देहरादून। पतंजलि योगपीठ के महामंत्री और बाबा रामदेव के सहयोगी आचार्य बालकृष्ण को करीब डेढ़ दशक पुराने फर्जी दस्तावेज और पासपोर्ट से जुड़े मामले में बड़ी राहत मिली है। देहरादून की CBI कोर्ट ने उन्हें मामले में बरी कर दिया है। फैसले के दौरान आचार्य बालकृष्ण अदालत में मौजूद रहे।
यह मामला भारतीय पासपोर्ट हासिल करने के लिए कथित तौर पर फर्जी शैक्षणिक प्रमाण पत्र इस्तेमाल किए जाने के आरोपों से जुड़ा था। करीब 15 वर्षों तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद अदालत के फैसले से यह मामला अब आचार्य बालकृष्ण के पक्ष में समाप्त हो गया है।
क्या था पूरा मामला?
CBI की जांच के अनुसार, भारतीय पासपोर्ट हासिल करने के लिए बरेली स्थित पासपोर्ट कार्यालय में कुछ शैक्षणिक प्रमाण पत्र प्रस्तुत किए गए थे। जांच एजेंसी ने इन प्रमाण पत्रों को कथित तौर पर फर्जी बताया था।
इन दस्तावेजों का संबंध उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के खुर्जा स्थित राधाकृष्ण संस्कृत महाविद्यालय से बताया गया था। यह संस्थान सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी से संबद्ध था।
मामले में आरोप था कि इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर पासपोर्ट हासिल करने की प्रक्रिया पूरी की गई।
2011 में शुरू हुई कानूनी कार्रवाई
आचार्य बालकृष्ण के खिलाफ इस मामले में अप्रैल 2011 में शिकायत सामने आई थी। इसके बाद CBI ने जून 2011 में प्रारंभिक जांच यानी Preliminary Enquiry (PE) दर्ज की।
जांच आगे बढ़ने के बाद जुलाई 2011 में CBI ने मामले में FIR दर्ज की। FIR में आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और फर्जी दस्तावेज तैयार करने एवं इस्तेमाल करने से संबंधित धाराएं लगाई गई थीं।
CBI की FIR में IPC की धारा 120-B, 420, 468 और 471 के साथ पासपोर्ट अधिनियम की संबंधित धाराओं का भी उल्लेख किया गया था।
मामला सामने आने के बाद जुलाई 2011 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने आचार्य बालकृष्ण की गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगा दी थी। अदालत ने उन्हें अपना पासपोर्ट न्यायालय में जमा करने का निर्देश भी दिया था।
इसके बाद CBI ने अपनी जांच जारी रखी और जुलाई 2012 में विशेष अदालत के समक्ष आरोप पत्र दाखिल किया।
अदालत में पेश नहीं होने के कारण आचार्य बालकृष्ण के खिलाफ गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी किया गया। इसके बाद CBI ने 20 जुलाई 2012 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
गिरफ्तारी के बाद उन्हें देहरादून की सुद्धोवाला जेल भेजा गया। करीब एक महीने न्यायिक हिरासत में रहने के बाद अगस्त 2012 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने उन्हें सशर्त जमानत दे दी थी।
2013 में तय हुए थे आरोप
मामले की सुनवाई के दौरान अक्टूबर 2013 में अदालत ने आचार्य बालकृष्ण के खिलाफ IPC की धारा 120-B, 420, 468 और 471 के साथ पासपोर्ट एक्ट के तहत आरोप तय किए।
बाद में इन आरोपों को अदालत में चुनौती दी गई। जून 2014 में सेशन कोर्ट के आदेश के बाद अगस्त 2014 में आरोपों में संशोधन किया गया।
इसके बाद मामले की सुनवाई मुख्य रूप से IPC की धारा 471 और पासपोर्ट एक्ट की धारा 12(1)(B) के तहत आगे बढ़ी।
2018 में पासपोर्ट लौटाने की मिली थी अनुमति
लंबी कानूनी प्रक्रिया के बीच वर्ष 2018 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने आचार्य बालकृष्ण को उनका पासपोर्ट वापस लेने और उसका नवीनीकरण कराने की अनुमति दी थी।
इसके बाद भी मामले की कानूनी प्रक्रिया जारी रही।
अब देहरादून की CBI कोर्ट ने करीब 15 वर्ष पुराने मामले में आचार्य बालकृष्ण को बरी कर दिया है।
अदालत के इस फैसले के बाद फर्जी शैक्षणिक प्रमाण पत्र के आधार पर पासपोर्ट हासिल करने के आरोपों से जुड़ी आचार्य बालकृष्ण की लंबी कानूनी लड़ाई समाप्त हो गई है।


