- देशभर में 3.85 लाख अपीलें लंबित; उत्तराखंड में 20 साल में 13.46 लाख RTI आवेदन, आयोग तक पहुंचे 59,750 मामले
देहरादून। रिपोर्ट—नीरज उत्तराखंडी
सूचना का अधिकार अधिनियम को लागू हुए 21 वर्ष पूरे हो चुके हैं। इस कानून ने आम नागरिक को सरकारी कामकाज, योजनाओं, खर्च और निर्णयों का हिसाब मांगने का अधिकार दिया, लेकिन अब सवाल यह है कि क्या सूचना का अधिकार आज भी उतना ही प्रभावी है, जितना इसे लागू करते समय माना गया था?
ताजा राष्ट्रीय आकलन इस सवाल को गंभीर बनाता है। 30 जून 2026 तक देश के 28 सूचना आयोगों में 3.85 लाख अपीलें और शिकायतें लंबित थीं। इनमें कई आयोगों में किसी मामले के निस्तारण के लिए एक वर्ष या उससे अधिक प्रतीक्षा का अनुमान सामने आया है।
एक तरफ 30 दिन की समय-सीमा, दूसरी तरफ वर्षों की पेंडेंसी
RTI कानून की मूल व्यवस्था नागरिक को समयबद्ध सूचना दिलाने की है। सूचना न मिलने पर प्रथम अपील और उसके बाद सूचना आयोग में द्वितीय अपील का प्रावधान है।
लेकिन जब अंतिम अपील ही लंबे समय तक लंबित रहे तो सवाल उठता है कि समयबद्ध सूचना के अधिकार का वास्तविक लाभ नागरिक को कब मिलेगा?
सतर्क नागरिक संगठन के 2025 के आकलन में 30 जून 2025 तक 29 सूचना आयोगों में 4,13,972 अपीलें और शिकायतें लंबित पाई गई थीं। उत्तराखंड में उस समय 1,688 मामले लंबित बताए गए थे।
2026 के आकलन में 28 आयोगों की कुल लंबित संख्या 3.85 लाख बताई गई। यानी संख्या में कमी दिखाई देती है, लेकिन इसे सीधे सुधार नहीं माना जा सकता, क्योंकि दोनों वर्षों में आयोगों की संख्या और आंकड़ा उपलब्ध कराने की स्थिति अलग रही है।
उत्तराखंड में 20 साल में 13.46 लाख आवेदन
उत्तराखंड सूचना आयोग के अनुसार, स्थापना से सितंबर 2025 तक प्रदेश के लोक सूचना अधिकारियों के पास 13,46,817 RTI आवेदन पहुंचे। प्रथम अपीलीय अधिकारियों के पास 1,35,430 मामले पहुंचे, जबकि आयोग स्तर पर 59,750 मामले दर्ज हुए। इनमें से 58,719 का निस्तारण और 1,031 मामले लंबित बताए गए।
यह आंकड़ा बताता है कि प्रदेश में RTI का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर हुआ है और आयोग ने भी अधिकांश दर्ज मामलों का निस्तारण किया है।
लेकिन आंकड़े का दूसरा पहलू ज्यादा महत्वपूर्ण है।
20 वर्षों में 13.46 लाख RTI आवेदनों के बावजूद आयोग तक केवल 59,750 मामले पहुंचना यह भी दिखाता है कि अधिकांश मामलों का निपटारा विभागीय स्तर या प्रथम अपील के स्तर पर ही हो जाता है—जबकि जिन मामलों में नागरिक को वहां राहत नहीं मिलती, वे आयोग तक पहुंचते हैं।
पहाड़ के जिलों में RTI इतनी कम क्यों?
उत्तराखंड का जिला-वार आंकड़ा भी जांच की मांग करता है।
द्वितीय अपीलों में देहरादून की हिस्सेदारी 32 प्रतिशत और हरिद्वार की 25 प्रतिशत है। इसके विपरीत चंपावत, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग और बागेश्वर से आने वाले मामलों की हिस्सेदारी एक प्रतिशत से भी कम बताई गई है।
कम अपील को बेहतर प्रशासन का प्रमाण मान लेना गलत होगा।
खुद राजभवन की ओर से जारी विवरण में कम अपील वाले जिलों में RTI के व्यापक प्रचार-प्रसार और जागरूकता अभियान की जरूरत पर जोर दिया गया है।
यानी पहाड़ में सवाल यह भी है कि क्या नागरिक को अधिकार तो मिला, लेकिन उस अधिकार तक पहुंचने का रास्ता अभी भी कठिन है?
आयोग की वेबसाइट पर पुराने मामलों के लिए अलग सूचना
उत्तराखंड सूचना आयोग की वर्तमान वेबसाइट पर 6 नवंबर 2024 से पहले प्रथम सुनवाई की तारीख वाले पुराने द्वितीय अपीलों और शिकायतों की जानकारी के लिए अलग लिंक दिया गया है। वेबसाइट पर दैनिक वाद सूची, निर्णय, ऑनलाइन द्वितीय अपील, शिकायत और मामलों की स्थिति देखने की सुविधा भी उपलब्ध है।
यह डिजिटल पारदर्शिता सकारात्मक कदम है, लेकिन इससे एक अहम सवाल खत्म नहीं होता—
6 नवंबर 2024 से पहले की सुनवाई वाले कितने मामले लंबित थे और उनमें से कितनों का निस्तारण कितने समय बाद हुआ?
यही वह आंकड़ा है जो RTI व्यवस्था की वास्तविक गति बताएगा।
सिर्फ लंबित मामले ही समस्या नहीं
राष्ट्रीय स्तर पर 2025-26 के आकलन में जुलाई 2025 से जून 2026 के बीच नौ सूचना आयोगों ने 37,701 अपीलें और शिकायतें बिना आदेश पारित किए वापस कीं। केंद्रीय सूचना आयोग में ऐसे मामलों की संख्या 14,603 बताई गई। रिपोर्ट में तकनीकी कमियों के कारण मामलों को वापस किए जाने पर चिंता जताई गई है।
यह सवाल इसलिए गंभीर है क्योंकि RTI का इस्तेमाल अक्सर ऐसे नागरिक करते हैं जिनके पास न कानूनी विशेषज्ञता होती है और न पेशेवर सहायता।
यदि सूचना पाने की प्रक्रिया में तकनीकी औपचारिकताएं ही बड़ी बाधा बन जाएं तो अधिकार कागज पर मजबूत और व्यवहार में कमजोर हो सकता है।
उत्तराखंड की एक और तस्वीर—दंड और पारदर्शिता
2024 के उपलब्ध स्वतंत्र आकलन में उत्तराखंड सूचना आयोग के लिए जून 2024 तक 951 मामले लंबित बताए गए थे। जुलाई 2023 से जून 2024 के बीच 4,511 मामले पंजीकृत और 4,646 निस्तारित बताए गए। अप्रैल 2023 से मई 2024 के बीच आयोग द्वारा ₹16.98 लाख से अधिक दंड लगाए जाने और निस्तारित मामलों में करीब चार प्रतिशत मामलों में दंड लगाए जाने का उल्लेख है।
उसी आकलन में आयोग के आदेश वेबसाइट पर उपलब्ध होने की बात कही गई, लेकिन सुनवाई आम जनता के लिए खुली नहीं होने और लाइव स्ट्रीमिंग नहीं होने का भी उल्लेख है।
सरकार का पक्ष भी सामने रखना जरूरी
केंद्र सरकार का मार्च 2026 का संसदीय जवाब बताता है कि केंद्रीय स्तर पर RTI आवेदनों की अस्वीकृति दर 2013-14 के 7.21 प्रतिशत से घटकर 2024-25 में 3.26 प्रतिशत हुई है। सरकार ने पारदर्शिता ऑडिट और स्वप्रेरित प्रकटीकरण की निगरानी के लिए भी व्यवस्था होने की जानकारी दी है।
इसलिए यह कहना कि RTI व्यवस्था पूरी तरह निष्प्रभावी हो चुकी है, उपलब्ध आंकड़ों से साबित नहीं होता।
असल चिंता दूसरी है—जहां नागरिक को सूचना नहीं मिलती, वहां अंतिम राहत कितनी जल्दी मिलती है?
RTI को कानून नहीं, देरी कमजोर कर रही है
पड़ताल से तस्वीर साफ है।
RTI कानून अभी भी नागरिक को शक्तिशाली अधिकार देता है। उत्तराखंड में लाखों आवेदन पहुंच रहे हैं, आयोग हजारों मामलों का निस्तारण कर रहा है और ऑनलाइन व्यवस्था भी विकसित हुई है।
लेकिन दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्तर पर लाखों लंबित अपीलें, वर्षों तक चलने वाली प्रतीक्षा, तकनीकी आधार पर लौटाए जाने वाले मामले और आयोगों में रिक्तियों का सवाल इस व्यवस्था की प्रभावशीलता पर गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं।
सूचना का अधिकार तभी प्रभावी है, जब सूचना समय पर मिले।
क्योंकि भ्रष्टाचार की फाइल पांच साल बाद खुले तो आरोपी बदल सकता है, योजना पूरी हो सकती है, सड़क दोबारा बन सकती है और सार्वजनिक धन के नुकसान का हिसाब मांगने का मूल सवाल ही कमजोर पड़ सकता है।
इसलिए अब बहस केवल यह नहीं होनी चाहिए कि RTI कानून मजबूत है या कमजोर।
असल सवाल यह है—
“नागरिक ने सूचना मांगी—तो उसे जवाब कितने दिन में मिला?”
यही एक आंकड़ा RTI की वास्तविक धार का सबसे बड़ा पैमाना होना चाहिए।






