- प्रारंभिक जांच में ₹57 करोड़ के एडवांस में ₹13 करोड़ का हिसाब नहीं मिला; 60 योजनाओं की जमीनी जांच के आदेश, पुराने कामों पर फिर नए इस्टीमेट
उत्तरकाशी। 1 नवम्बर
रिपोर्ट – नीरज उत्तराखंडी
हर घर नल से जल पहुंचाने के उद्देश्य से शुरू हुआ जल जीवन मिशन उत्तरकाशी में अब केवल पेयजल आपूर्ति का कार्यक्रम नहीं रह गया है। उपलब्ध दस्तावेजों और जांच संबंधी रिपोर्टों ने वित्तीय अनुशासन, तकनीकी सर्वेक्षण, वन स्वीकृति और योजनाओं की वास्तविक उपयोगिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सबसे गंभीर मामला मोरी विकासखंड का है। पेयजल निगम के अधीक्षण अभियंता की अध्यक्षता वाली प्रारंभिक जांच में 668 योजनाओं में करीब ₹57 करोड़ के एडवांस भुगतान का उल्लेख हुआ।
रिपोर्ट के अनुसार इसमें करीब ₹13 करोड़ का लेखा-मिलान स्पष्ट नहीं हो सका, जबकि लगभग ₹44 करोड़ के एडवांस का भी कागजी रिकॉर्ड और धरातलीय कार्य से मिलान सवालों के घेरे में पाया गया। जांच में बिल, वाउचर, टेस्ट रिपोर्ट, क्षतिपूर्ति बांड, ठेकेदारों के मांग पत्र और अन्य अभिलेखों के उपलब्ध न होने की बात सामने आई।
55 फीसदी तक एडवांस, बैंक गारंटी पर भी सवाल
प्रारंभिक जांच के अनुसार कुछ मामलों में ठेकेदारों को 55 फीसदी तक एडवांस दिए जाने की बात सामने आई, जबकि जांच रिपोर्ट में निर्धारित सीमा 10 फीसदी बताई गई। साथ ही बैंक गारंटी/एफडी तथा एडवांस समायोजन की प्रक्रिया पर भी सवाल उठे। कुछ अग्रिम राशि लंबे समय तक समायोजित नहीं होने की बात जांच में सामने आई।
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ₹13 करोड़ को अभी गबन की अंतिम प्रमाणित राशि कहना उचित नहीं होगा। उपलब्ध सामग्री इसे प्रारंभिक जांच में सामने आया अनमिलान/अस्पष्ट भुगतान बताती है। अंतिम जिम्मेदारी, वसूली और दंडात्मक कार्रवाई के लिए विभागीय जांच की अंतिम रिपोर्ट और योजना-वार भुगतान अभिलेख निर्णायक होंगे।
वन स्वीकृति से पहले टेंडर—योजना की टाइमलाइन पर सवाल
जांच में यह भी सामने आया कि वन भूमि से गुजरने वाली कुछ योजनाओं में वन स्वीकृति से पहले टेंडर और एडवांस भुगतान किए गए। यदि किसी परियोजना का महत्वपूर्ण हिस्सा वन भूमि पर निर्भर था और आवश्यक स्वीकृति लंबित थी, तो काम की व्यवहार्यता सुनिश्चित किए बिना भुगतान करने की प्रक्रिया अपने आप में गंभीर प्रशासनिक सवाल खड़ा करती है।
मई 2026 में भी उत्तरकाशी प्रशासन ने वन भूमि हस्तांतरण से जुड़े लंबित प्रकरणों और जल जीवन मिशन की धीमी प्रगति पर नाराजगी जताते हुए अधिकारियों से जवाब-तलब किया था। इससे यह स्पष्ट होता है कि वन स्वीकृति और परियोजना क्रियान्वयन का टकराव एक पुरानी और पूरी तरह हल न हुई समस्या है।
60 योजनाओं की थर्ड पार्टी जांच क्यों जरूरी हुई?
मामला केवल मोरी तक सीमित नहीं रहा। अक्टूबर 2024 में तीन समितियां बनाकर जिले की 60 पेयजल योजनाओं की जमीनी जांच कराने के निर्देश दिए गए। इनमें नौगांव, मोरी-पुरोला तथा डुंडा-भटवाड़ी-चिन्यालीसौड़ क्षेत्र की योजनाएं शामिल थीं। समितियों को पुराने एडवांस के समायोजन और धरातलीय काम के सत्यापन की जिम्मेदारी भी दी गई।
जिलाधिकारी ने इसके बाद पूरी हो चुकी जल जीवन मिशन योजनाओं की थर्ड पार्टी जांच, जियो-टैगिंग और स्थलीय सत्यापन के निर्देश दिए। खास फोकस मोरी और नौगांव पर रखा गया।
लेकिन उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड में इस 60-योजना जांच की अंतिम, योजना-वार रिपोर्ट और उसके आधार पर हुई अंतिम वसूली/दंडात्मक कार्रवाई का पूरा दस्तावेज सामने नहीं आता। यही इस पड़ताल की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है।
पुरानी योजना की नाकामी, फिर नए इस्टीमेट का सवाल
संग्राली-पाटा पेयजल योजना का इतिहास इस पूरे मामले को और गंभीर बनाता है। CAG की पूर्व रिपोर्ट में पाया गया था कि योजना का बड़ा हिस्सा खराब एलाइनमेंट और अपर्याप्त भौतिक/भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण के कारण अनुपयोगी हो गया था। लगभग ₹1.42 करोड़ का खर्च ऐसे हिस्से पर हुआ जिसे उपयोग योग्य नहीं पाया गया, और लक्षित आबादी को योजना से पानी नहीं मिल सका।
इसके बावजूद 2024 की जांच संबंधी रिपोर्टों में संग्राली-पाटा के लिए लगभग ₹4.41 करोड़ का नया इस्टीमेट सामने आया। बौंगाड़ी के लिए भी लगभग ₹3.15 करोड़ के नए इस्टीमेट का उल्लेख है।
यहां असली सवाल यह नहीं कि नया इस्टीमेट क्यों बना—बल्कि यह है कि पुराने काम की तकनीकी विफलता, खर्च और नए प्रस्ताव के बीच विभागीय रिकॉर्ड क्या कहता है? यदि नया कार्य पुराने दोषपूर्ण कार्य का सुधार है तो उसकी जिम्मेदारी और लागत का निर्धारण कैसे हुआ? और यदि यह नया स्वतंत्र कार्य है तो दोनों योजनाओं के दायरे में क्या अंतर है?
इन सवालों का उत्तर DPR, BOQ, Measurement Book, भुगतान अभिलेख और संशोधित स्वीकृति से ही मिल सकता है।
कागज पर कनेक्शन बनाम वास्तविक पानी
उत्तरकाशी की समस्या केवल पाइप और टैंक तक सीमित नहीं है। गंगोत्री मार्ग क्षेत्र के ग्यानसू में सीवरेज परियोजना का CAG ऑडिट भी यही संकेत देता है कि निर्माण और वास्तविक उपयोगिता के बीच अंतर गंभीर विषय है।
CAG की 2025 की नमामि गंगे रिपोर्ट के अनुसार ग्यानसू के 6,089 घरों में केवल 572 सीवर कनेक्शन, यानी लगभग 9.39 प्रतिशत, उपलब्ध थे। इसका अर्थ यह है कि उपचार संयंत्र मौजूद होने के बावजूद पर्याप्त घरेलू सीवरेज नेटवर्क नहीं होने पर उसकी पूरी क्षमता का लाभ नहीं मिल सकता।
यानी सवाल अब यह होना चाहिए—परियोजना बनी या नहीं, से आगे बढ़कर परियोजना वास्तव में चल रही है या नहीं?
टेकला का रिकॉर्ड भी चेतावनी देता है
CPCB के निरीक्षण रिकॉर्ड में उत्तरकाशी के टेकला क्षेत्र का 0.03 MLD STP 2022 और 2023 दोनों निरीक्षणों में non-operational दर्ज हुआ। दूसरी ओर ग्यानसू का STP परिचालन में दर्ज रहा। इसलिए दोनों परियोजनाओं को एक ही श्रेणी में रखना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
यह उदाहरण बताता है कि निर्माण पूरा होने के बाद O&M, बिजली, सीवर नेटवर्क, इनलेट फ्लो और वास्तविक उपयोग की निगरानी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितना निर्माण।
अब नई परियोजनाओं में बदला मॉडल
2026 में उत्तरकाशी के लिए जारी नए STP/FSTP टेंडरों में एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई देता है। पुरोला की प्रस्तावित परियोजना में 1.25 MLD STP के साथ 6.20 KLD क्षमता की faecal sludge treatment facility और पांच वर्ष का O&M शामिल किया गया है। इसी तरह अन्य प्रस्तावित परियोजनाओं में interception & diversion, STP/FSTP और दीर्घकालीन संचालन को एकीकृत किया गया है।
यह डिजाइन पुराने अनुभवों से सीखने का संकेत हो सकता है, लेकिन टेंडर जारी होना सफलता का प्रमाण नहीं है। असली परीक्षा परियोजना के निर्माण, भुगतान, कमीशनिंग और पांच वर्ष के वास्तविक संचालन के बाद होगी।
बहरहाल सवाल अब पानी की पाइप से आगे निकल चुका है
अब तक मिले दस्तावेजों से उत्तरकाशी में जल जीवन मिशन को सीधे तौर पर कोई एक बड़ा सिद्ध घोटाला घोषित करना तथ्यात्मक रूप से जल्दबाजी होगी। लेकिन दस्तावेजों से यह तस्वीर जरूर उभरती है कि कई स्तरों पर जवाबदेही की गंभीर समस्या रही है—
योजना बनी, लेकिन सर्वेक्षण पर सवाल।
टेंडर हुआ, लेकिन वन स्वीकृति लंबित।
एडवांस मिला, लेकिन भुगतान समायोजन पर सवाल।
काम पूरा बताया गया, लेकिन जमीनी सत्यापन की जरूरत पड़ी।
STP बना, लेकिन पर्याप्त घर नेटवर्क से नहीं जुड़े।
पुराने काम की विफलता के बाद नए इस्टीमेट सामने आए।
इसलिए इस पूरे प्रकरण की अंतिम जांच का केंद्र केवल यह नहीं होना चाहिए कि “कितना पैसा खर्च हुआ?” बल्कि यह भी होना चाहिए कि—
किस योजना पर कितना भुगतान हुआ, कितना काम वास्तव में हुआ, कितनी परिसंपत्ति उपयोग में है, कितने घरों में नियमित पानी पहुंच रहा है, किस अधिकारी ने किस स्तर पर स्वीकृति दी और जहां काम विफल हुआ वहां जिम्मेदारी किसकी तय हुई?
जब तक मोरी के ₹57 करोड़ के एडवांस का अंतिम समायोजन, कथित ₹13 करोड़ के अनमिलान की स्थिति, 60 योजनाओं की थर्ड पार्टी जांच और संग्राली-पाटा जैसे पुराने कार्यों के नए इस्टीमेट का पूरा दस्तावेजी मिलान सार्वजनिक नहीं होता, तब तक उत्तरकाशी की पेयजल योजनाओं की पूरी कहानी अधूरी ही मानी जाएगी।






