- यमुना घाटी में सड़क-पुल परियोजनाओं पर करोड़ों का काम, सूचना मांगने पर जिम्मेदारों की टालमटोल; उच्चाधिकारी से संपर्क के बाद मिली आधी-अधूरी जानकारी
पुरोला, उत्तरकाशी।1 4 सितंबर 2026। नीरज उत्तराखंडी
यमुना घाटी के मोरी, पुरोला और नौगांव विकासखंडों में सड़क एवं पुलों के निर्माण के लिए ब्रिडकुल की ओर से 14 निर्माण कार्य कराए जा रहे हैं। इनमें आठ कार्य पूरे हो चुके हैं, जबकि छह परियोजनाएं वर्तमान में निर्माणाधीन हैं।
दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों की कनेक्टिविटी के लिहाज से करोड़ों रुपये की इन परियोजनाओं को महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन इन कार्यों की स्वीकृत लागत, अब तक हुए भुगतान और व्यय की विस्तृत जानकारी सार्वजनिक करने में जिम्मेदार अधिकारी-कर्मचारी जिस तरह टालमटोल कर रहे हैं, उससे पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार निर्माणाधीन प्रमुख कार्यों में डाबरकोट-कुठार मोटर मार्ग के स्टेज-1 और स्टेज-2, राणा-बनास से दुर्बिल मोटर मार्ग के किमी एक पर 36 मीटर स्पान पुल, सौर-ओसला मोटर मार्ग के किमी 22 पर 30 मीटर स्पान के दो पुल तथा जखोल-लिवाड़ी मोटर मार्ग के किमी 15 पर 42 मीटर स्पान पुल शामिल हैं।
तीन पुलों की लागत ही 6.20 करोड़ रुपये से अधिक
उपलब्ध लागत विवरण के मुताबिक, राणा-बनास-दुर्बिल मार्ग पर 36 मीटर स्पान पुल की लागत 137 लाख रुपये, जबकि सौर-ओसला मार्ग पर दो 30 मीटर स्पान पुलों की लागत क्रमशः 257.02 लाख और 226.22 लाख रुपये है। तीनों पुलों की लागत जोड़ने पर यह राशि 620.24 लाख यानी करीब 6.20 करोड़ रुपये बैठती है।
इसके अलावा डाबरकोट-कुठार मार्ग और जखोल-लिवाड़ी मार्ग पर प्रस्तावित/निर्माणाधीन कार्यों की लागत तथा अब तक किए गए भुगतान की विस्तृत जानकारी सामने नहीं आ पाई है।
लागत और भुगतान पूछने पर क्यों बच रहे जिम्मेदार?
सबसे गंभीर सवाल निर्माण कार्यों की लागत और भुगतान से जुड़ी जानकारी को लेकर उठ रहे हैं। संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों से कई बार कार्यवार स्वीकृत लागत, संशोधित लागत, कार्यदायी संस्था, अब तक किए गए भुगतान, शेष भुगतान और कार्य की वर्तमान प्रगति की जानकारी साझा करने का आग्रह किया गया, लेकिन शुरुआत में स्पष्ट और पूर्ण जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई।
मामला तब आगे बढ़ा जब उच्च अधिकारी से व्हाट्सऐप के माध्यम से जानकारी मांगी गई। इसके बाद संबंधित साइट इंचार्ज की ओर से फोन आया और कुछ जानकारी उपलब्ध कराई गई, लेकिन वह भी आधी-अधूरी बताई गई।
सूचना मांगने पर कभी यह कहा गया कि संबंधित अधिकारी का तबादला हो चुका है और उनके पास अब जानकारी नहीं है। कभी देहरादून कार्यालय से जानकारी लेने की बात कही गई। सवाल यह है कि जब करोड़ों रुपये के निर्माण कार्य मौके पर चल रहे हैं तो साइट स्तर पर उनकी लागत, प्रगति और भुगतान का रिकॉर्ड किसके पास है?
मुख्य अभियंता से संपर्क के बाद सक्रिय हुआ अमला
सूचना उपलब्ध कराने में लगातार टालमटोल के बाद मुख्य अभियंता स्तर पर व्हाट्सऐप के माध्यम से जानकारी मांगी गई। इसके बाद साइट इंचार्ज का फोन आना और कुछ विवरण उपलब्ध कराना यह सवाल भी खड़ा करता है कि यदि जानकारी उपलब्ध थी तो उसे पहले ही पूर्ण रूप से क्यों नहीं दिया गया?
सरकारी निर्माण कार्यों में पारदर्शिता केवल कागजों तक सीमित रहने का विषय नहीं है। जनता के पैसे से बन रही सड़क और पुल की लागत, भुगतान और निर्माण की स्थिति के बारे में जानकारी मांगना सार्वजनिक हित का सवाल है। ऐसे में सूचना मांगने वाले को एक अधिकारी से दूसरे कार्यालय की ओर भेजना और फिर उच्चाधिकारी के हस्तक्षेप के बाद आधी-अधूरी जानकारी देना व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है।
सड़क-पुल जीवनरेखा, लेकिन गुणवत्ता और भुगतान भी जरूरी
यमुना घाटी के विषम भौगोलिक क्षेत्रों में सड़क और पुल महज निर्माण कार्य नहीं, बल्कि ग्रामीणों के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, रोजगार और बाजार तक पहुंच की जीवनरेखा हैं। बरसात में नदी-नालों के उफान के बीच स्थायी पुलों का निर्माण ग्रामीणों को सालभर सुरक्षित आवागमन उपलब्ध करा सकता है।
लेकिन विकास के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हों तो काम की गुणवत्ता के साथ लागत और भुगतान में पारदर्शिता भी उतनी ही जरूरी है। आठ कार्य पूरे हो चुके हैं और छह प्रगति पर बताए जा रहे हैं। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि प्रत्येक कार्य की स्वीकृत लागत कितनी है, अब तक कितना भुगतान हुआ, कार्य की भौतिक प्रगति कितनी है और निर्धारित समयसीमा क्या है।
सवाल सिर्फ सड़क और पुल बनने का नहीं, बल्कि जनता के पैसे से बन रहे इन निर्माण कार्यों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित होने का भी है। जिम्मेदार विभाग को चाहिए कि सभी 14 कार्यों की कार्यवार लागत, भुगतान और वर्तमान स्थिति का पूरा विवरण सार्वजनिक करे, ताकि विकास कार्यों को लेकर उठ रहे सवालों पर विराम लग सके।


