- कांग्रेस हाईकमान के तेवर सख्त, हरीश रावत की यात्रा पर बढ़ा विवाद
- शैलजा की आपत्ति के बावजूद जसपुर से हल्द्वानी तक निकली धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा, वेणुगोपाल ने कहा—व्यक्तिगत अभियान बर्दाश्त नहीं; 7-8 अक्टूबर को शैलजा से मिल सकते हैं रावत
देहरादून, 5 अक्टूबर। नीरज उत्तराखंडी
उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान एक बार फिर खुलकर सामने आ गई है। पूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत की ‘धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा’ को लेकर प्रदेश संगठन से शुरू हुआ विवाद अब कांग्रेस हाईकमान तक पहुंच गया है। प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा की आपत्ति और यात्रा रोकने के आग्रह के बावजूद रावत सोमवार को जसपुर से अपनी यात्रा पर निकल गए। इसके बाद कांग्रेस महासचिव (संगठन) केसी वेणुगोपाल ने रावत को दिल्ली बुलाकर संगठन के साथ समन्वय में चुनावी अभियान चलाने का स्पष्ट संदेश दिया है।
शैलजा ने एक अक्टूबर को लिखा था पत्र
विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब कांग्रेस की उत्तराखंड प्रभारी कुमारी शैलजा ने 1 अक्टूबर को हरीश रावत को पत्र लिखकर उनकी यात्रा पर आपत्ति जताई। रिपोर्टों के मुताबिक शैलजा ने कहा कि यात्रा को लेकर न तो उनसे और न ही प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष से चर्चा की गई थी।
उन्होंने चुनाव से कुछ महीने पहले पार्टी नेताओं को एकजुट होकर काम करने की जरूरत बताते हुए कहा कि इस समय किसी भी तरह का समानांतर कार्यक्रम पार्टी के हित में नहीं होगा। रावत से इन कार्यक्रमों को आगे नहीं बढ़ाने का आग्रह भी किया गया।
पत्र के बावजूद नहीं रुकी यात्रा
हाईकमान की आपत्ति के बावजूद हरीश रावत ने यात्रा रोकने के बजाय इसे जारी रखने का ऐलान किया। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि उत्तराखंड के स्वाभिमान और कांग्रेस की वापसी के संकल्प के साथ अब रुकना नहीं है। इसके बाद सोमवार को जसपुर से यात्रा शुरू हुई, जो काशीपुर, रामनगर और कालाढूंगी होते हुए हल्द्वानी तक पहुंची।
काशीपुर में रावत ने कहा कि जनता बदलाव चाहती है और उन्होंने आगामी चुनावों के संदर्भ में कांग्रेस की वापसी का दावा किया। यात्रा में उनके साथ कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं चकराता विधायक प्रीतम सिंह समेत स्थानीय पार्टी नेता और कार्यकर्ता भी नजर आए।
वेणुगोपाल ने दिया स्पष्ट संदेश
मामला बढ़ने के बाद कांग्रेस महासचिव संगठन केसी वेणुगोपाल और हरीश रावत की मुलाकात हुई। वेणुगोपाल ने स्पष्ट किया कि उत्तराखंड में कांग्रेस का चुनावी अभियान सभी नेताओं को साथ लेकर और पार्टी के आधिकारिक मंच से चलाया जाएगा।
उन्होंने कहा कि पार्टी व्यक्तिगत अभियानों को बर्दाश्त नहीं करेगी और संगठन द्वारा तय कार्यक्रमों के अनुसार सामूहिक कार्यक्रम ही किए जाने चाहिए। कांग्रेस नेतृत्व का जोर आगामी चुनाव को ध्यान में रखते हुए प्रदेश के सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं की ऊर्जा को एकजुट करने पर है।

रावत से बातचीत के बाद फैसला लेगी कांग्रेस
इस बीच कुमारी शैलजा ने संकेत दिया है कि रावत ने उनके पत्र का जवाब दिया है और वह 7 या 8 अक्टूबर को उनसे मुलाकात कर अपना पक्ष रख सकते हैं। शैलजा ने कहा कि पार्टी उनके पक्ष को सुनेगी और उसके बाद आगे की स्थिति स्पष्ट होगी। उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव के समय पार्टी में अनुशासन बेहद जरूरी है।
इससे स्पष्ट है कि फिलहाल मामला किसी औपचारिक अनुशासनात्मक कार्रवाई तक नहीं पहुंचा है, बल्कि हाईकमान रावत के साथ बातचीत के जरिए संगठनात्मक अनुशासन और चुनावी रणनीति के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।
यात्रा बनाम संगठन—असल टकराव यही
हरीश रावत की यात्रा को उनके समर्थक जनता से सीधा संवाद और कांग्रेस को चुनावी रूप से सक्रिय करने की पहल के रूप में देख रहे हैं। वहीं पार्टी नेतृत्व की चिंता यह है कि यदि वरिष्ठ नेता अपने स्तर पर अलग-अलग राजनीतिक कार्यक्रम चलाते हैं तो चुनाव से पहले प्रदेश कांग्रेस में अलग-अलग शक्ति केंद्रों का संदेश जा सकता है।
उत्तराखंड कांग्रेस में गुटीय खींचतान कोई नई बात नहीं है। रावत, प्रीतम सिंह और प्रदेश संगठन से जुड़े विभिन्न नेताओं के बीच राजनीतिक समीकरण लंबे समय से चर्चा में रहे हैं। ऐसे में चुनाव से ठीक पहले रावत की सक्रियता और हाईकमान की संगठनात्मक अनुशासन पर जोर ने इस पुराने विवाद को फिर सतह पर ला दिया है।
क्या रावत झुकेंगे या यात्रा का नया रास्ता निकलेगा?
अब निगाहें रावत और शैलजा की प्रस्तावित मुलाकात पर हैं। सवाल यह है कि क्या रावत अपनी यात्रा को पार्टी के आधिकारिक कार्यक्रम में समाहित करने पर सहमत होंगे या इसे अपने राजनीतिक जनसंवाद अभियान के रूप में जारी रखेंगे।
दूसरी ओर हाईकमान के लिए भी रावत को पूरी तरह अलग-थलग करना आसान नहीं है। वह उत्तराखंड कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ नेताओं में हैं और पूर्व मुख्यमंत्री होने के साथ प्रदेश की राजनीति में उनका अपना प्रभाव और समर्थक आधार है। ऐसे में कांग्रेस के सामने चुनौती अनुशासन बनाए रखने के साथ वरिष्ठ नेतृत्व को साथ लेकर चलने की है।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि ‘धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा’ अब महज एक राजनीतिक यात्रा नहीं रह गई है, बल्कि यह उत्तराखंड कांग्रेस में संगठन बनाम व्यक्तिगत राजनीतिक सक्रियता की बहस का केंद्र बन चुकी है। आने वाले दिनों में रावत-शैलजा की बातचीत और हाईकमान के अगले कदम से इस टकराव की दिशा तय होगी।






