देहरादून/हल्द्वानी। उत्तराखंड के जल, जंगल, जमीन और खनिज संसाधनों पर राज्य के अधिकार तथा भविष्य में इन संसाधनों से राजस्व जुटाने की उसकी क्षमता को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। संसद से पारित Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Bill, 2026 की नई धारा 9D को लेकर किसान मंच उत्तराखंड ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को पत्र भेजा है।
मंच ने मुख्यमंत्री से इस प्रावधान का उत्तराखंड की वित्तीय स्वायत्तता, खनिज राजस्व और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े अधिकारों पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव का उच्चस्तरीय परीक्षण कराने की मांग की है।
किसान मंच का कहना है कि उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य के संदर्भ में खनिज और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ा कोई भी कानूनी परिवर्तन केवल खनन नीति का विषय नहीं है। प्रदेश के पास बड़े औद्योगिक राज्यों की तरह व्यापक औद्योगिक आधार और राजस्व के अनेक स्रोत नहीं हैं।
ऐसे में जल, जंगल, जमीन, खनिज और अन्य प्राकृतिक संपदा भविष्य में राज्य की आर्थिक मजबूती का बड़ा आधार बन सकती है। इसलिए इन संसाधनों से राजस्व प्राप्त करने या उन पर किसी प्रकार का टैक्स, सेस अथवा लेवी लगाने की राज्य की क्षमता में बदलाव का असर आने वाली सरकारों और आने वाली पीढ़ियों तक पड़ सकता है।
मुख्यमंत्री को भेजे पत्र में किसान मंच ने विशेष रूप से नई धारा 9D का उल्लेख किया है। मंच के मुताबिक उपलब्ध सरकारी विवरण में mineral rights और mineral-bearing lands पर राज्यों द्वारा लगाए जाने वाले टैक्स, सेस अथवा अन्य लेवी को केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित शर्तों और प्रतिबंधों के अधीन किए जाने तथा mineral-bearing land को केंद्रीय नियामकीय व्यवस्था के दायरे में लाने की बात सामने आती है। इसी को आधार बनाकर किसान मंच ने राज्य सरकार से पूछा है कि नई व्यवस्था लागू होने के बाद उत्तराखंड की स्वतंत्र रूप से राजस्व जुटाने की क्षमता पर वास्तविक प्रभाव क्या होगा।
पत्र में एक बुनियादी सवाल भी उठाया गया है—जब खनिज उत्तराखंड की धरती से निकलेगा, खनन का पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव उत्तराखंड के गांवों तथा स्थानीय आबादी पर पड़ेगा, पहाड़ और नदियां प्रभावित होंगी और खनिज परिवहन का दबाव राज्य की सड़कों पर पड़ेगा, तो प्राकृतिक संसाधनों से राजस्व जुटाने से संबंधित निर्णयों में उत्तराखंड की शक्ति कमजोर क्यों होनी चाहिए?
किसान मंच का तर्क है कि हिमालयी राज्य में खनन को केवल उस खनिज की बाजार कीमत या उससे मिलने वाले तत्काल राजस्व के आधार पर नहीं देखा जा सकता। पहाड़ों में खनन के साथ पर्यावरण, भूगर्भीय संवेदनशीलता, जलस्रोतों, नदियों, जंगलों, स्थानीय रोजगार और आसपास रहने वाले समुदायों के हित भी जुड़े होते हैं। इन परिस्थितियों में राज्य सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि खनन से उत्पन्न अधिकांश स्थानीय चुनौतियों का सामना अंततः राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था को ही करना पड़ता है।
मंच ने यह भी कहा है कि प्राकृतिक संसाधनों की आर्थिक कीमत आने वाले वर्षों में और बढ़ सकती है। आज जिन संसाधनों को सामान्य राजस्व स्रोत माना जा रहा है, वही भविष्य में उत्तराखंड की वित्तीय आत्मनिर्भरता के लिए महत्वपूर्ण पूंजी साबित हो सकते हैं। इसलिए वर्तमान सरकार की जिम्मेदारी केवल आज के राजस्व की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करना भी है जिसमें भविष्य की राज्य सरकारों के पास अपने प्राकृतिक संसाधनों से आय जुटाने के पर्याप्त अधिकार बने रहें।
किसान मंच ने मुख्यमंत्री धामी से मांग की है कि राज्य के वित्त, खनन, न्याय और संबंधित विभागों के स्तर पर MMDR Amendment Bill 2026 तथा विशेष रूप से धारा 9D का विस्तृत अध्ययन कराया जाए।
सरकार यह आकलन करे कि इस प्रावधान के बाद राज्य की कर लगाने की शक्ति, खनिज आधारित राजस्व, पहले से उपलब्ध वित्तीय अधिकार और भविष्य में नए राजस्व स्रोत विकसित करने की क्षमता किस सीमा तक प्रभावित हो सकती है।
पत्र में यह अपेक्षा भी जताई गई है कि यदि कानूनी परीक्षण में उत्तराखंड के संवैधानिक, वित्तीय अथवा प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े हितों पर प्रतिकूल प्रभाव की आशंका सामने आती है तो राज्य सरकार को केवल पत्राचार तक सीमित नहीं रहना चाहिए। केंद्र सरकार के समक्ष राज्य का पक्ष मजबूती से रखा जाए और उपलब्ध संवैधानिक एवं कानूनी विकल्पों पर विचार किया जाए।
किसान मंच का कहना है कि किसी केंद्रीय कानून या उसके प्रावधान पर सवाल उठाना केंद्र और राज्य के बीच टकराव का विषय नहीं माना जाना चाहिए। संघीय व्यवस्था में राज्य सरकार की जिम्मेदारी अपने प्रदेश के आर्थिक हितों और अधिकारों का परीक्षण करना भी है। यदि किसी कानून का प्रभाव उत्तराखंड की दीर्घकालीन आय, संसाधनों अथवा वित्तीय निर्णय लेने की क्षमता पर पड़ सकता है, तो प्रदेश सरकार को उस पर अपनी स्पष्ट स्थिति जनता के सामने रखनी चाहिए।
मंच ने मुख्यमंत्री से यह भी स्पष्ट करने की मांग की है कि नई धारा 9D लागू होने के बाद उत्तराखंड सरकार के पास mineral rights और mineral-bearing lands के संबंध में टैक्स, सेस या अन्य लेवी तय करने की व्यावहारिक स्वतंत्रता कितनी रहेगी और क्या भविष्य में राज्य अपने स्थानीय आर्थिक, पर्यावरणीय तथा सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर अलग वित्तीय निर्णय ले सकेगा।
किसान मंच ने इस पूरे मुद्दे को उत्तराखंड के दीर्घकालीन आर्थिक भविष्य से जोड़ते हुए कहा है कि प्राकृतिक संसाधन किसी एक सरकार या एक कार्यकाल की संपत्ति नहीं हैं। ये प्रदेश की आने वाली पीढ़ियों की आर्थिक पूंजी हैं। इसलिए आज इनसे जुड़े अधिकारों में होने वाला कोई भी परिवर्तन भविष्य में उत्तराखंड की आर्थिक दिशा तय कर सकता है।
अब इस पत्र के बाद बड़ा सवाल राज्य सरकार के सामने है—यदि जमीन उत्तराखंड की है, खनिज उत्तराखंड के हैं, खनन का पर्यावरणीय-सामाजिक बोझ उत्तराखंड उठाता है, तो इन संसाधनों से भविष्य का राजस्व जुटाने और आर्थिक निर्णय लेने में प्रदेश के अधिकार कितने सुरक्षित रहेंगे?
किसान मंच ने मुख्यमंत्री धामी से इसी सवाल पर स्पष्ट जवाब, उच्चस्तरीय परीक्षण और आवश्यकता पड़ने पर केंद्र सरकार के सामने उत्तराखंड का मजबूत पक्ष रखने की मांग की है।


