- 1956 की कोल्टा जांच समिति ने खोली शोषण की परतें, 1965 की लोकुर समिति ने जौनसारी को ST संदर्भ में रखा; 1967 में राष्ट्रपति आदेश हुआ, फिर 2003 में ‘Jaunsari’ को बताया गया क्षेत्रीय शब्द—आखिर संवैधानिक पहचान की प्रशासनिक व्याख्या कब और कैसे बदली?
खोजी रिपोर्ट | रिपोर्ट—नीरज उत्तराखंडी
देहरादून। जौनसारी अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र को लेकर चल रही बहस को केवल आज के जातीय विवाद या आरक्षण के सवाल तक सीमित करना दस्तावेजी इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा।
करीब सात दशक के सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि जौनसार-बावर की सामाजिक संरचना, कोल्टा समुदाय की स्थिति, जनजातीय पहचान और सरकारी संरक्षण—ये सभी प्रश्न अलग-अलग समितियों और आयोगों के सामने आते रहे।
इस पूरी पड़ताल में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि कोल्टा जांच समिति, लोकुर समिति, राष्ट्रपति का 1967 का आदेश, 1991 का केंद्रीय प्रशासनिक रिकॉर्ड, 2001 का केंद्र-राज्य पत्राचार और 2003 का राज्यसभा उत्तर—इन सभी को एक साथ पढ़े बिना ‘जौनसारी’ शब्द का प्रशासनिक अर्थ समझना संभव नहीं है।
और यहीं से एक बड़ा सवाल उठता है—
क्या 1967 में संवैधानिक दर्जा किसी अधिसूचित जनजातीय समुदाय को दिया गया था, या बाद में प्रशासन ने उसी नाम को पूरे जौनसार क्षेत्र से जोड़कर उसकी पात्रता का दायरा विस्तृत कर दिया?
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1. सबसे पहले कोल्टा जांच समिति—जौनसार की सामाजिक असमानता का सरकारी दस्तावेज
उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार उत्तर प्रदेश सरकार ने 1956 में कोल्टा जांच समिति गठित की थी और इसके अध्यक्ष सामाजिक न्याय के लिए काम करने वाले नेता बलदेव सिंह आर्य थे।
इस समिति का महत्व इसलिए असाधारण है क्योंकि यह समिति किसी ST सूची की पहचान करने के लिए नहीं, बल्कि जौनसार-बावर में कोल्टा समुदाय की सामाजिक-आर्थिक स्थिति और शोषण की जांच के संदर्भ में सामने आती है।
1963 में राज्यसभा की कार्यवाही में सरकार द्वारा नियुक्त इसी समिति की रिपोर्ट का प्रत्यक्ष उल्लेख हुआ। संसदीय रिकॉर्ड के अनुसार समिति ने पाया कि कोल्टा समुदाय के लोग छोटे-छोटे कर्ज के बदले साहूकारों के घरों में काम करते थे; उन्हें मजदूरी के बजाय भोजन और कपड़े मिलते थे तथा कर्ज पर ब्याज के नाम पर काम चलता रहता था। कुछ मामलों में यह ऋण और श्रम संबंध एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलता था। संसदीय बहस में इसे बंधुआ श्रम और गुलामी जैसी स्थिति के रूप में उठाया गया।
यह तथ्य इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे साबित होता है कि 1960 के दशक में सरकार स्वयं जौनसार-बावर के भीतर सामाजिक समुदायों की अलग-अलग सामाजिक स्थिति को पहचान रही थी।
यानी जौनसार-बावर को एक समान सामाजिक इकाई मानकर वहां के प्रत्येक समुदाय की स्थिति को एक जैसा समझना ऐतिहासिक रिकॉर्ड से मेल नहीं खाता।
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2. कोल्टा समिति की रिपोर्ट में भूमि और श्रम संबंध केंद्रीय प्रश्न
बाद के शोध दस्तावेजों में 1960 की कोल्टा जांच समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कोल्टा समुदाय की भूमि-विहीनता, श्रम-शोषण और महिलाओं की तस्करी जैसी गंभीर परिस्थितियों का उल्लेख मिलता है। एक अध्ययन में समिति की रिपोर्ट के हवाले से जौनसार तथा रवाईं-जौनपुर क्षेत्र के गांवों से महिलाओं के वेश्यावृत्ति केंद्रों तक पहुंचने की स्थिति भी दर्ज की गई है।
बाद के दस्तावेजों में बलदेव सिंह आर्य समिति की रिपोर्ट से यह निष्कर्ष उद्धृत किया गया कि समस्या की जड़ केवल गरीबी नहीं, बल्कि भूमि स्वामित्व की ऐतिहासिक संरचना और प्रभावशाली भू-स्वामी वर्ग का वर्चस्व थी।
इसका अर्थ यह नहीं कि कोल्टा जांच समिति ने ‘कोल्टा’ को 1967 में स्वतः ST घोषित कर दिया था। ऐसा कहना गलत होगा।
समिति की जांच और संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत ST अधिसूचना—दो अलग प्रक्रियाएं थीं।
लेकिन कोल्टा समिति का रिकॉर्ड यह जरूर साबित करता है कि जौनसार-बावर में सामाजिक और आर्थिक असमानता का प्रश्न सरकारी स्तर पर दशकों पहले से दर्ज था।
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3. फिर आया 1965 का लोकुर समिति चरण
1965 में केंद्र सरकार ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति सूचियों की समीक्षा के लिए लोकुर समिति गठित की।
लोकुर समिति के रिकॉर्ड में उत्तर प्रदेश के संदर्भ में Bhotia, Buksa, Jaunsari, Raji और Tharu नाम सामने आते हैं।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है—
कोल्टा जांच समिति सामाजिक-आर्थिक शोषण की जांच कर रही थी। जबकि लोकुर समिति का संबंध SC/ST सूचियों और जनजातीय पहचान के परीक्षण से था। दोनों समितियों के उद्देश्य अलग थे।
यही अंतर आज के विवाद को समझने के लिए बेहद जरूरी है।
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4. 24 जून 1967—संवैधानिक स्थिति का निर्णायक पड़ाव
इसके बाद संविधान (अनुसूचित जनजातियां) उत्तर प्रदेश आदेश, 1967 आया और उत्तर प्रदेश की ST सूची में Jaunsari/Jannsari नाम शामिल हुआ।
यहीं से जौनसारी ST स्थिति संवैधानिक सूची का हिस्सा बनी।
लेकिन राष्ट्रपति आदेश में सूचीबद्ध नाम और बाद में प्रशासन द्वारा उस नाम की व्याख्या—इन दोनों को एक ही चीज मानना सही नहीं होगा।
संविधान की सूची यह बताती है कि कौन-सा समुदाय ST है; बाद की प्रशासनिक व्यवस्था यह निर्धारित करने का प्रयास करती है कि किसी व्यक्ति का दावा उस अधिसूचित समुदाय से वास्तविक रूप से जुड़ता है या नहीं।
यही वह संवैधानिक रेखा है जिस पर पूरी बहस टिकी हुई है।
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5. 1969—जौनसारी प्रतिनिधिमंडल संसद के सामने
1969 की संयुक्त संसदीय समिति की कार्यवाही में Jaunsari Delegation, Chakrata, Dehradun का औपचारिक रिकॉर्ड मिलता है।
प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने समिति के सामने मौखिक साक्ष्य दिया और लिखित ज्ञापन भी प्रस्तुत किया था।
यह इसलिए महत्वपूर्ण है कि 1967 के राष्ट्रपति आदेश के तुरंत बाद ही जौनसारी पहचान और ST सूची का सवाल संसद की समिति के समक्ष चर्चा में था।
लेकिन इस पड़ताल की ईमानदार स्थिति यह है कि मूल ज्ञापन की पूरी स्वतंत्र प्रति अभी हाथ नहीं लगी है।
इसलिए उसके भीतर लिखी मांगों या परिभाषा के बारे में अनुमान को तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
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6. 1980—एक ऐसा शासन पत्र जिसकी पूरी फाइल अब भी गायब कड़ी
21 अगस्त 1980 का उत्तर प्रदेश शासन पत्र— संख्या 2276/26-3-80-4/51/80 —अब इस पड़ताल की महत्वपूर्ण फाइल बन चुका है।
क्यों? क्योंकि 8 अप्रैल 1991 के केंद्रीय प्रशासनिक रिकॉर्ड में इस पत्र का बाकायदा संदर्भ मिलता है।
1991 के रिकॉर्ड में केंद्र ने उत्तर प्रदेश की ST सूची में पांच अधिसूचित समुदायों—भोटिया, बुक्सा, जौनसारी, राजी और थारू—का उल्लेख किया और 1980 के उत्तर प्रदेश पत्र में उल्लिखित अन्य समुदायों को मौजूदा ST सूची में शामिल नहीं माना।
इसलिए 1980 का पत्र महज एक स्थानीय पत्राचार नहीं था। केंद्र सरकार ने बाद में उसकी सामग्री को ST पात्रता के सवाल पर इस्तेमाल किया था। लेकिन मूल 1980 पत्र और उसकी नोटशीट अभी उपलब्ध नहीं है।
यही कारण है कि उस पत्र में उल्लिखित समुदायों और राज्य सरकार की वास्तविक दलील को लेकर अंतिम निष्कर्ष अभी रोकना होगा।
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7. 1991—केंद्र का रिकॉर्ड ‘Jaunsari’ को अधिसूचित ST बताता है
8 अप्रैल 1991 का केंद्रीय प्रशासनिक रिकॉर्ड इस पूरी कहानी की एक महत्वपूर्ण तस्वीर देता है। इसमें उत्तर प्रदेश के लिए पांच ST समुदाय स्पष्ट रूप से दर्ज हैं— भोटिया, बुक्सा, जौनसारी, राजी और थारू।
अर्थात 1991 में केंद्र के आधिकारिक प्रशासनिक रिकॉर्ड में Jaunsari एक notified ST community के रूप में मौजूद था। यही तथ्य 2003 के रिकॉर्ड के साथ रखने पर सबसे बड़ा सवाल पैदा करता है।
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8. 2001—केंद्र और उत्तरांचल फिर आमने-सामने
2001 में विवाद फिर केंद्रीय स्तर पर पहुंचा। न्यायिक रिकॉर्ड में 10 सितंबर 2001 के जनजातीय कार्य मंत्रालय के पत्र और 28 अगस्त 2001 के उत्तरांचल शासन के पत्र का उल्लेख मिलता है।
विषय था—Khasa Jaunsaris, यानी ब्राह्मण और राजपूत वर्ग की ST स्थिति।
इससे एक बात प्रमाणित होती है कि 2001 तक सरकार के भीतर यह प्रश्न जीवित था कि ‘Jaunsari’ की ST पहचान का दायरा किस प्रकार समझा जाए।
यह वही प्रश्न है जिसकी अगली महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति 2003 में राज्यसभा के भीतर दिखाई देती है।
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9. 21 अप्रैल 2003—वह जवाब जिसने विवाद को नई दिशा दी
राज्यसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड में 21 अप्रैल 2003 का केंद्र सरकार का लिखित उत्तर इस पूरी पड़ताल का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज है।
तत्कालीन सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री डॉ. सत्यनारायण जटिया ने कहा कि Jaunsari को “a territorial term encompassing all the residents of the area” माना गया।
अर्थात ‘Jaunsari’ को उस क्षेत्र के निवासियों को समेटने वाला क्षेत्रीय शब्द माना गया।
इसी उत्तर में जौनसार-बावर के कोल्टा और बजगी समुदायों के लोगों को निर्धारित शर्तों के अधीन जौनसार के नाम से ST लाभ का अधिकारी बताया गया।
साथ में यह महत्वपूर्ण शर्त रखी गई कि दावेदार अथवा उसके माता-पिता 24 जून 1967 को जौनसार क्षेत्र के स्थायी निवासी रहे हों।
यहीं से पूरी बहस का सबसे बड़ा संवैधानिक प्रश्न पैदा होता है।
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10. सवाल—‘Territorial term’ आया कहां से?
24 जून 1967 के राष्ट्रपति आदेश के मूल पाठ में ‘territorial term’ वाली यह भाषा दिखाई नहीं देती।
यह भाषा 2003 के संसदीय उत्तर में सामने आती है।
इसलिए अब खोजी पड़ताल का केंद्रीय सवाल है—
2003 के मंत्रालयी उत्तर की फाइल में किस दस्तावेज, किस शासन पत्र, किस कानूनी राय अथवा किस पूर्व निर्णय के आधार पर ‘Jaunsari’ को territorial term माना गया?
यही वह मूल मंत्रालयी फाइल है जिसकी खोज अभी पूरी नहीं हुई है।
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11. कोल्टा जांच समिति को 2003 की व्याख्या से जोड़ना कितना उचित है?
यहां भी एक महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है। कोल्टा जांच समिति ने कोल्टा समुदाय के सामाजिक-आर्थिक शोषण की जांच की थी।
उसे सीधे 1967 की ST अधिसूचना का आधार बताना उपलब्ध दस्तावेजों से सिद्ध नहीं है।
लेकिन समिति का ऐतिहासिक महत्व इसलिए अत्यधिक है कि उसने उसी भूभाग में रहने वाले विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच मौजूद गहरी असमानता को सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज किया।
1963 की राज्यसभा बहस में समिति की रिपोर्ट का इस्तेमाल कोल्टा समुदाय की बंधुआ श्रम जैसी स्थिति बताने के लिए किया गया था।
इसलिए कोल्टा जांच समिति यह समझने के लिए महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि दस्तावेज है कि जौनसार-बावर को केवल एक समरूप सामाजिक समुदाय मानना ऐतिहासिक रूप से कितना जटिल है।
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12. एक और महत्वपूर्ण सामाजिक दस्तावेज—डी.एन. मजूमदार का अध्ययन
1955-57 में डी.एन. मजूमदार और उनकी टीम ने जौनसार-बावर में क्षेत्रीय अध्ययन किया। बाद में 1962 में Himalayan Polyandry: A Study of Jaunsar-Bawar प्रकाशित हुआ।
इस अध्ययन में जौनसार समाज को सामाजिक स्तरों में विभाजित बताया गया—ऊपर ब्राह्मण और खस/राजपूत, बीच में पेशागत समुदाय और नीचे कोल्टा तथा कुछ अन्य समुदाय।
यह अध्ययन भी यह दिखाता है कि “जौनसार क्षेत्र” और “जौनसारी समाज” के भीतर अनेक सामाजिक समुदाय मौजूद थे।
यह ऐतिहासिक समाजशास्त्रीय तथ्य 2003 की territorial interpretation को समझने में मदद करता है, लेकिन अपने आप संवैधानिक ST पात्रता तय नहीं करता।
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13. 2008 के बाद आयोगीय रिकॉर्ड—क्षेत्रीय नामकरण पर सवाल
बाद के राष्ट्रीय आयोगीय दस्तावेजों में ST सूची में क्षेत्रीय नामकरण के कारण पैदा होने वाली समस्या पर चर्चा हुई।
जौनसार के संदर्भ में यह प्रश्न सामने आया कि यदि किसी क्षेत्र का नाम ही ST प्रविष्टि के रूप में इस्तेमाल हो, तो वहां रहने वाले अलग-अलग सामाजिक समुदायों की पात्रता कैसे तय होगी।
यह वही प्रशासनिक समस्या है जो 2003 के ‘territorial term’ वाले उत्तर में दिखाई देती है।
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14. 2025—हाईकोर्ट ने फिर उठाया मूल प्रश्न
2 मई 2025 के उत्तराखंड हाईकोर्ट के आदेश ने इस विवाद को फिर संवैधानिक धरातल पर ला दिया।
मूल प्रश्न यह बना कि क्या केवल किसी क्षेत्र में निवास करना पर्याप्त है, या व्यक्ति का राष्ट्रपति आदेश में अधिसूचित समुदाय से संबंधित होना भी आवश्यक है?
यही सवाल आज के जौनसारी ST प्रमाणपत्र विवाद की धुरी है।
अर्थात दशकों पुराने प्रशासनिक पत्राचार के बावजूद मूल प्रश्न आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।
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15. दस्तावेज क्या कहते हैं—एक नजर में
वर्ष| दस्तावेज/समिति| दस्तावेज से सामने आने वाला तथ्य
1956| उत्तर प्रदेश कोल्टा जांच समिति| कोल्टा समुदाय की सामाजिक-आर्थिक स्थिति की सरकारी जांच
1960| कोल्टा समिति की रिपोर्ट का संदर्भ| शोषण/बंधुआ श्रम और सामाजिक स्थिति की गंभीर तस्वीर
1963| राज्यसभा में समिति की रिपोर्ट का उल्लेख| कोल्टाओं के ऋण-आधारित श्रम को गंभीर शोषण बताया गया
1965| लोकुर समिति| Jaunsari सहित ST सूची संबंधी परीक्षण
24 जून 1967| राष्ट्रपति आदेश| Jaunsari/Jannsari ST सूची में
1969| जौनसारी प्रतिनिधिमंडल| संसद की संयुक्त समिति के सामने जौनसारी पक्ष
21 अगस्त 1980| UP शासन पत्र| ST सूची/समुदायों से संबंधित महत्वपूर्ण प्रशासनिक पत्राचार
8 अप्रैल 1991| केंद्रीय O.M.| पांच अधिसूचित ST समुदायों की पुष्टि
2001| केंद्र-उत्तरांचल पत्राचार| Khasa Jaunsaris की ST स्थिति पर विवाद
21 अप्रैल 2003| राज्यसभा उत्तर| Jaunsari को ‘territorial term’ बताने वाली प्रशासनिक व्याख्या
बाद की आयोगीय रिपोर्ट| क्षेत्रीय नामकरण| समुदाय बनाम क्षेत्र की व्याख्या की समस्या
2025| उत्तराखंड हाईकोर्ट| क्षेत्र में निवास और अधिसूचित समुदाय की पहचान का प्रश्न
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निष्कर्ष : असली विवाद ‘कौन ST है’ से पहले ‘Jaunsari का अर्थ क्या है’ का है
इस पड़ताल से तीन बातें अलग-अलग और स्पष्ट दिखाई देती हैं।
पहली— कोल्टा जांच समिति ने जौनसार-बावर के भीतर मौजूद सामाजिक-आर्थिक शोषण को सरकारी विमर्श में दर्ज किया। इसे ST सूची का आधार बताना उचित नहीं, लेकिन क्षेत्र की सामाजिक संरचना समझने में यह मूलभूत दस्तावेज है।
दूसरी— 1965 की लोकुर समिति और 24 जून 1967 के राष्ट्रपति आदेश के बाद Jaunsari संवैधानिक ST सूची का हिस्सा बना।
तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण— 1991 के केंद्रीय रिकॉर्ड में Jaunsari को अधिसूचित ST समुदाय के रूप में दर्ज करने के बाद 2003 में केंद्र सरकार ने उसी नाम को territorial term बताते हुए कोल्टा और बजगी के लिए ST पात्रता की विशेष प्रशासनिक व्याख्या दी।
यहीं से दस्तावेजी सवाल पैदा होता है:
1991 के ‘notified ST community’ से 2003 के ‘territorial term’ तक पहुंचने वाली मूल सरकारी फाइल कहां है?
और उससे जुड़ा दूसरा सवाल—
24 जून 1967 की ‘स्थायी निवासी’ कसौटी का मूल प्रशासनिक/कानूनी आधार क्या था?
जब तक 1980 के मूल शासन पत्र की पूरी फाइल, 1969 के जौनसारी प्रतिनिधिमंडल का मूल ज्ञापन और 2001-03 की जनजातीय कार्य मंत्रालय की पूरी नोटशीट सार्वजनिक नहीं होती, तब तक किसी एक पक्ष द्वारा अपनी सुविधा से इतिहास का अंतिम अर्थ निकालना दस्तावेजी रूप से अधूरा रहेगा।
इसलिए इस मामले में सरकार से मांग किसी समुदाय को सामूहिक रूप से ST घोषित या अपात्र घोषित करने की नहीं, बल्कि मूल अभिलेख सार्वजनिक करने की होनी चाहिए।
क्योंकि सात दशक पुराने इस विवाद का समाधान भावना, जातीय दबाव या राजनीतिक व्याख्या से नहीं—1967 के राष्ट्रपति आदेश, उसके अधिकृत प्रशासनिक इतिहास और प्रत्येक दावेदार की प्रमाणित सामाजिक पहचान की पारदर्शी जांच से ही संभव है।






