बदहाली : 13 साल से सड़क अधूरी, 6 साल से पुल गायब; डंडी-कंडी पर बीमार

मोरी/उत्तरकाशी। 18 सितंबर। नीरज उत्तराखंडी  सीमांत विकासखंड मोरी के दूरस्थ लिवाड़ी गांव में सड़क सुविधा की बदहाली एक बार फिर सामने आई है। 21 वर्षीय नवीन की तबीयत बिगड़ने पर ग्रामीणों को उसे डंडी-कंडी के सहारे करीब 12 किलोमीटर पैदल चलकर जखोल तक पहुंचाना पड़ा। यहां पहुंचने के बाद ही उसे सड़क मार्ग से आगे […]

मोरी/उत्तरकाशी। 18 सितंबर। नीरज उत्तराखंडी 

सीमांत विकासखंड मोरी के दूरस्थ लिवाड़ी गांव में सड़क सुविधा की बदहाली एक बार फिर सामने आई है। 21 वर्षीय नवीन की तबीयत बिगड़ने पर ग्रामीणों को उसे डंडी-कंडी के सहारे करीब 12 किलोमीटर पैदल चलकर जखोल तक पहुंचाना पड़ा। यहां पहुंचने के बाद ही उसे सड़क मार्ग से आगे ले जाया जा सका।

ग्रामीणों के मुताबिक जिस पैदल रास्ते से बीमार युवक को लाया गया, उसकी हालत भी खराब है। रास्ता कई स्थानों पर क्षतिग्रस्त है और झाड़ियों व घास से पटा होने के कारण आवाजाही में दिक्कत होती है। आपात स्थिति में यही रास्ता ग्रामीणों के लिए जीवन और मौत के बीच का सहारा बन जाता है।

2013 में स्वीकृत सड़क, 13 साल बाद भी अधूरी

ग्रामीणों का कहना है कि लिवाड़ी गांव को सड़क से जोड़ने की स्वीकृति वर्ष 2013 में हुई थी, लेकिन करीब 13 वर्ष बीत जाने के बाद भी सड़क निर्माण पूरा नहीं हो पाया है। बताया गया कि सड़क का करीब तीन से चार किलोमीटर हिस्सा अभी भी बाकी है।

ग्रामीणों का आरोप है कि सड़क निर्माण की धीमी गति के कारण आज भी गांव के लोगों को सामान्य आवागमन के लिए पैदल रास्तों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। खासकर बीमार, बुजुर्ग, गर्भवती महिलाओं और बच्चों के लिए यह स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण बन जाती है।

छह साल से लंबित पुल, लकड़ी के फट्टों से गदेरा पार करने की मजबूरी

लिवाड़ी की समस्या केवल सड़क तक सीमित नहीं है। ग्रामीणों के अनुसार रालासों से लिवाड़ी की ओर बनने वाला पुल करीब छह वर्षों से लंबित है। पुल नहीं होने के कारण ग्रामीण लकड़ी के फट्टों के सहारे गदेरा पार करने को मजबूर हैं।

बरसात के दौरान गदेरे में पानी का बहाव बढ़ने पर स्थिति और खतरनाक हो जाती है। ऐसे में ग्रामीणों के सामने सुरक्षित आवागमन का कोई स्थायी विकल्प नहीं है।

निरीक्षण और आंदोलनों के बावजूद नहीं बदली तस्वीर

ग्रामीण दिनेश सिंह, मुलायम रावत, जगमोहन रावत और गुरुदेव रावत ने बताया कि जिलाधिकारी तथा प्रभारी मंत्री सौरभ बहुगुणा कुछ समय पहले क्षेत्र का निरीक्षण कर चुके हैं। सड़क और पुल की मांग को लेकर ग्रामीण कई बार धरना-प्रदर्शन भी कर चुके हैं।

ग्रामीणों के अनुसार पिछली बार समस्या के समाधान की मांग को लेकर चुनाव बहिष्कार तक किया गया, लेकिन इसके बावजूद सड़क और पुल का काम अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पाया।

ग्रामीणों का कहना है कि पिछली बार लोक निर्माण विभाग की ओर से यहां ट्रॉली लगाई गई थी, लेकिन इस बार ट्रॉली की सुविधा भी उपलब्ध नहीं है। ऐसे में किसी व्यक्ति की तबीयत बिगड़ने या अन्य आपात स्थिति में डंडी-कंडी और पैदल रास्ते ही एकमात्र विकल्प रह जाते हैं।

सवालों के घेरे में व्यवस्था

लिवाड़ी की तस्वीर ग्रामीण सड़क और पुल निर्माण की योजनाओं की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े करती है। 2013 में स्वीकृत सड़क का 13 साल बाद भी अधूरा रहना और छह साल से पुल का लंबित होना यह सवाल उठाता है कि स्वीकृति से लेकर निर्माण और निगरानी तक की प्रक्रिया आखिर इतनी लंबी क्यों खिंच रही है।

ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन से सड़क के शेष हिस्से का निर्माण शीघ्र पूरा कराने, लंबित पुल का निर्माण शुरू कराने तथा तब तक आपातकालीन आवाजाही के लिए वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध कराने की मांग की है।

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