चकराता/ देहरादून। 14 अक्तूबर 2026;नीरज उत्तराखंडी
जौनसारी जनजाति प्रमाणपत्र को लेकर आज जो विवाद दिखाई दे रहा है, उसकी जड़ केवल आरक्षण में नहीं, बल्कि करीब नौ दशक पुराने सामाजिक, प्रशासनिक और संवैधानिक इतिहास में है। इसलिए यह सवाल कि जौनसारी कौन है, जौनसार-बावर में रहने वाला हर व्यक्ति ST है या नहीं और कोल्टा-बाजगी की स्थिति क्या है, भावनाओं से नहीं बल्कि दस्तावेजों और संविधान से तय होना चाहिए।
1939 की पहली बड़ी जांच—समस्या क्षेत्र की थी
जौनसार-बावर के प्रशासन और सामाजिक परिस्थितियों की जांच के लिए 1939 में समिति गठित हुई और उसकी रिपोर्ट 1941 में आई। 1947 की बहिष्कृत एवं आंशिक बहिष्कृत क्षेत्र समिति ने भी इस रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए कहा कि जौनसार-बावर गंभीर उपेक्षा का शिकार था। उसने राजस्व व्यवस्था, ‘सयाना’ व्यवस्था और अधिकार-सम्बन्धी शोषण पर चिंता जताई तथा विशेष प्रशासनिक और विकासात्मक संरक्षण की आवश्यकता बताई।
महत्वपूर्ण बात यह है कि 1947 की समिति ने जौनसार-बावर के निवासियों को नस्लीय अर्थ में जनजाति मानकर ST सूची में डालने की सिफारिश नहीं की थी। इसके बजाय उसने विशेष विकास और प्रशासनिक संरक्षण का रास्ता सुझाया। इसमें क्षेत्र के विकास के लिए कम से कम दो-तिहाई पिछड़े/जनजातीय प्रतिनिधियों वाली सलाहकार समिति, क्षेत्र का अलग बजट लेखा, विशेष न्यायिक व्यवस्था, भूमि हस्तांतरण पर नियंत्रण, सयाना व्यवस्था समाप्त करने तथा केंद्र को प्रशासनिक रिपोर्ट देने जैसे सुझाव शामिल थे।
यानी शुरुआती इतिहास यह बताता है कि ‘जनजातीय क्षेत्र’ और ‘अनुसूचित जनजाति समुदाय’ दो अलग अवधारणाएं थीं।
कोल्टा जांच—शोषण की भयावह तस्वीर
इसके बाद कोल्टा समुदाय की सामाजिक-आर्थिक स्थिति की जांच के लिए उत्तर प्रदेश सरकार की समिति बनी। 1963 में राज्यसभा में उस समिति की रिपोर्ट का उल्लेख हुआ। संसदीय अभिलेख के अनुसार समिति ने दर्ज किया कि कोल्टा परिवार छोटे-छोटे कर्ज के बदले साहूकारों के यहां वर्षों तक काम करते थे, उन्हें मजदूरी के बजाय भोजन और कपड़े मिलते थे और ब्याज के नाम पर कर्ज समाप्त नहीं होता था। कई मामलों में यह व्यवस्था अगली पीढ़ी तक चली।
बाद के सरकारी एवं सामाजिक दस्तावेजों में भी कोल्टा समुदाय की भूमि-विहीनता, बेगार/बंधुआ श्रम और सामाजिक बहिष्कार का उल्लेख मिलता है। इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को जौनसारी ST प्रमाणपत्र के वर्तमान विवाद से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
1947 के बाद से 1960 का निर्णायक मोड़
1960-61 के ढेबर आयोग ने अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों की स्थिति का व्यापक अध्ययन किया। उत्तर प्रदेश के संबंध में आयोग ने जौनसारियों/जौनसार-बावर के लोगों को “हर अर्थ में जनजातीय” बताते हुए उनके मामले को विशेष रूप से कठिन मामला माना। आयोग की दृष्टि में उनका ST सूची से बाहर रहना गंभीर विसंगति थी।
आयोग ने व्यापक स्तर पर जनजातीय भूमि की सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक विकास, सहकारिता और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को मजबूत करने की जरूरत बताई।
इसके बाद लोकुर समिति ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति सूचियों की समीक्षा के लिए मानदंड और सूचीगत विसंगतियों पर विचार किया। यह भी स्पष्ट कर देना जरूरी है कि लोकुर समिति की रिपोर्ट को इस रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं होगा कि उसने अकेले जौनसारी समुदाय को ST घोषित किया। संवैधानिक सूची में अंतिम निर्णय राष्ट्रपति के आदेश से ही हुआ।
24 जून 1967—वह अधिसूचना जिसने कानूनी स्थिति बदली
पूरा विवाद समझने की सबसे महत्वपूर्ण तारीख 24 जून 1967 है। इसी दिन Constitution (Scheduled Tribes) (Uttar Pradesh) Order, 1967—C.O. 78 जारी हुआ। इसमें उत्तर प्रदेश के लिए पांच समुदाय—भोटिया, बुक्सा, जौनसारी, राजी और थारू—अनुसूचित जनजाति के रूप में सूचीबद्ध किए गए। आज भी उत्तराखंड की संवैधानिक ST सूची में जौनसारी एक पृथक ST प्रविष्टि है।
यहीं संवैधानिक प्रश्न खड़ा होता है—क्या 1967 के आदेश ने जौनसार-बावर क्षेत्र को ST बनाया था या ‘जौनसारी’ समुदाय को?
संविधान के अनुच्छेद 342 की भाषा और 1967 की अधिसूचना को पढ़ने पर उत्तर समुदाय की ओर जाता है। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने भी 2 मई 2025 के आदेश में इसी पहलू को रेखांकित करते हुए कहा कि अधिसूचना में क्षेत्र नहीं, समुदायों को ST घोषित किया गया है। अदालत ने इस दावे को स्वीकार नहीं किया कि केवल कथित ‘जनजातीय क्षेत्र’ में रहने वाला व्यक्ति स्वतः ST हो जाता है।
लेकिन 2003 का केंद्र सरकार का उत्तर नई पेचीदगी पैदा करता है
21 अप्रैल 2003 को राज्यसभा में पूछे गए प्रश्न के उत्तर में केंद्र सरकार ने कहा कि जौनसारी समुदाय को 24 जून 1967 को ST अधिसूचित किया गया था और “Jaunsari” को उस समय क्षेत्र के निवासियों को समेटने वाला territorial term माना गया था।
इसी उत्तर में कहा गया कि जौनसार-बावर क्षेत्र के कोल्टा और बाजगी समुदायों के लोग भी जौनसार के नाम से ST लाभ पाने के अधिकारी हैं, बशर्ते दावेदार या उसके माता-पिता 24 जून 1967 को जौनसार क्षेत्र के स्थायी निवासी रहे हों। उसी उत्तर में बाजगी को अनुसूचित जाति के रूप में निर्दिष्ट और कोल्टा को उस समय उत्तरांचल की SC सूची में निर्दिष्ट न होने की बात कही गई।
यही वह दस्तावेज है जिसके आधार पर क्षेत्रीय निवास की व्याख्या को ST लाभ से जोड़ने का तर्क सामने आता है।
फिर न्यायालय ने सवाल क्यों उठाया?
यदि 2003 का सरकारी उत्तर क्षेत्रीय व्याख्या करता है, तो 2025 का हाईकोर्ट आदेश विपरीत दिशा में सवाल क्यों उठाता है? यही असली संवैधानिक पेच है।
2 मई 2025 को हाईकोर्ट ने Article 342 और 1967 के आदेश को पढ़ते हुए कहा कि अधिसूचना में समुदायों को ST घोषित किया गया है, क्षेत्र को नहीं। अदालत ने राज्य सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा कि जौनसारी ST प्रमाणपत्र किस आधार पर जारी किए जा रहे हैं और क्या केवल जौनसार क्षेत्र में निवास पर्याप्त माना जा रहा है।
यह आदेश अंतिम रूप से सभी ऐतिहासिक दावों का निपटारा करने वाला निर्णय नहीं है, लेकिन इसने प्रमाणपत्र व्यवस्था के मूल प्रश्न को अदालत के सामने ला दिया है।
2026 के एक अन्य मामले में भी हाईकोर्ट ने जौनसारी ST प्रमाणपत्र रद्द किए जाने के विवाद में संबंधित व्यक्ति को राज्य स्तरीय Scrutiny Committee के समक्ष अपील का रास्ता अपनाने को कहा। इससे यह स्पष्ट है कि प्रमाणपत्र की वैधता और सत्यापन का प्रश्न आज भी प्रशासनिक-जांच की प्रक्रिया में है।
एक और महत्वपूर्ण सरकारी पहल
उत्तराखंड समाज कल्याण विभाग ने 10 मार्च 2025 को “जनजाति सूची में अनुसूचित के रूप में जौनसारी समुदाय के नाम का सत्यापन” शीर्षक से आधिकारिक सूचना प्रकाशित की। इसका अर्थ यह है कि राज्य स्तर पर जौनसारी नाम और ST सूची में उसकी संवैधानिक स्थिति के सत्यापन को स्वयं सरकार ने महत्वपूर्ण प्रशासनिक विषय माना है।
राष्ट्रीय आयोग की टिप्पणी भी नजरअंदाज नहीं की जा सकती
राष्ट्रीय धार्मिक एवं भाषाई अल्पसंख्यक आयोग की रिपोर्ट ने ST सूची में क्षेत्र के नाम को समुदाय के नाम के रूप में इस्तेमाल करने से पैदा होने वाली विसंगति पर विशेष टिप्पणी की। रिपोर्ट में जौनसारी नाम के अंतर्गत ब्राह्मण, राजपूत/खस, बाड़ी, बाजगी और कोल्टा जैसे सामाजिक समूहों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि क्षेत्रीय नाम के कारण समुदाय और क्षेत्र के बीच भ्रम पैदा हुआ। रिपोर्ट ने विशेष रूप से कोल्टा और बाजगी की सामाजिक स्थिति तथा लाभों के असमान वितरण की समस्या उठाई।
यह रिपोर्ट स्वयं 1967 के राष्ट्रपति आदेश को बदलने वाली अधिसूचना नहीं है, लेकिन वर्तमान विवाद की सामाजिक पृष्ठभूमि समझने वाला महत्वपूर्ण दस्तावेज जरूर है।
समाधान जाति की राजनीति नहीं, प्रमाण की पारदर्शिता है
पूरे इतिहास को सामने रखने पर चार बातें निर्विवाद दिखाई देती हैं—
- पहली, 1939, 1947 और बाद की समितियों ने जौनसार-बावर की सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक विषमता को गंभीर माना, लेकिन उन समितियों ने स्वयं संवैधानिक ST दर्जा प्रदान नहीं किया।
- दूसरी, ढेबर आयोग ने जौनसारियों को जनजातीय विशेषताओं वाला कठिन मामला माना और उनके संरक्षण की जरूरत रेखांकित की।
- तीसरी, संवैधानिक निर्णायक कदम 24 जून 1967 के राष्ट्रपति आदेश से हुआ, जिसमें “Jaunsari” समुदाय ST सूची में आया।
- चौथी, 2003 का केंद्र सरकार का संसदीय उत्तर कोल्टा और बाजगी के लिए 1967 की स्थायी निवासी वाली विशेष व्याख्या देता है, जबकि 2025 का हाईकोर्ट आदेश यह मूल प्रश्न उठाता है कि ST क्षेत्र और ST समुदाय को एक नहीं माना जा सकता।
इसलिए आज सबसे जरूरी काम किसी समुदाय को सामूहिक रूप से पात्र या अपात्र घोषित करना नहीं, बल्कि 1967 के राष्ट्रपति आदेश, 2003 के सरकारी उत्तर, ऐतिहासिक रिकॉर्ड, वर्तमान प्रमाणपत्र नियम और न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप एक स्पष्ट, सार्वजनिक और समान सत्यापन प्रणाली बनाना है।
जिस व्यक्ति का संवैधानिक अधिकार है, उसे प्रमाणपत्र से वंचित करना भी अन्याय है; और केवल भौगोलिक निवास या सामाजिक प्रभाव के आधार पर अपात्र व्यक्ति को ST लाभ देना भी संविधान की समानता और आरक्षण व्यवस्था के साथ न्याय नहीं होगा।
जौनसारी ST का सवाल इसलिए किसी जाति के पक्ष या विपक्ष का सवाल नहीं होना चाहिए। यह संविधान के अनुच्छेद 342 की कसौटी पर यह तय करने का सवाल है कि—अधिसूचित समुदाय कौन है, ऐतिहासिक रूप से किसकी पहचान प्रमाणित है और प्रमाणपत्र किस वैधानिक आधार पर जारी होना चाहिए।
अधिकार इतिहास से सिद्ध हों, प्रमाण दस्तावेज से और लाभ संविधान के अनुसार—यही जौनसारी जनजाति प्रमाणपत्र विवाद का न्यायपूर्ण समाधान है।






