हल्द्वानी: उत्तराखंड में पशुपालकों के लिए दूध का उचित खरीद मूल्य तय करने की मांग अब आंदोलन की ओर बढ़ती नजर आ रही है। किसान मंच उत्तराखंड ने सरकार को दो सप्ताह का समय देते हुए कहा है कि यदि इस अवधि में पशुपालकों के हित में ठोस निर्णय नहीं लिया गया तो मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की विधानसभा चंपावत से शांतिपूर्ण आंदोलन शुरू किया जाएगा।
किसान मंच ने मंगलवार को हल्द्वानी के मोती महल रेस्टोरेंट में आयोजित प्रेस वार्ता में पशुपालकों की बढ़ती लागत और दूध के मौजूदा खरीद मूल्य का मुद्दा उठाया। संगठन ने हिमाचल प्रदेश में दूध के खरीद मूल्य में की गई बढ़ोतरी का हवाला देते हुए उत्तराखंड सरकार से भी पशुपालकों के लिए बेहतर मूल्य तय करने की मांग की।
‘हिमाचल में गाय का दूध ₹61 तो उत्तराखंड में क्यों नहीं?’
किसान मंच की प्रदेश प्रवक्ता कुसुम लता बौड़ाई ने कहा कि उत्तराखंड में पशुपालन केवल दूध बेचने का माध्यम नहीं है, बल्कि पहाड़ के ग्रामीण परिवारों की आजीविका और महिलाओं की आर्थिक भागीदारी से भी जुड़ा है।
उन्होंने कहा कि पशुपालकों की लागत लगातार बढ़ रही है। चारा, पशु आहार, दवाइयां और पशुओं के इलाज पर खर्च बढ़ने के बावजूद दूध का उचित मूल्य सुनिश्चित नहीं किया जा रहा है।
किसान मंच ने हिमाचल प्रदेश के वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट का हवाला देते हुए दावा किया कि वहां गाय के दूध का खरीद मूल्य ₹51 से बढ़ाकर ₹61 प्रति लीटर और भैंस के दूध का ₹61 से बढ़ाकर ₹71 प्रति लीटर करने की घोषणा की गई है। संगठन ने यह भी कहा कि दूध खरीद से जुड़ी प्रोत्साहन राशि ₹3 से बढ़ाकर ₹6 प्रति लीटर करने की घोषणा की गई है।
किसान मंच ने सवाल उठाया कि जब हिमाचल में पशुपालकों के दूध का मूल्य बढ़ाया जा सकता है तो उत्तराखंड में ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता।
1 अक्टूबर को दिया था ज्ञापन
किसान मंच के मुताबिक, संगठन ने 1 अक्टूबर 2026 को डेयरी विकास विभाग के निदेशक को ज्ञापन सौंपकर अपनी मांग रखी थी। संगठन ने कहा कि सरकार और विभाग को समाधान के लिए दो सप्ताह का समय दिया गया है।
किसान मंच ने कहा कि वह इस अवधि में सरकार के सकारात्मक निर्णय की प्रतीक्षा करेगा और सरकार, पशुपालकों, दुग्ध संघों तथा संबंधित अधिकारियों के बीच बातचीत के जरिए समाधान चाहता है।
फैसला नहीं हुआ तो चंपावत से आंदोलन
किसान मंच के प्रदेश अध्यक्ष कार्तिक उपाध्याय ने कहा कि संगठन ने आंदोलन को पहला विकल्प नहीं बनाया है। पहले सरकार के सामने मांग रखी गई है और बातचीत का अवसर दिया गया है।
उन्होंने कहा कि दो सप्ताह की समय-सीमा पूरी होने के बाद पहले चंपावत के पशुपालकों के साथ बैठक और जनसंवाद किया जाएगा। इसके बाद आंदोलन की तारीख और चरणबद्ध कार्यक्रम सार्वजनिक किया जाएगा।
संगठन ने कहा है कि आवश्यकता पड़ने पर आंदोलन को चंपावत से कुमाऊं और फिर पूरे उत्तराखंड तक ले जाने की तैयारी की जाएगी।
‘पहाड़ बचाना है तो पशुपालक को आर्थिक रूप से मजबूत करना होगा’
कार्तिक उपाध्याय ने कहा कि पहाड़ों से पलायन रोकने और गांवों को आबाद रखने की बात लंबे समय से होती रही है, लेकिन इसके लिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि यदि पशुपालन परिवारों के लिए आर्थिक रूप से लाभकारी नहीं रहेगा तो नई पीढ़ी इस व्यवसाय को आगे बढ़ाने में रुचि नहीं लेगी। किसान मंच ने दूध के उचित खरीद मूल्य को ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पशुपालकों की आय से जोड़ते हुए सरकार से स्पष्ट नीति बनाने की मांग की।
युवा पशुपालकों को जोड़ने की तैयारी
किसान मंच के प्रदेश उपाध्यक्ष युवा पहाड़ी कमल तिवारी ने कहा कि पहाड़ का युवा रोजगार के लिए मैदानी क्षेत्रों और दूसरे राज्यों की ओर जा रहा है। उनके मुताबिक, पशुपालन और खेती से जुड़े परिवारों को आर्थिक सुरक्षा दिए बिना युवाओं को गांवों में रोकना चुनौतीपूर्ण होगा।
उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर किसान मंच की युवा टीम गांव-गांव जाकर पशुपालकों से संवाद करेगी।
हल्द्वानी और नैनीताल के पशुपालकों को जोड़ने का दावा
किसान मंच के हल्द्वानी ब्लॉक अध्यक्ष ललित मोहन जोशी ने कहा कि दूध के उचित मूल्य का मुद्दा केवल चंपावत तक सीमित नहीं है। संगठन हल्द्वानी और नैनीताल क्षेत्र के पशुपालकों से भी संपर्क कर उन्हें अभियान से जोड़ने की तैयारी कर रहा है।
किसान और सामाजिक संगठनों से मांगा जाएगा समर्थन
किसान मंच के संरक्षक पीयूष जोशी ने कहा कि सरकार के साथ संवाद का रास्ता अभी खुला है। यदि दो सप्ताह में ठोस समाधान नहीं निकला तो आंदोलन की घोषणा के बाद प्रदेश के किसान संगठनों, पशुपालक संगठनों, सामाजिक संगठनों और जनसंगठनों से समर्थन मांगा जाएगा।
उन्होंने कहा कि आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से चलाया जाएगा और सरकार की ओर से ठोस समाधान मिलने तक आंदोलन जारी रखने की बात कही।
सरकार के सामने किसान मंच की प्रमुख मांग
किसान मंच का मुख्य जोर पशुपालकों के दूध का सम्मानजनक और लागत के अनुरूप खरीद मूल्य सुनिश्चित करने पर है। संगठन का कहना है कि बढ़ती लागत को देखते हुए सरकार को ऐसी नीति बनानी चाहिए, जिससे दूध उत्पादन करने वाले किसानों को उनकी मेहनत का उचित आर्थिक लाभ मिल सके।






