कांग्रेस: मित्र विपक्ष से मृत विपक्ष की ओर

सोशल मीडिया पर आजकल क्या ट्रेंड हो रहा है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के बीच तुलनाओं वाली टिप्पणियों का रुख अब योगी और मोदी की तरफ मुड़ गया है। कोई कह रहा है कि दिल्ली में पूर्वांचल के बंपर वोट बैंक के बावजूद वहां योगी को इसलिए […]

सोशल मीडिया पर आजकल क्या ट्रेंड हो रहा है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के बीच तुलनाओं वाली टिप्पणियों का रुख अब योगी और मोदी की तरफ मुड़ गया है। कोई कह रहा है कि दिल्ली में पूर्वांचल के बंपर वोट बैंक के बावजूद वहां योगी को इसलिए नहीं बुलाया गया कि कहीं दिल्ली में जीत का सेहरा मोदी के बजाय योगी के सर न बंध जाए।
बहरहाल, सोशल मीडिया के शेरों का रुख पलटने से उत्तराखंड की टीएसआर सरकार ने राहत की सांस जरूर ली है, किंतु राज्य के ग्यारह सदस्यीय विपक्षी दल कांग्रेस ने तो पहले दिन से हाथ खड़े कर रखे हैं।
कांग्रेस शुरू में भाजपा सरकार को छह माह का वक्त देने का ऐलान कर चुकी थी। त्रिवेंद्र सरकार के खिलाफ यदि कोई विपक्ष की भूमिका निभा रहा है तो वह है सोशल मीडिया।
शराब को लेकर राज्य सड़कों को जिला सड़क में नाम परिवर्तन का मसला हो या त्यूणी बस हादसे में मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति, सोशल मीडिया में इन मुद्दों का बेहद संजीदगी से विश्लेषण किया गया। प्रमुख सचिव ओमप्रकाश को महत्वपूर्ण पोस्टिंग और उनके चहेते मृत्युंजय मिश्रा के मोह ने तो सोशल मीडिया में सचिवालय का नामकरण ही ‘बिहार-सचिवालयÓ कर दिया है।
प्रदेश के प्रतिष्ठित दैनिक अखबारों के मालिकान भी नई सरकार के कामकाज को लेकर ‘वेट एंड वाचÓ की मुद्रा में है। निर्देश न होने से उनके पत्रकार जो बात अखबार में लिख नहीं सकते, उनकी तल्ख टिप्पणियां सोशल मीडिया में आए दिन नुमायां हो रही हैं।
एक महीने का वक्त किसी कार्य का विश्लेषण करने के लिए भले ही काफी कम होता है और उस पर किसी प्रकार की टिप्पणी करना उतावलापन ठहराया जा सकता है। कोई नीतिपरक निर्णय अपने परिणाम के लिए समय की मांग अवश्य करता है, किंतु मुख्य विपक्षी दल यदि निर्णयों का विश्लेषण करने की भी जरूरत महसूस न करे तो सवाल तो खड़े होते हैं।
कांग्रेस के ग्यारह सदस्यों में नेता प्रतिपक्ष पद को लेकर हुई टकराहट के जख्म अभी ताजा हैं। दोनों सीटों से चुनाव हारने वाले हरीश रावत के चंद समर्थक भी हरीश रावत से इस बात को लेकर खफा हैं कि उन्होंने इंदिरा हृदयेश को नेता प्रतिपक्ष बनाने की पैरवी की। इधर इंदिरा हृदयेश हैं कि नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद हरीश रावत के ही खिलाफ मोर्चा खोल बैठी।
परिणाम यह हुआ कि हरीश रावत तो अलग-थलग पड़ ही गए। विपक्षी दल भी छितर-बितर हो गया है। अब कमजोर विपक्ष का हर विधायक इस फेर में रहेगा कि किसी तरह अपनी विधानसभा के लिए कुछ काम करा ले। इंदिरा हृदयेश के क्षेत्र में मुख्यमंत्री हाल ही में ४०० करोड़ की लागत से रिंग रोड का तोहफा सौंप आए हैं। जब शुरुआत में ही इतनी तवज्जो मिल गई तो वह आभार क्यों न जताए भला!
इधर पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भी मुख्य प्रवक्ता के माध्यम से केंद्र में प्रदेश का पक्ष रखने पर कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक और सतपाल महाराज को बधाई भिजवाई है।
एक ओर सोशल मीडिया में सरकार की जबरदस्त खिंचाई और दूसरी तरफ विपक्षी दल बधाई देने के बहाने तलाश रहा है। कहीं कांग्रेस अपने पूर्ववर्ती मित्र विपक्ष से दो कदम पीछे मृत विपक्ष की ओर अग्रसर तो नहीं!

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