोकसभा चुनाव में उतरने का मन बना लिया है।’मंदिर पॉलिटिक्स’ के बहाने वह अब 2019 में किला फतह करने की तैयारियों में हैं।
देखा जाए तो यह स्थिति कांग्रेस के लिए भी सुखद है।कांग्रेस में हरीश रावत का कद दमखम वाला है।वह सांसद, मुख्यमंत्री व केंद्र में मंत्री रह चुके हैं।वह जिस सीट से भी लडेंगे, विपक्ष के लिए वहां जीत आसान नहीं रह जाएगी।माना यही जा रहा है कि गुजरात, हिमाचल चुनावों में प्रचार के दौरान उन्हें केंद्रीय नेताओं से लोकसभा चुनाव की तैयारियों का ‘सिग्नल’ मिल चुका है।जिसके बाद वह दमखम के साथ लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुट गये हैं।
हरिद्वार या नैनीताल? 
हरीश रावत की सक्रियता के साथ यह सवाल भी उठने लगे हैं कि हरीश रावत अब किस सीट से लडेंगे? विधानसभा चुनाव की पराजय के बाद से उन्होंने हरिद्वार से दूरी सी बना ली थी।जबकि नैनीताल में उनकी गतिविधियां एकाएक   बढ गयी थी।इसलिए यह माना जाने लगा था कि 2014 में पत्नी रेणुका रावत व  गत विधानसभा चुनाव में हरिद्वार ग्रामीण से अपनी हार के बाद से रावत हरिद्वार के परिणामों  से नाखुश हैं।और अपनी सीट बदल सकते हैं।लेकिन अपनी ‘पुन:सक्रियता’ के साथ ही उन्होंने हरिद्वार में भी अपनी गतिविधियां बढ़ा दी हैं।हरिद्वार में पिछले दस सालों की सक्रियता में रावत ने न केवल कांग्रेस का ही जनाधार बढाया बल्कि अपने लिए भी समर्थकों का खासा वर्ग तैयार किया है।इसकी बदौलत ही रावत अठारह वर्ष के सत्ता के बनवास के बाद 2009 में हरिद्वार से सांसद चुनकर लोकसभा पहुंचने में कामयाब रहे थे।इसलिए अब वह इस सीट को बदलने का ‘रिस्क’ लेंगे, ऐसा नहीं लगता।वैसे भी घुमा-फिराकर बात करने में माहिर हरीश रावत हरिद्वार से चुनाव लडने के सवाल पर कह चुके हैं कि हरिद्वार सांसद रहते हुए उन्होंने इतना काम किया है कि यहां उन्हें कोई हरा नहीं सकता।नैनीताल के लिए वह स्वीकार करते हैं कि इस सीट पर पहले वहां के नेताओं का हक है।इससे पूरी उम्मीद यही है कि रावत 2019 में फिर हरिद्वार से ही हाथ आजमाएंगे।
  हरिद्वार व नैनीताल दोनों ही जगह हरीश रावत की सक्रियता बनी हुई है।वह कहां से चुनाव लडेंगे, यह तो वक्त बताएगा।लेकिन फिलहाल यह तय है कि रावत मंदिरों की राह चलकर लोकतंत्र के मंदिर यानि लोकसभा का मार्ग प्रशस्त कर लेना चाहते हैं। रावत की सक्रियता से न केवल उनके समर्थकों में ही उत्साह है।बल्कि कांग्रेस में भी स्फूर्ति का संचार है।

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