आईपीएस कैडर विवाद पर हाईकोर्ट सख्त, एक पद रोकने का आदेश और यूपीएससी को नोटिस

सिविल सेवा 2024, आईपीएस कैडर से वंचित करने के मुद्दे पर हाईकोर्ट का हस्तक्षेप, एक पद खाली रखने का निर्देश, दूसरे मामले में महिला को जमानत उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सिविल सेवा परीक्षा 2024 में ऑल इंडिया रैंक 189 प्राप्त अनुप्रिया राय की याचिका पर सुनवाई करते हुए बड़ा अंतरिम आदेश पारित किया है. याचिकाकर्ता ने […]

सिविल सेवा 2024, आईपीएस कैडर से वंचित करने के मुद्दे पर हाईकोर्ट का हस्तक्षेप, एक पद खाली रखने का निर्देश, दूसरे मामले में महिला को जमानत

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सिविल सेवा परीक्षा 2024 में ऑल इंडिया रैंक 189 प्राप्त अनुप्रिया राय की याचिका पर सुनवाई करते हुए बड़ा अंतरिम आदेश पारित किया है. याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि उन्हें उनकी पहली पसंद भारतीय पुलिस सेवा से सिर्फ लंबाई कम होने की आधार पर दूर रखा गया, जबकि नियमों की व्याख्या सही तरीके से नहीं की गईl
याचिका में कहा गया है कि मेडिकल नियमों के प्रावधान, विशेषकर नियम 8(3), की गलत व्याख्या के चलते उनके साथ अन्याय हुआ है. इस पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी और न्यायमूर्ति आलोक महरा की खंडपीठ ने केंद्र सरकार और यूपीएससी को नोटिस जारी किया है. साथ ही कोर्ट ने अंतरिम राहत देते हुए फिलहाल आईपीएस का एक पद खाली रखने का निर्देश दिया है, ताकि अंतिम निर्णय आने तक किसी प्रकार की जटिलता न बने. मामले की अगली सुनवाई 11 फरवरी 2026 को निर्धारित हैl

दूसरा मामला – अनैतिक देह व्यापार निवारण अधिनियम में आरोपी महिला को राहत

एक अलग मामले में, हाईकोर्ट ने अनैतिक देह व्यापार निवारण अधिनियम के तहत जेल में बंद एक महिला आरोपी को जमानत दे दी है. न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकलपीठ ने यह आदेश सुनाया

यह मामला 20 फरवरी 2024 को दर्ज एफआईआर से जुड़ा है, जिसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 370 और अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम, 1956 के अंतर्गत एस बेगम सहित दो पुरुषों पर आरोप लगाए गए थे. आरोपी महिला फरवरी 2024 से जेल में है!

उनके वकील ने कोर्ट को बताया कि केस का ट्रायल शुरू हो चुका है, लेकिन अब तक 11 में से सिर्फ 2 गवाहों के बयान ही रिकॉर्ड हो पाए हैं. साथ ही, इस मामले में शामिल अन्य दो सह-आरोपियों को पहले ही निचली अदालत से जमानत मिल चुकी है. इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने महिला की जमानत मंजूर कर ली है! दोनों मामलों पर हाईकोर्ट के ये फैसले न्यायिक प्रक्रिया और संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा को लेकर महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं!

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