दावे बड़े, सुविधाएं बदहाल: शोपीस बना बीएसएनएल कार्यालय

विकासनगर। 28 अक्तूबर 2026,नीरज उत्तराखंडी  पुराना सिम अपग्रेड कराने और नया सिम लेने के लिए त्यूणी के उपभोक्ता काट रहे विकासनगर के चक्कर, तीन दिन से सिस्टम ठप होने का हवाला सीमांत तहसील में सिम बदलने की सुविधा नहीं, उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त किराया और दो दिन का समय गंवाने की मार विकासनगर। सरकारी दूरसंचार कंपनी […]

विकासनगर। 28 अक्तूबर 2026,नीरज उत्तराखंडी 

  • पुराना सिम अपग्रेड कराने और नया सिम लेने के लिए त्यूणी के उपभोक्ता काट रहे विकासनगर के चक्कर, तीन दिन से सिस्टम ठप होने का हवाला
  • सीमांत तहसील में सिम बदलने की सुविधा नहीं, उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त किराया और दो दिन का समय गंवाने की मार

विकासनगर। सरकारी दूरसंचार कंपनी बीएसएनएल डिजिटल सेवाओं को गांव-गांव तक पहुंचाने और उपभोक्ताओं को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने के दावे भले ही लगातार करती हो, लेकिन विकासनगर स्थित बीएसएनएल कार्यालय की स्थिति इन दावों की हकीकत पर सवाल खड़े कर रही है।

सीमांत तहसील त्यूणी से अपने पुराने सिम को अपग्रेड कराने अथवा नया सिम लेने के लिए उपभोक्ताओं को विकासनगर कार्यालय के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। यहां पहुंचने के बाद भी समस्या का समाधान तत्काल हो जाए, इसकी कोई गारंटी नहीं है।

उपभोक्ताओं के अनुसार त्यूणी जैसे सीमांत क्षेत्र में बीएसएनएल के सिम को बदलने या अपग्रेड करने की सुविधा उपलब्ध नहीं है। इसके चलते उपभोक्ताओं को करीब दो दिन का समय निकालकर विकासनगर पहुंचना पड़ता है। दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्र से विकासनगर आने-जाने में किराया, भोजन तथा अन्य खर्च अलग से वहन करना पड़ता है। यानी जिस डिजिटल सुविधा को उपभोक्ताओं के लिए आसान और सुलभ होना चाहिए, वही सुविधा उनके लिए अतिरिक्त आर्थिक बोझ और समय की बर्बादी का कारण बन रही है।

तीन दिन से सिस्टम खराब, उपभोक्ता खाली हाथ

सोमवार को विकासनगर स्थित बीएसएनएल कार्यालय पहुंचे उपभोक्ताओं को कर्मचारियों की ओर से बताया गया कि पिछले तीन दिनों से सिस्टम काम नहीं कर रहा है। इसकी वजह तकनीकी खराबी बताई गई। दूरदराज से उम्मीद लेकर पहुंचे उपभोक्ताओं को ऐसे में निराश होकर लौटने अथवा सिस्टम ठीक होने का इंतजार करने की स्थिति पैदा हो गई।

सवाल यह है कि यदि मुख्यालय स्तर के कार्यालय में ही लगातार तीन दिन से सिस्टम काम नहीं कर रहा है तो दूरस्थ क्षेत्रों से आने वाले उपभोक्ताओं के लिए विभाग ने वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की? क्या तकनीकी खराबी की जानकारी संबंधित उपभोक्ताओं को पहले से देने की कोई व्यवस्था है? यदि नहीं, तो दूर-दराज से आने वाले लोगों के समय और पैसे की जिम्मेदारी किसकी है?

त्यूणी में सुविधा नहीं, विकासनगर तक दौड़

त्यूणी क्षेत्र के उपभोक्ताओं का कहना है कि बीएसएनएल की सेवाओं के लिए उन्हें पहले से ही भौगोलिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। सीमांत तहसील में यदि सामान्य सेवा के लिए भी विकासनगर की दौड़ लगानी पड़े और वहां पहुंचने पर सिस्टम बंद मिले, तो विभाग के ‘सुविधा आपके द्वार’ और डिजिटल सेवा विस्तार के दावे सवालों के घेरे में आ जाते हैं।

एक ओर सरकार और विभाग डिजिटल इंडिया, ऑनलाइन सेवाओं तथा बेहतर कनेक्टिविटी की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर उपभोक्ताओं को एक सामान्य काम के लिए कई घंटे का सफर और दो दिन का समय खर्च करना पड़ रहा है।

मुख्यालय का यह हाल तो दूरदराज क्षेत्रों का क्या होगा?

विकासनगर बीएसएनएल का महत्वपूर्ण कार्यालय है। यदि यहां उपभोक्ता सेवाओं से जुड़ा सिस्टम लगातार कई दिनों तक बाधित रहता है, तो सहज ही सवाल उठता है कि दूरस्थ और सीमांत क्षेत्रों में बीएसएनएल की सेवाओं की वास्तविक स्थिति क्या होगी।

उपभोक्ताओं का कहना है कि विभाग को केवल सुविधाओं के दावे करने के बजाय जमीनी स्तर पर सेवा केंद्रों को तकनीकी रूप से सक्षम बनाना चाहिए। विशेषकर त्यूणी जैसे सीमांत क्षेत्र में सीएम परिवर्तन, अपग्रेडेशन और नए सीएम से संबंधित सुविधा उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि लोगों को विकासनगर तक अनावश्यक दौड़ न लगानी पड़े।

सवालों के घेरे में बीएसएनएल की कार्यप्रणाली

मामला केवल एक तकनीकी खराबी का नहीं है। यह सवाल सार्वजनिक सेवा की जवाबदेही, सुविधा की उपलब्धता और दूरस्थ क्षेत्र के उपभोक्ताओं के साथ व्यवस्था के व्यवहार से जुड़ा है। यदि तीन दिन से सिस्टम खराब है तो उसकी वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई? यदि त्यूणी में यह सुविधा उपलब्ध नहीं है तो उसे शुरू करने की पहल कब होगी? और सबसे अहम—दूरदराज से आने वाले उपभोक्ताओं के समय और आर्थिक नुकसान की भरपाई जैसी कोई व्यवस्था विभाग के पास है या नहीं?

बीएसएनएल को इन सवालों का जवाब देना होगा। क्योंकि उपभोक्ता केवल कनेक्शन या सिम नहीं खरीदता, वह सेवा के लिए शुल्क भी देता है।

दावे बड़े हैं, लेकिन यदि एक छोटे से काम के लिए सीमांत क्षेत्र के उपभोक्ता दो दिन और अतिरिक्त पैसा खर्च करने को मजबूर हों, तो फिर सवाल यही है—सेवा सुविधा है या उपभोक्ताओं की फजीहत?

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