एक्सक्लूसिव: उत्तराखंड चुनाव आयुक्त सरकार की जेब में!

कल 11 अक्तूबर को विधानसभा में शहरी विकास मंत्री मदन कौशिक ने स्थानीय निकाय चुनाव के संबंध में एक बैठक आयोजित की। इस बैठक में आश्चर्यजनक रूप से राज्य निर्वाचन आयुक्त रिटायर्ड आईएएस चंद्रशेखर भट्ट की उपस्थिति पर कई गंभीर सवाल खड़े हुए हैं कि आखिरकार आयोग के अध्यक्ष को जब बुलाने का या निर्देशित करने का अधिकार सरकार का है ही नहीं तो चुनाव आयुक्त को किस नियम से उक्त बैठक के लिए बुलाया गया??

संविधान में स्पष्ट रूप से चुनाव आयुक्त के अधिकार और कर्तव्य साफ-साफ लिखे गए हैं और इसे स्वतंत्र संस्था माना जाता है, किंतु चुनाव आयुक्त चंद्रशेखर भट्ट के सरकारी बैठक में आने के बाद इस बात की चर्चा जोरों पर है कि उत्तराखंड सरकार ने चंद्रशेखर भट्ट को चुनाव आयुक्त बनाकर उन पर जो कृपा बरसाई, अब चंद्रशेखर भट्ट उसी कृपा का उधार चुका रहे हैं।

 भट्ट राज्य के चुनाव आयुक्त हैं या भाजपा के चुनाव प्रभारी ?चुनाव आयुक्त के सरकारी बैठक में आने के बाद अब उत्तराखंड चुनाव आयुक्त चंद्रशेखर भट्ट की निष्पक्षता व पारदर्शिता पर भी सवाल उठने लाजिमी हैं कि यदि कल के दिन विपक्षी दल के लोग उन्हें बुलाएंगे तो क्या चंद्रशेखर भट्ट उन बैठकों में भी शामिल होंगे?
राजनैतिक जानकारों का मानना है कि डबल इंजन की सरकार ने निकाय चुनावों में अपने अनुसार राजनैतिक लाभ लेने की दृष्टि से चुनाव आयुक्त को उक्त बैठक में बुलाया था।

देखना है कि चुनाव आयुक्त चंद्रशेखर भट्ट अब निकाय चुनावों में किस प्रकार सत्ताधारी दल की मदद करते हैं!


इस बैठक में शहरी विकास विभाग, न्याय विभाग के अधिकारियों के साथ महाधिवक्ता एसएन बाबुलकर भी शामिल हुए थे।
यूं तो चुनाव आयोग को स्वतंत्र एजेंसी माना जाता है और संविधान में चुनाव आयोग के अधिकार भी बहुत स्पष्ट हैं। इसके बावजूद चुनाव आयोग द्वारा सरकारों के साथ खड़ा होने से इतने बड़े आयोग पर प्रश्नचिन्ह उठने स्वाभाविक हैं।
नैनीताल हाईकोर्ट द्वारा उत्तराखंड में स्थानीय निकाय चुनाव को लेकर सरकार को पड़ी फटकार के बाद उत्तराखंड सरकार एक बार फिर बैकफुट पर है। सरकार को न्यायालय द्वारा दिए गए आदेश के बाद अब तय समय-सीमा के भीतर स्थानीय निकाय चुनाव को लेकर उत्तराखंड सरकार जागी है।
राज्य निर्वाचन आयुक्त का ही झुकाव उत्तराखंड सरकार के प्रति नहीं है, बल्कि भारत निर्वाचन आयोग का झुकाव भी केंद्र सरकार के प्रति दिखाई देता रहता है। उदाहरण के तौर पर कुछ दिन पहले पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव को लेकर सुबह 11 बजे बुलाई गई भारत निर्वाचन आयोग की प्रेस कांफ्रेंस बाद में इसलिए ढाई बजे के बाद बुलाई गई थी, क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी को दिन में एक बजे एक विशाल रैली को संबोधित करना था। चुनाव आयोग पर उस दिन मोदी सरकार की गोद में बैठकर काम करने की इतने तीखे आरोप लगे कि दिनभर भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता और मोदी सरकार के मंत्री किसी तरह पीछा छुड़ाते दिखाई दिए थे।

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