शिवानंद योग विद्या पीठम ने विदेशियों को इस तरह सिखाया हठयोग

अध्यात्म नगरी उत्तरकाशी में बीते दिनों योग साधकों की धूम रही। यहां शिवानंद योग विद्या पीठम में १२ से २७ सितंबर तक योग साधना शिविर आयोजित किया गया। जिसमें अमेरिका, तुर्की व बेला, रूस के एक दर्जन से अधिक योग साधकों ने हठयोग, ध्यान व हवन की बारीकियां सीखीं।
शिवानंद योग विद्या पीठम ने योग साधकों को योग साधना और हवन के महत्व से रूबरू करवाया। शिवानंद योग विद्या पीठम के संस्थापक गोविंदानंद व योगाचार्य अमेरिका निवासी रॉबर्ट मोसेस ने विदेशी साधकों को हठयोग के साथ ही साधना और ध्यान की बारीकियां सिखाई। इन साधकों ने दिन के आठ-नौ घंटों तक रोजाना प्रशिक्षण लिया। अब यह सभी योग साधक सूर्य नमस्कार व प्रार्थना का अभ्यास आसानी से कर सकते हैं।
यही नहीं योग साधकों को उत्तरकाशी के प्रमुख मंदिरों के दर्शन के साथ ही गंगा दर्शन भी कराया गया। शिविर के दौरान साधकों को देवी पूजा, महामृत्युंजय जप, सुदर्शन पूजा, गणपति पूजा के हवन आदि विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए गए। केरल से आए ऋषि चैतन्य साधकों को दक्षिण भारतीय पद्धति में हवन व पूजा करने की विधि सिखाई।
कार्यक्रम के संयोजक एवं जर्मनी से आए योगाचार्य पीयूष बनूनी ने बताते हैं कि गंगा की निर्मलता और यहां का शांत वातावरण योग व साधना के लिए सबसे उपयुक्त है। यहां शिवानंद कुटीर ने योग को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई है। पिछले तीन वर्षों से उत्तरकाशी में हठयोग प्रशिक्षण का कार्यक्रम आयोजित हो रहा है। उनका लक्ष्य है कि उत्तरकाशी को विश्व स्तर पर योग भूमि के रूप में पहचान दिलाई जा सके।

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उल्लेखनीय है कि योगाचार्य पीयूष बनूनी उत्तरकाशी के मूल निवासी हैं। उन्होंने यहां स्थित अपने पैतृक घर को योग की शरणस्थली बनाया, जहां अब तक देश-विदेश के दर्जनों लोग योग शिक्षा ले चुके हैं। बनूनी के इस प्रयास की स्थानीय लोगों सहित प्रदेशभर में खूब सराहना हुई। उत्तराखंड में इस पहल को रिवर्स माइग्रेशन के रूप में भी देखा जाता है।
पीयूष बनूनी कहते हैं कि उनका सपना है कि जिस तरह यहां के युवा रोजगार की तलाश में विदेशों में जा रहे हैं, उसी तरह हम भी विदेशियों को अपने देश में बुलाकर ऐसा आतिथ्य दें कि हमारे रीति-रिवाज, संस्कृति व त्यौहारों से वे रूबरू हो सकें। इसके लिए योग सबसे सशक्त माध्यम है। उन्होंने अपने पुराने घर को पारंपरिक लुक से संवारकर होम स्टे के लिए शानदार पहल की है।

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