लोकप्रिय सोशल एक्टिविस्ट साहनी की कोरोना से मौत

भार्गव चंदोला
आज का दिन रामनगर के साहनी परिवार पर कोरोना कहर बनकर टूटा और परिवार का एकमात्र सहारा अजीत को लील गया| 

अल्जाइमर से पीड़ित बूढ़े बाप को अब कौन संभालेगा? अजीत की पत्नी सुमन, बेटी और बेटे को अब कौन सहारा देगा? 

वंचितों, दलितों की आवाज अब कौन उठाएगा? कौन सुनाएगा अब रंगमंचों से चंबल जैसी हृदय विदारक कविता, कौन उठाएगा दकियानूसी सोच से पर्दा? 

इसको बेमान, नालायक सरकार द्वारा की गयी हत्या न कहूँ तो क्या कहूँ? मोदी, शाह, त्रिवेंद्र, तीरथ कुछ शर्म बची है तो स्तीफा दो, हम जानते हैं तुमसे न होगा| 

हल्द्वानी के सुशीला तिवारी मेडिकल कॉलेज जैसे अस्पताल में 16 माह से चिकित्सा स्वास्थ्य सेवायें दुरस्त न हो सकी|  जिसकी कीमत आज हमारे अजीज साथी सरदार अजीत सहानी को अपनी जान गंवा कर चुकानी पड़ी| 

 आज सुबह ही सुमन से बात हुई, फोन पर सिसकते हुए सुमन ने बताया अजीत आईसीयू में है|  रात दो-दो घंटे तक आईसीयू का वेंटिलेटर बंद रहा| स्टाफ झाँकने तक नहीं आया, बगल वाला पेशेंट दम तोड़ चुका है| हॉस्पिटल का स्टाफ इतना संवेदनहीन कैसे हो सकता है?

कुल मिलाकर साहनी परिवार के लिए आज वक्त बेहद कठिन है,  हम अजीत की पत्नी साथी सुमन सरिता से इतना ही कहना चाहते हैं कि, सुमन तुम्हें खुद को और परिवार को संभालना है, बाकी निशब्द हैं| 

गीता गैरोला ने अजीतानंद जी के साथ का पुराना किस्सा शेयर किया 

वो 2010 या 2011 का वक्त था।मै अपनी साथियों के साथ बद्रीनाथ के पट खुलने वाले दिन बद्रीनाथ में पड़ने वाली  बर्फ का मजा ले रही थी।तभी किसी ने पीछे से आकर मेरी आंखें बंद कर कहा “ओ गीता दी पहचानो मै कौन हूं”?

  मैंने अंदाजा लगाने के लिए उसके मुंह पर हाथ फेरा और झट से बोली”अजीतानंद जी आपको नही पहचानूंगी तो किसे जानूंगी”।वास्तव में उसकी दाढ़ी और पगड़ी छू कर पहचान गई थी।

उसके बाद पूरे दो दिन हम दोनों साथ घूमते रहे।सरकार की नीतियों को गरियाते रहे।पता नहीं कहां की कैसी गप्पे लगा कर हमारा दिल नही भरता था। भीम पुल  को पार करके बुग्याल में बैठ कर।उसने ढेर सारी कविताएं सुनाई थी।

आश्चर्य की बात ये थी की हम दोनो ने केवल एक फोटो साथ में खींची थी। उस मुलाकात के बाद फेसबुक में एक दूसरे की खिंचाई करते रहते।उसकी पोस्ट हमेशा बहुत निर्भीक,बहुत व्यंग से भरी, मारक होती थी।जिसके लिए लिखी जाती वो तिलमिलाने के सिवाय कुछ नहीं कह पाता था।

फेसबुक की इन्ही पोस्ट ने उसके अनेको दुश्मन भी बनाए।कई बार उसे बेतरह ट्रोल किया गया।पर उसके दोस्त हजारों थे, जो उसके पक्ष में उतर जाते।कई बार फेसबुक ने उसको ब्लॉक कर दिया।उसके सारे मित्र फेसबुक को इतनी मेल डालते की कुछ घंटों में वो फिर तरह तरह के मुंह बनाता फेसबुक पर अपने पूरे तीर कमान लेकर हाजिर हो जाता।

        वो हर धरने,प्रदर्शन,विरोध में अपने रंगमंच के अनुभव,कविताओं को ले कर हाजिर रहता।उत्तराखंड की हर गोष्ठी,सेमिनार,मीटिंग,वर्कशॉप में हाजिर रहता।असहमत होने पर दर्शकों के बीच से या सीधे मंच पर जा कर निडरता से जबरदस्त विरोध दर्ज करता।

जिस दिन उसको अस्पताल में एडमिट करने की बात सुनी।बहुत सामान्य लगा था।लगा अजीत है दो चार दिन बाद घर आ जायेगा। ऐसे भी घर से गायब हो कर घुमक्कड़ी उसका शौक था। कौन जानता था आखिरी बार घर से निकला और वापस नहीं आयेगा।

       तू तो हमें खाली करके चला गया दुष्ट लड़के।हम सब तेरे बिना बहुत उदास हो गए है।तेरी सुनाई कविताएं भीम पुल के पार बुग्यालों में अभी भी गूंज रही होंगी।

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