देहरादून। उत्तराखंड वन विभाग में भारतीय वन सेवा (IFS) के एक वरिष्ठ अधिकारी की पदोन्नति को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। एक नोटिस में आरोप लगाया गया है कि अधिकारी ने वर्षों से अचल संपत्ति विवरण यानी Immovable Property Return (IPR) दाखिल नहीं किया, इसके बावजूद उन्हें वेतन मैट्रिक्स के लेवल-17 में पदोन्नति दी गई।
नोटिस में इसे संबंधित वैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन बताते हुए पदोन्नति प्रक्रिया, चयन समिति और तत्कालीन प्रमुख सचिव (वन) की भूमिका की जांच की मांग की गई है।
नोटिस के अनुसार, भारतीय वन सेवा (वेतन) नियमावली, 2016 के नियम 3(1) की टिप्पणी-4 में निर्धारित प्रावधान के तहत अगले वेतन स्तर पर नियुक्ति के लिए पिछले वर्ष का अचल संपत्ति विवरण 31 जनवरी तक प्रस्तुत करना अनिवार्य है। आरोप है कि संबंधित अधिकारी ने लंबे समय तक IPR दाखिल नहीं किया, फिर भी उन्हें लेवल-17 में पदोन्नति दी गई।
2017 के बाद IPR नहीं भरने का आरोप
नोटिस में दावा किया गया है कि केंद्र सरकार के IPR स्थिति मॉड्यूल में वर्ष 2023, 2024, 2025 और 2026 के लिए संबंधित अधिकारी के नाम के सामने कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं दिखा। नोटिस में यह भी आरोप लगाया गया है कि विस्तृत जांच में वर्ष 2017 के बाद अधिकारी द्वारा कोई IPR दाखिल नहीं किए जाने की बात सामने आई।
दस्तावेज में DoPT के दिसंबर 2016 के निर्देश और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सतर्कता संबंधी पत्रों का हवाला देते हुए कहा गया है कि अखिल भारतीय सेवा अधिकारियों के लिए ऑनलाइन IPR दाखिल करना अनिवार्य है। नोटिस में यह भी दावा किया गया है कि IPR दाखिल नहीं करने पर सतर्कता स्वीकृति रोके जाने और अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान है।
नोटिस में आरोप लगाया गया है कि IPR दाखिल नहीं करने के मामले में अनुशासनात्मक कार्रवाई किए जाने के बजाय अधिकारी की पदोन्नति की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। इसमें चयन समिति की कार्यवाही पर भी सवाल उठाते हुए कहा गया है कि समिति की बैठक के कार्यवृत्त में IPR अनुपालन के मुद्दे पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया।
चयन समिति और तत्कालीन प्रमुख सचिव की भूमिका पर सवाल
नोटिस में चयन समिति की प्रक्रिया को लेकर भी गंभीर आपत्तियां दर्ज की गई हैं। आरोप है कि चयन समिति के समक्ष IPR न दाखिल करने से संबंधित जानकारी को पर्याप्त रूप से प्रस्तुत या विचारित नहीं किया गया। इसके बावजूद अधिकारी को सत्यनिष्ठा प्रमाण-पत्र दिए जाने का दावा किया गया है।
नोटिस में यह भी कहा गया है कि तत्कालीन प्रमुख सचिव (वन) अधिकारी के रिपोर्टिंग प्राधिकारी रहे थे और इसलिए IPR अनुपालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी उनके स्तर पर थी। इसी आधार पर नोटिस में तत्कालीन प्रमुख सचिव और चयन समिति के सदस्यों की भूमिका की जांच की मांग की गई है।
दस्तावेज में वर्ष 2017 से 2026 के बीच संबंधित अधिकारी के संवेदनशील पदों पर तैनाती का भी उल्लेख किया गया है। इनमें वन संरक्षण अधिनियम से जुड़ी स्वीकृतियों, CAMPA, वन्यजीव प्रभाग और बाद में वन बल प्रमुख (HoFF) जैसे पदों का हवाला दिया गया है। नोटिस में इन पदों पर रहते हुए IPR दाखिल नहीं करने को लेकर संपत्ति और आय के स्रोतों की जांच की आवश्यकता जताई गई है।
हालांकि, ये सभी आरोप नोटिस में लगाए गए हैं और इनकी सत्यता का अंतिम निर्धारण जांच या सक्षम प्राधिकारी की कार्यवाही के बाद ही हो सकेगा।
CBI, ED और आयकर जांच की मांग
नोटिस में संबंधित अधिकारी की संपत्तियों और आय के स्रोतों की जांच के लिए CBI, प्रवर्तन निदेशालय (ED) और आयकर विभाग से जांच कराने की मांग की गई है। इसमें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत भी जांच की आवश्यकता जताई गई है।
इसके अलावा नोटिस में वन विभाग से जुड़े कई पुराने मामलों और न्यायिक टिप्पणियों का उल्लेख करते हुए विभागीय कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए गए हैं। इनमें देहरादून वन प्रभाग में अतिक्रमण, कॉर्बेट टाइगर रिजर्व से जुड़ा मामला, कालसी साल पातन प्रकरण और अन्य वन संबंधी न्यायिक मामलों का हवाला दिया गया है।
नोटिस में सर्वोच्च न्यायालय के भजन सिंह बनाम उत्तराखंड राज्य मामले का भी संदर्भ दिया गया है। इसके जरिए चयन समितियों के समक्ष किसी अधिकारी के पक्ष और विपक्ष से जुड़ी प्रासंगिक सामग्री रखने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
45 दिन में कार्रवाई की मांग
नोटिस में 45 दिनों की समयसीमा में विभिन्न कार्रवाई किए जाने की मांग की गई है। इसमें संबंधित सभी अभिलेखों को सुरक्षित रखने, स्वतंत्र CBI जांच कराने, पदोन्नति और अनुशासनात्मक प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेजों की जांच करने तथा तत्कालीन प्रमुख सचिव (वन) और चयन समिति के सदस्यों की भूमिका तय करने की मांग शामिल है।
इसके अलावा नोटिस में संबंधित अधिकारी की सेवानिवृत्ति के बाद विभागीय कार्यवाही की अनुमति, कथित रूप से अनुचित तरीके से प्राप्त वेतन की वसूली और सतर्कता स्वीकृति से जुड़ी फाइलों को सार्वजनिक जांच के लिए उपलब्ध कराने की मांग भी की गई है। पेंशन से जुड़े अधिकारियों को भी नोटिस की प्रति भेजे जाने का उल्लेख है।
फिलहाल पूरे मामले में मुख्य सवाल IPR अनुपालन, पदोन्नति की पात्रता, चयन समिति के समक्ष उपलब्ध कराई गई जानकारी और संबंधित अधिकारियों की भूमिका को लेकर हैं। इन आरोपों पर सरकार और संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आने के बाद तस्वीर और स्पष्ट हो सकेगी।


