सुपर एक्सक्लूसिव : उत्तराखंड के अफसर ने किया केंद्र सरकार को ‘टिमरू’। लगाई आरटीआइ

कृष्णा बिष्ट

आईएफएस संजीव चतुर्वेदी ने आरटीआइ मे मांगा ‘रफैल डील’ की पाई पाई का हिसाब

संजीव चतुर्वेदी ने आरटीआइ में केंद्र सरकार से रफैल डील की हिसाब किताब मांगा है।बदले मे लोक सूचना अधिकारी ने उन्हें इस आरटीआइ का जबाब देने से इंकार कर दिया है। सामान्य लोगों के लिए यह चैप्टर अब बंद लगता हो लेकिन संजीव के तेवरों को जानने वाले कयास लगा रहे हैं कि लड़ाई अब शुरू हुई है।

संजीव चतुर्वेदी ने आरटीआइ में कैग के लोक सूचना अधिकारी से 17जनवरी को एक आवेदन मे पूछा कि

रफैल एयरक्राफ्ट की कीमत से संबंधित कैग रिपोर्ट की वो सत्यापित प्रतिलिपि उन्हे भी दी जाए जो लोक लेखा समिति को सौंपी गई है। संजीव चतुर्वेदी ने सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का भी हवाला दिया है कि जिसमे सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कैग ने रिपोर्ट लोक लेखा समिति को सौंप दी है और उसका निरीक्षण पीएसी ने कर दिया है और अब यह पब्लिक डोमेन मे है।

 

चतुर्वेदी ने इसी आदेश की बिना पर कैग रिपोर्ट की काॅपी मांग ली है। साथ इससे संबंधित वह सभी दस्तावेज भी मांगे है इस रिपोर्ट को तैयार करते वक्त रक्षा मंत्रालय द्वारा ली गयी कंसलटेंसी की डिटेल्स भी मांगी है।

 

श्री चतुर्वेदी ने इससे संबंधित लोक लेखा समिति की फाइल नोटिंग तो मांगी ही है साथ ही अपने 17 दिसम्बर 2018 के आवेदन पर की समस्त कार्यवाही की  जानकारी भी मांगी है ताकि यह पता किया सके कि उनके आवेदन पर किस स्तर से देरी की गई है !

 

हालांकि लोक सूचना अधिकारी ने लिखा है कि सूचना नही दी जा सकती। देखना है कि चतुर्वेदी आगे क्या अपील करते हैं !

चतुर्वेदी पर एक नजर

संजीव चतुर्वेदी वर्तमान मे वन अनुसंधान केंद्र हल्द्वानी मे तैनात हैं। उत्तराखंड की जीरो टोलरेंस की सरकार ने उनको एक कोने महत्वहीन पोस्टिंग पर बिठा रखा है जबकि उन्होने अपनी इच्छा से उत्तराखंड कैडर मांगा था और विजिलेंस विभाग मे काम करने की इच्छा जाहिर की थी।

सरकार चाहती तो उनकी मदद से पुराने कई घोटाले खोल सकती थी लेकिन न सरकार को लोकायुक्त की जरूरत है न ऐसे अफसरों की। यहां पाठकों को एक तथ्य फिर से याद दिलाना दिलचस्प होगा कि सरकार ने चतुर्वेदी से चंपावत के तत्कालीन डीएफओ ए के गुप्ता की जांच कराई थी सरकार के कहने पर चतुर्वेदी ने दो बार जांच की, हजार पन्नों की रिपोर्ट भी भेज दी और एफआइआर दर्ज करने की संस्तुति की थी लेकिन एक साल बाद भी जीरो टोलरेंस की सरकार ने यह जांच तो दबा कर ही रखी है। चतुर्वेदी को भी कोने मे पटक रखा है।

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