कुर्सी पर बैठे-बैठे विदेश यात्रा? वन निगम में लाखों के घोटाले का पर्दाफाश

देहरादून: उत्तराखंड वन विकास निगम मुख्यालय से जुड़ा एक गंभीर वित्तीय गड़बड़ी का मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। यह प्रकरण तत्कालीन प्रबंध निदेशक गिरिजा शंकर पांडेय की एक विदेशी यात्रा से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है, जिसमें लाखों रुपये के संदिग्ध भुगतान की बात सामने […]

देहरादून:

उत्तराखंड वन विकास निगम मुख्यालय से जुड़ा एक गंभीर वित्तीय गड़बड़ी का मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। यह प्रकरण तत्कालीन प्रबंध निदेशक गिरिजा शंकर पांडेय की एक विदेशी यात्रा से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है, जिसमें लाखों रुपये के संदिग्ध भुगतान की बात सामने आई है।

 

जानकारी के मुताबिक, 2 अप्रैल से 8 अप्रैल 2025 के बीच की इस विदेश यात्रा में खर्च के कई ऐसे पहलू सामने आए हैं, जो रिकॉर्ड और वास्तविक स्थिति में स्पष्ट विरोधाभास दर्शाते हैं। दस्तावेजों के अनुसार, 1 अप्रैल से 5 अप्रैल तक वियतनाम के हनोई स्थित होटल डोल्से में ठहरने के लिए 2,75,258 रुपये का भुगतान टूर एजेंसी को किया गया। जबकि उपलब्ध रिकॉर्ड बताते हैं कि 1 अप्रैल को संबंधित अधिकारी देहरादून में ही मौजूद थे। ऐसे में उसी दिन हनोई में चेक-इन दिखाया जाना गंभीर संदेह पैदा करता है।

 

यात्रा के दौरान निजी खरीदारी को लेकर भी सवाल उठे हैं। आरोप है कि शॉल और टोपी जैसी व्यक्तिगत वस्तुओं पर 44,880 रुपये खर्च किए गए, जिसका भुगतान भी निगम के खाते से किया गया। यह वित्तीय नियमों के स्पष्ट उल्लंघन की श्रेणी में आता है।

 

वहीं, ठहरने के खर्चों में भी असामान्य पैटर्न देखने को मिला है। 6 और 7 अप्रैल के लिए हनोई के मेलिया होटल में 1,17,237 रुपये का भुगतान किया गया, जबकि इसी अवधि में 6 से 8 अप्रैल के बीच सिएम रीप होटल के लिए 1,42,857 रुपये भी जारी किए गए। यानी एक ही तारीख में दो अलग-अलग स्थानों पर ठहरने के बिल निगम को प्रस्तुत किए गए।

 

इसके अलावा, 4 और 5 अप्रैल को क्रूज यात्रा और ठहराव के नाम पर 3,50,191 रुपये का अलग से भुगतान किया गया। हैरानी की बात यह है कि इसी दौरान होटल डोल्से का किराया भी जारी रहा। इस तरह एक ही समय में तीन अलग-अलग स्थानों पर ठहरने के खर्च दिखाकर सरकारी धन के दुरुपयोग की आशंका जताई जा रही है।

 

पूरे मामले में यह भी सामने आया है कि यात्रा, ठहरने और खानपान से जुड़े सभी खर्च नियमों के अनुसार स्वयं वहन करने के बजाय टूर एजेंसी के माध्यम से किए गए। साथ ही, टूर एजेंसी के चयन में निर्धारित प्रक्रियाओं जैसे टेंडर या कोटेशन को नजरअंदाज करने के आरोप भी लगे हैं।

 

इस पूरे घटनाक्रम ने न केवल वित्तीय पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि जिम्मेदार पदों पर बैठे अधिकारियों की कार्यशैली को भी कटघरे में ला दिया है। अब देखना होगा कि इस मामले में जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है और जिम्मेदारों पर क्या कार्रवाई होती है।

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