- उत्तराखंड में 2022 में 4,337, 2023 में 3,808 और 2024 में 3,342 महिला अपराध दर्ज; 2024 में 530 महिलाओं के अपहरण और 56 हत्याओं के मामले
देहरादून। 17 अक्तूबर,नीरज उत्तराखंडी
अंकिता भंडारी हत्याकांड में तीनों दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के बाद एक अध्याय भले ही न्यायिक रूप से आगे बढ़ गया हो, लेकिन अंकिता की हत्या ने जो मूल सवाल खड़ा किया था, वह आज भी कायम है—उत्तराखंड की बेटियां आखिर कितनी सुरक्षित हैं?
15 अक्टूबर 2026 को पुलिस मुख्यालय में दी गई जानकारी के अनुसार अंकिता मामले में तीनों आरोपियों को उम्रकैद की सजा हुई। पुलिस के मुताबिक घटना सामने आने के 24 घंटे के भीतर तीनों आरोपियों की गिरफ्तारी, करीब 88 दिन में जांच पूरी और लगभग 500 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की गई थी।
लेकिन अंकिता का मामला केवल एक हत्या की कहानी नहीं है। यह उस व्यवस्था की परीक्षा भी है जिसमें एक युवती अपने कार्यस्थल पर सुरक्षित नहीं रह सकी।
तीन साल के आंकड़े—गिरावट राहत देती है, लेकिन सवाल खत्म नहीं करती
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक उत्तराखंड में महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराधों की संख्या 2022 में 4,337, 2023 में 3,808 और 2024 में घटकर 3,342 रही।
यानी दो वर्षों में पंजीकृत मामलों में कमी आई है। 2024 में 2023 की तुलना में लगभग 12 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई। इसे कानून-व्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत माना जा सकता है। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है—एक साल में 3,342 मामले यानी औसतन प्रतिदिन नौ से अधिक मामले।और यह केवल वे मामले हैं जो पुलिस तक पहुंचे और दर्ज हुए।
इसलिए आंकड़ों में कमी को महिलाओं की सुरक्षा की अंतिम प्रमाण-पत्र मान लेना जल्दबाजी होगी।
530 अपहरण, 56 हत्याएं—बेटियों की सुरक्षा का असली सवाल
NCRB 2024 के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में महिलाओं से संबंधित 530 अपहरण के मामले दर्ज हुए। इनमें 94 प्रतिशत मामलों के अनावरण की जानकारी पुलिस ने दी है।
महिलाओं की हत्या के 56 मामले दर्ज हुए। दहेज हत्या के मामलों में भी 2024 में पिछले वर्ष की तुलना में 20 प्रतिशत कमी बताई गई है।
लेकिन हर आंकड़े के पीछे एक परिवार है।
हर अपहरण के पीछे किसी बेटी, बहन, पत्नी या मां की चिंता है।
हर हत्या के पीछे एक ऐसा परिवार है जिसकी दुनिया उजड़ जाती है।
यही कारण है कि अपराध के आंकड़ों को केवल प्रतिशत की भाषा में देखना पर्याप्त नहीं है।
2023 में 729 बालिकाएं हुईं लापता
बेटियों की सुरक्षा का सवाल और गंभीर तब हो जाता है जब बच्चों की गुमशुदगी के आंकड़े सामने आते हैं।
NCRB के 2023 के आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड में 1,025 बच्चे लापता हुए, जिनमें 729 बालिकाएं थीं। वर्ष के अंत तक 654 बालिकाओं सहित 933 बच्चों को बरामद किया गया था। पुलिस के अनुसार बाद की अवधि में शेष बच्चों में से भी कई को बरामद किया गया।
यहां सवाल सिर्फ बरामदगी का नहीं है।
जो बच्चियां लापता होती हैं, वे कहां जाती हैं? उनके साथ क्या होता है? वे किन परिस्थितियों में घर छोड़ती हैं या उन्हें कौन ले जाता है? क्या हर मामले में तस्करी, शोषण, यौन अपराध और अन्य जोखिमों के कोण से पर्याप्त जांच होती है?
इन सवालों का जवाब आंकड़ों से आगे जाकर खोजे जाने की जरूरत है।
देहरादून का आंकड़ा भी चेतावनी देता है
2022 के NCRB आंकड़ों के अनुसार अकेले देहरादून में 1,205 मामले दर्ज हुए थे, जो उस वर्ष प्रदेश के कुल 4,337 महिला अपराध मामलों का लगभग 27 प्रतिशत थे। इसी अवधि में जिले में 184 दुष्कर्म के मामले, आठ दहेज हत्याएं और 13 आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले दर्ज हुए थे।
राजधानी में इतनी बड़ी संख्या अपने आप में सवाल है।
यदि राज्य की राजधानी में ही महिलाएं और बेटियां पूरी तरह सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रही हैं तो दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्रों, छोटे कस्बों और ग्रामीण इलाकों में स्थिति की स्वतंत्र समीक्षा क्यों नहीं होनी चाहिए?
अंकिता ने केवल अपराधी नहीं, व्यवस्था से भी सवाल पूछा
अंकिता भंडारी एक रिसॉर्ट में काम कर रही थी। उसकी हत्या ने उत्तराखंड के पर्यटन उद्योग में काम करने वाली युवतियों की सुरक्षा, कार्यस्थल की जवाबदेही और प्रभावशाली लोगों के सामने संस्थागत व्यवस्था की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े किए।
इस मामले में न्यायालय ने तीनों दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है।
यह फैसला महत्वपूर्ण है।
लेकिन असली परीक्षा यह है कि क्या अंकिता के बाद कार्यस्थलों पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए व्यवस्था वास्तव में बदली?
क्या हर होटल, रिसॉर्ट, होम-स्टे और निजी संस्थान में महिला कर्मचारियों के लिए प्रभावी शिकायत तंत्र है?
क्या आंतरिक शिकायत समितियां केवल कागजों पर हैं या वास्तव में सक्रिय हैं?
क्या रात की शिफ्ट में काम करने वाली युवतियों के लिए सुरक्षित परिवहन और आपातकालीन सहायता उपलब्ध है?
क्या किसी प्रभावशाली व्यक्ति के खिलाफ शिकायत आने पर संस्थान पीड़िता के साथ खड़ा होता है?
ये वे सवाल हैं जिनका जवाब केवल अदालत नहीं, सरकार और समाज को भी देना होगा।
महिला अपराध घटे हैं, लेकिन भय क्यों नहीं घटा?
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्यपरक अंतर समझना होगा। FIR की संख्या अपराध की पूरी तस्वीर नहीं होती।
सामाजिक बदनामी, परिवार का दबाव, आर्थिक निर्भरता, पुलिस तक पहुंच की कठिनाई, आरोपी का प्रभाव और न्यायिक प्रक्रिया की लंबाई—ये सभी कारक किसी महिला को शिकायत दर्ज कराने से रोक सकते हैं।
इसलिए अपराध के आंकड़ों में कमी को दो दृष्टियों से देखना चाहिए—
एक तरफ यह पुलिस कार्रवाई और अपराध नियंत्रण में सुधार का संकेत हो सकता है;
दूसरी तरफ यह भी देखना जरूरी है कि क्या कहीं रिपोर्टिंग कम होने के कारण भी संख्या घट रही है।
यही कारण है कि महिला सुरक्षा का मूल्यांकन केवल FIR की संख्या से नहीं, बल्कि शिकायत दर्ज होने की सुविधा, जांच की गुणवत्ता, आरोपपत्र की गति, दोषसिद्धि, पीड़ित सहायता और पुनर्वास जैसे संकेतकों से होना चाहिए।
सवाल सत्ता से भी, समाज से भी
अंकिता की हत्या के बाद राजनीतिक दलों ने न्याय की मांग की। आंदोलन हुए। मोमबत्तियां जलीं। बयान दिए गए।
लेकिन अब समय यह पूछने का है—
क्या हर बेटी की सुरक्षा चुनावी मुद्दा बनने से पहले शासन का स्थायी एजेंडा बनेगी?
क्या महिला अपराधों की जिला-वार स्वतंत्र समीक्षा सार्वजनिक होगी?
क्या लापता बालिकाओं के मामलों की निगरानी के लिए अलग तंत्र मजबूत किया जाएगा?
क्या कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के मामलों में जवाबदेही तय होगी?
क्या प्रभावशाली आरोपियों से जुड़े मामलों में जांच की स्वतंत्रता सुनिश्चित होगी?
क्या पीड़ित परिवार को मुकदमे के अंत तक कानूनी और आर्थिक सहायता मिलेगी?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या किसी बेटी को न्याय मांगने के लिए पहले अपनी जान गंवानी पड़ेगी?
अंकिता के मामले में अदालत ने दोषियों को उम्रकैद दी है। यह न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण परिणाम है। लेकिन अंकिता की कहानी का सबसे बड़ा सबक सजा नहीं, रोकथाम होना चाहिए।
क्योंकि न्याय का सबसे बेहतर रूप वह है जिसमें अपराध होने के बाद आरोपी को सजा देने की जरूरत ही न पड़े।
अंकिता को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी जब उत्तराखंड की किसी दूसरी बेटी को अपने माता-पिता से यह न कहना पड़े—‘डर लग रहा है, लेकिन नौकरी तो करनी ही है।’
आंकड़े कम होना अच्छी खबर है।
लेकिन लक्ष्य केवल आंकड़े कम करना नहीं होना चाहिए।
लक्ष्य होना चाहिए—ऐसा उत्तराखंड जहां बेटी घर से निकले तो परिवार को उसकी सुरक्षा की चिंता न हो, बल्कि उसके सपनों की चिंता हो।
अंकिता की हत्या का मुकदमा अदालत में आगे बढ़ गया है; अब असली मुकदमा व्यवस्था के सामने है—क्या वह अगली अंकिता को बचा पाएगी?






