हाईकोर्ट आर्डर पर हो पाया परमार्थ स्वामी चिदानंद पर मुकदमा। फिर कैसा जीरो टोलरेंस!!

उत्तराखंड के ऋषिकेश में 35 बीघा वन भूमि पर अतिक्रमण होकर निर्माण कर दिया गया। राजस्व विभाग ने कोई कार्यवाही की और ना ही वन विभाग ने।
जीरो टोलरेंस की सरकार ने भी अनसुना कर दिया तो हरिद्वार निवासी एक शिकायतकर्ता को सितंबर 2019 हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर करने को मजबूर होना पड़ा।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद प्रभागीय वन अधिकारी देहरादून ने परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष चिदानंद मुनि के खिलाफ अधिनियम 1927 केस सेक्शन 26 के अंतर्गत मुकदमा दर्ज कराया है।
जब उत्तराखंड में हाईकोर्ट में जनहित याचिका के माध्यम से ही भ्रष्टाचार के खिलाफ मुकदमे दर्ज होने हैं तो फिर जीरो टोलरेंस जैसे जुमले क्या आम जनता को बेवकूफ बनाने के लिए गढ़े गए हैं !
गौरतलब है कि अभी तक त्रिवेंद्र सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक भी बड़े मामले का स्वतः संज्ञान नहीं लिया है। यहां तक कि एनएच 74 घोटाला, छात्रवृत्ति घोटाला और आयुष्मान योजना घोटाला हाई कोर्ट में शिकायत होने के बाद ही खुल पाए हैं। सरकार ने इनकी जांच और कार्रवाई के नाम पर भी लीपा-पोती ही की है।

यह है स्वामी चिदानंद से जुड़ा मामला

ऋषिकेश में वीरभद्र मंदिर के पास बीरपुर खुर्द में वन विभाग की 35 बीघा जमीन है। इस पर अतिक्रमण करके 52 कमरे एक बड़ा हॉल और गौशाला का निर्माण किया गया है।
इसको लेकर अब वन विभाग में चिदानंद मुनि के खिलाफ केस दर्ज करके विभागीय जांच आरंभ कर दी है। यह जांच डीएफओ देहरादून न्यायालय को सौंपेंगे।
मुकदमा भी तब दर्ज हो पाया, जब हाईकोर्ट में जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए संबंधित विभाग को अंतिम समय देते हुए एक्शन टेकन रिपोर्ट के आधार पर कार्यवाही करने के निर्देश दिए।
हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद विपक्षी पुरुषोत्तम शर्मा को नोटिस जारी करके 3 सप्ताह में जवाब देने को कहा है।
गौरतलब है कि याचिका दायर करने वाले व्यक्ति ने कोर्ट में शपथ पूर्वक कहा है कि पुरुषोत्तम शर्मा ने कुनाऊ गांव में 150 बीघा जमीन पर कब्जा किया हुआ है।
” पुरुषोत्तम शर्मा चिदानंद मुनि का ठेकेदार है तथा शर्मा का स्थाई निवास ऋषिकेश के श्यामपुर में है और 2019 की वोटर लिस्ट के अनुसार उनका नाम ऋषिकेश में ही है, जबकि उन्होंने राजाजी पार्क की भूमि पर अतिक्रमण किया हुआ है और वह स्थाई निवासी भी नहीं है।”
गौरतलब है कि वन विभाग की चौकी अतिक्रमण स्थल के पास होने के बावजूद वन विभाग ने अतिक्रमण पर कोई कार्यवाही नहीं की।
अहम सवाल यह है कि यदि अतिक्रमण साबित होता है तो क्या अतिक्रमण करने वाले लोगों पर और अतिक्रमण कराने के लिए जिम्मेदार राजस्व तथा वन विभाग के अधिकारियों पर कोई कार्यवाही हो पाएगी या नहीं !

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