पलायन आयोग के उपाध्यक्ष का पलायन। नई कुर्सी मिली।

पलायन की मार झेल रहे उत्तराखंड में 18 सालों में एक पलायन आयोग बना था लेकिन इसके उपाध्यक्ष एसएस नेगी ने तो खुद ही ‘पलायन’ कर लिया है।
 डॉ एस एस नेगी अब पर्यावरण आकलन प्राधिकरण के अध्यक्ष बन गए हैं। केंद्रीय वन अनुसंधान निदेशालय के महानिदेशक पद से रिटायर होने के बाद डॉक्टर एस एस नेगी पलायन आयोग के उपाध्यक्ष बने थे। हालांकि डॉ नेगी कहते हैं कि वह दोनों पदों पर बने रहेंगे, किंतु दो नावों में सवार डॉक्टर नेगी पलायन आयोग में अपनी भूमिका से कितना अन्याय कर पाएंगे, यह आने वाला वक्त ही तय करेगा।
डॉ नेगी इस प्राधिकरण के अध्यक्ष की दौड़ में पहले से थे लेकिन केंद्र सरकार में कार्यवाही में देरी के चलते उन्हें इस बीच पलायन आयोग का अध्यक्ष बना दिया गया।
डॉ नेगी के अलावा वन विभाग के एक अन्य अफसर भी इस दौड़ में थे लेकिन प्राधिकरण का कार्यकाल खत्म होने से 3 महीने पहले उनकी सेवानिवृत्ति की तिथि होने के कारण उनकी फाइल केंद्र सरकार ने लौटा दी थी।
उम्मीदों से पौड़ी में खुला था पलायन आयोग का कार्यालय,नेगी ने दून मे बनाया कैंप कार्यालय 
 तब यह बड़ी-बड़ी बातें की गई थी कि डॉक्टर नेगी पहाड़ को पलायन से निजात दिलाएंगे और इस पर कुछ ठोस काम करेंगे किंतु देहरादून में पलायन आयोग का एक अदद कार्यालय, लग्जरी गाड़ियों की खरीद और दो नियुक्तियों के अलावा उनके खाते में कोई और उपलब्धि नहीं आ पाई।
 पलायन आयोग में नियुक्ति के लिए उन्होंने विज्ञापन निकाला भी तो उसमें ऐसी-ऐसी डिग्रियां मांग ली जो उत्तराखंड में किसी के पास नहीं थी। इस पर बवाल मचा तो उत्तराखंड के विश्वविद्यालयों से प्राप्त डिग्रियां भी मान्य कर ली गई।
बहरहाल इन सब उपलब्धियों के साथ अब डॉ. नेगी पर्यावरण आंकलन प्राधिकरण मे अध्यक्ष की कुर्सी को भी सुशोभित करेंगे।
और बदतर हुआ उत्तराखंड 
 इस प्राधिकरण का काम प्रदेश में बी श्रेणी की परियोजनाओं को मंजूरी देना है। डॉ नेगी की नियुक्ति जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के द्वारा 3 वर्ष के लिए की गई है। प्राधिकरण में सदस्य के तौर पर डॉक्टर शैलेंद्र सिंह बिष्ट तथा मुख्य वन संरक्षक गढ़वाल सदस्य सचिव नियुक्त किए गए हैं। इससे पहले इस प्राधिकरण का कार्यकाल वर्ष 2015 में समाप्त होने के बाद यह कुर्सी खाली पड़ी हुई थी।
बहरहाल कम समय में ही पलायन आयोग के उपाध्यक्ष के पद के बाद पर्यावरण आकलन प्राधिकरण के भी अध्यक्ष बनने से इस बात पर मुहर लग गई है कि डॉक्टर नेगी शुरू से ही उत्तराखंड में पलायन रोकने के प्रति प्रतिबद्ध नहीं थे। संभवतः इसीलिए उनके कार्य में भी अपेक्षित गंभीरता परिलक्षित नहीं हो पाई। हालांकि डॉक्टर नेगी कहते हैं कि प्राधिकरण में महीने में ही सिर्फ एक-दो मीटिंग ही होगी और उनका मुख्य काम तो पलायन आयोग को लेकर ही है।
डॉक्टर नेगी कहते हैं कि उन्हें प्राधिकरण से कोई मानदेय भी नहीं मिलेगा। डॉ नेगी का कहना है कि उन्होंने इस प्राधिकरण के लिए आवेदन नहीं किया था बल्कि उन्हें नॉमिनेट किया गया है।
बहरहाल डॉ नेगी का इस तरह से दूसरे प्राधिकरण में जाने से उत्तराखंड में पलायन को रोकने के लिए किए जा रहे प्रयास भी हतोत्साहित होंगे।
इससे बेहतर तो यही होता कि न यह पलायन आयोग बनता और न डा. नेगी से लोग कोई अपेक्षा और उम्मीद जगाते।
 ‘पलायन एक चिंतन’ अभियान के संयोजक रतन सिंह असवाल कहते हैं कि दोहरी जिम्मेदारी के लिए श्री नेगी को बधाई है लेकिन उन्हें पलायन आयोग की भूमिका से जरूर न्याय करते रहना चाहिए।
यह उत्तराखंड सरकार के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के लिए भी एक सबक है कि वह आइंदा से सिर्फ सजावट के लिए उत्तराखंड की महत्वपूर्ण कुर्सियों पर किसी को भी बिठा देने से परहेज करेंगे।

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