- जौनसारी जनजाति प्रमाणपत्र पर बड़ा संवैधानिक सवाल
- जौनसार-बावर में निवास पर्याप्त या अधिसूचित जौनसारी समुदाय की सदस्यता जरूरी? 1967 की राष्ट्रपति अधिसूचना से हाईकोर्ट के सवालों तक प्रमाणपत्र व्यवस्था पर उठे गंभीर प्रश्न
देहरादून। 11 अक्तूबर 2026।नीरज उत्तराखंडी
जौनसार-बावर में अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया अब केवल प्रशासनिक विषय नहीं रह गई है, बल्कि इसके संवैधानिक आधार और पात्रता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
मूल प्रश्न सीधा है—क्या जौनसारी अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र का आधार अधिसूचित ‘जौनसारी’ समुदाय की सदस्यता है या जौनसार-बावर क्षेत्र में निवास करना भी अपने आप में पर्याप्त है?
संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत अनुसूचित जनजातियों की अधिसूचना समुदाय, जनजाति अथवा उसके निर्दिष्ट समूह के आधार पर होती है। वहीं अनुच्छेद 366(25) अनुसूचित जनजाति को अनुच्छेद 342 के तहत अधिसूचित जनजातियों से जोड़ता है। ऐसे में किसी क्षेत्र में रहने मात्र और किसी अधिसूचित जनजातीय समुदाय का सदस्य होने के बीच कानूनी अंतर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
1967 में जौनसारी समुदाय अधिसूचित, पूरा क्षेत्र नहीं
24 जून 1967 के संविधान (अनुसूचित जनजाति) उत्तर प्रदेश आदेश में भोटिया, बुक्सा, जौनसारी, राजी और थारू समुदायों को अनुसूचित जनजाति के रूप में अधिसूचित किया गया था। उत्तराखंड बनने के बाद भी ये समुदाय राज्य की अनुसूचित जनजाति सूची में बने हुए हैं।
यहीं से जौनसार-बावर में प्रमाणपत्र व्यवस्था का सबसे अहम कानूनी सवाल पैदा होता है। अधिसूचना में ‘जौनसारी’ समुदाय का नाम है या पूरे जौनसार-बावर क्षेत्र के प्रत्येक निवासी को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया गया है? दोनों स्थितियों का संवैधानिक अर्थ एक नहीं है।
हाईकोर्ट ने भी पूछे थे प्रमाणपत्र व्यवस्था पर सवाल
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 2 मई 2025 को इटिका पांडे एवं अन्य बनाम उत्तराखंड राज्य मामले में इसी मुद्दे से जुड़े प्रश्नों पर राज्य सरकार से स्पष्टीकरण मांगा था। न्यायालय के समक्ष यह सवाल उठा कि क्या केवल जौनसार क्षेत्र में निवास करने के आधार पर अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र जारी किया जा सकता है।
राज्य सरकार की ओर से यह पक्ष रखा गया कि ‘जौनसारी’ एक अधिसूचित जनजातीय समुदाय है और केवल क्षेत्र में निवास करने से कोई व्यक्ति स्वतः उस समुदाय का सदस्य नहीं हो जाता। न्यायालय ने प्रमाणपत्र जारी करने के मानदंड तथा निवास के आधार पर जारी किए गए प्रमाणपत्रों की संख्या सहित संबंधित जानकारी स्पष्ट करने को कहा था।
हालांकि, इस आदेश को अंतिम न्यायिक निष्कर्ष बताना उचित नहीं होगा। मामले में बाद के आदेश, राज्य सरकार का जवाब और वर्तमान न्यायिक स्थिति देखना आवश्यक है।
असली सवाल—समुदाय की सदस्यता तय कैसे होगी?
यदि केवल क्षेत्र में निवास अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र का पर्याप्त आधार नहीं है, तो अगला सवाल इससे भी महत्वपूर्ण है—जौनसारी समुदाय की सदस्यता प्रमाणित करने की सरकारी कसौटी क्या है?
क्या पुराने राजस्व अभिलेख देखे जाते हैं?
क्या पिता-पितामह के प्रमाणपत्र आवश्यक हैं?
क्या वंशावली की जांच होती है?
क्या पुराने स्कूल अभिलेख, जन्म अभिलेख और पारिवारिक दस्तावेज देखे जाते हैं?
क्या राजस्व अधिकारियों की जांच रिपोर्ट अनिवार्य है?
और सबसे महत्वपूर्ण—इन सबके लिए सरकार ने लिखित रूप से कौन-से नियम तय किए हैं?
यदि स्पष्ट मानक मौजूद हैं तो उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए। यदि नहीं हैं तो इतने महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकार से जुड़े प्रमाणपत्रों की प्रक्रिया किस आधार पर संचालित हो रही है, यह भी सार्वजनिक प्रश्न है।
‘सामान्य जाति’ शब्द से नहीं तय होगी जनजातीय पात्रता
जौनसार-बावर में यह बहस भी सामने आती रही है कि क्या सामान्य जाति से संबंधित व्यक्ति जौनसारी अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र प्राप्त कर सकता है। इसका उत्तर केवल सामाजिक धारणा या जाति के प्रचलित नाम से नहीं दिया जा सकता।
किसी व्यक्ति की वास्तविक पात्रता का प्रश्न उसकी अधिसूचित समुदाय-सदस्यता से जुड़ा है। दूसरी ओर, केवल किसी व्यक्ति को सामान्य जाति का बताकर उसका दावा खारिज करना भी पर्याप्त नहीं हो सकता। अंतिम निर्णय सक्षम प्राधिकारी को लागू कानून, शासनादेश और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच के बाद करना होगा।
‘जौनसारी’, ‘जन्नसारी’ या ‘जौनासारी’—नाम की वर्तनी भी बनी सवाल
जौनसारी समुदाय के नाम की वर्तनी को लेकर भी न्यायिक स्तर पर सवाल उठ चुके हैं। 19 सितंबर 2025 के WPPIL No. 180 of 2025 में राष्ट्रपति आदेश में समुदाय के नाम की वर्तनी से प्रमाणपत्रधारकों को नियुक्ति और अन्य लाभों में कथित कठिनाई का मुद्दा उठाया गया था।
लेकिन यहां भी सावधानी जरूरी है। अदालत द्वारा वर्तनी सुधार पर विचार करने का निर्देश और राष्ट्रपति की अधिसूचना में औपचारिक संशोधन—दो अलग बातें हैं। इसलिए वर्तमान आधिकारिक प्रविष्टि और उसके बाद के किसी संशोधन की प्रमाणित प्रति देखे बिना विवाद समाप्त होने का दावा करना जल्दबाजी होगी।
फर्जी या गलत प्रमाणपत्र पर सुप्रीम कोर्ट की कसौटी महत्वपूर्ण
अनुसूचित जाति और जनजाति प्रमाणपत्रों की जांच के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट का कुमारी माधुरी पाटिल बनाम अतिरिक्त आयुक्त फैसला महत्वपूर्ण है। न्यायालय ने गलत सामाजिक स्थिति प्रमाणपत्रों के आधार पर आरक्षण और अन्य संवैधानिक लाभ लेने से वास्तविक पात्र लोगों को होने वाले नुकसान को गंभीरता से लिया था और प्रमाणपत्रों की जांच के लिए प्रभावी प्रक्रिया पर जोर दिया था।
इसका अर्थ यह नहीं कि माधुरी पाटिल फैसला जौनसारी समुदाय की कोई नई परिभाषा तय करता है। लेकिन इससे यह सिद्धांत जरूर मजबूत होता है कि अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र केवल औपचारिक कागज नहीं, बल्कि संवैधानिक लाभ से जुड़ा प्रमाण है और उसकी जांच विश्वसनीय तथा पारदर्शी होनी चाहिए।
अब प्रशासन से सीधे जवाब की जरूरत
जौनसार-बावर में प्रमाणपत्र व्यवस्था की वास्तविक स्थिति जानने के लिए प्रशासन से कुछ बुनियादी सवालों का जवाब सार्वजनिक होना चाहिए—
कितने जौनसारी ST प्रमाणपत्र जारी हुए?
कितने आवेदन अस्वीकृत हुए?
कितने प्रमाणपत्र निरस्त किए गए?
क्या किसी प्रमाणपत्र की जांच या सत्यापन हुआ?
क्या केवल क्षेत्र में निवास के आधार पर प्रमाणपत्र जारी किए गए?
समुदाय की सदस्यता तय करने के लिए कौन-सा शासनादेश लागू है?
क्या वंशावली और पुराने राजस्व अभिलेखों की जांच अनिवार्य है?
इटिका पांडे मामले में हाईकोर्ट के सवालों पर सरकार ने क्या जवाब दिया?
2025 के वर्तनी विवाद पर केंद्र सरकार ने क्या कार्रवाई की?
इन सवालों के जवाब आंकड़ों और प्रमाणित दस्तावेजों के साथ सामने आने चाहिए।
विवाद का केंद्र यही—क्षेत्र या समुदाय?
जौनसार-बावर को जनजातीय पहचान और विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास के लिए जाना जाता है। लेकिन किसी क्षेत्र की जनजातीय पहचान और संविधान के तहत अधिसूचित अनुसूचित जनजाति की व्यक्तिगत सदस्यता दो अलग कानूनी अवधारणाएं हैं।
इसलिए अब बहस भावनाओं से नहीं, राष्ट्रपति की अधिसूचना, लागू शासनादेश, राजस्व अभिलेख, प्रमाणपत्रों की जांच व्यवस्था और न्यायालय के नवीनतम आदेशों के आधार पर होनी चाहिए।
क्योंकि सवाल सिर्फ एक प्रमाणपत्र का नहीं है। सवाल यह है कि संविधान द्वारा संरक्षित अनुसूचित जनजाति की पहचान तय करने की सरकारी कसौटी आखिर क्या है—जन्म और समुदाय, या केवल जौनसार-बावर में निवास?
जब तक इस सवाल का स्पष्ट, दस्तावेजी और प्रशासनिक उत्तर सामने नहीं आता, जौनसारी जनजाति प्रमाणपत्रों की प्रक्रिया पर उठते सवाल खत्म नहीं होंगे।






