पुरोला, 19 जुलाई 2026।नीरज उत्तराखंडी
रवांई घाटी की स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर गंभीर संकट के दौर में पहुंचती दिखाई दे रही है। उपजिला चिकित्सालय पुरोला से दो अनुभवी चिकित्सकों डॉ. मनोज असवाल और डॉ. कपिल तोमर के एक साथ तबादले से क्षेत्र में भारी नाराजगी और चिंता का माहौल है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले से चिकित्सकों की कमी से जूझ रहे अस्पताल से दो वरिष्ठ डॉक्टरों के चले जाने पर मरीजों को समय पर उपचार मिलना मुश्किल हो जाएगा।
उपजिला चिकित्सालय पुरोला केवल नगर क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि मोरी, नौगांव, त्यूणी, आराकोट, बंगाण तथा आसपास के दुर्गम गांवों के हजारों लोगों के लिए प्रमुख सरकारी स्वास्थ्य केंद्र है। सड़क दुर्घटनाओं, प्रसव, गंभीर बीमारियों और आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं के लिए यही अस्पताल सबसे बड़ा सहारा माना जाता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि दोनों चिकित्सकों को कार्यमुक्त कर दिया जाता है तो अस्पताल की चिकित्सा व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित होगी। गंभीर मरीजों, दुर्घटना पीड़ितों और प्रसूता महिलाओं को उपचार के लिए विकासनगर, देहरादून अथवा अन्य बड़े अस्पतालों का रुख करना पड़ेगा। इससे उपचार में देरी होने के साथ-साथ गरीब और ग्रामीण परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ भी पड़ेगा।
तबादला निरस्त करने की मांग तेज
क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों तथा विभिन्न जनप्रतिनिधियों ने स्वास्थ्य मंत्री और स्वास्थ्य विभाग से दोनों चिकित्सकों का तबादला निरस्त करने की मांग की थी। हालांकि विभाग ने दोनों डॉक्टरों को नई तैनाती स्थल पर कार्यभार ग्रहण करने के निर्देश जारी कर दिए हैं।
इस निर्णय के बाद लोगों में रोष और बढ़ गया है। क्षेत्रवासियों का कहना है कि यदि तबादला निरस्त नहीं किया जा सकता तो कम से कम उनके स्थान पर तत्काल अनुभवी चिकित्सकों की नियुक्ति की जाए ताकि स्वास्थ्य सेवाएं बाधित न हों।
कांग्रेस ब्लॉक अध्यक्ष धीरेंद्र नेगी ने कहा कि प्रदेश सरकार एक ओर पर्वतीय क्षेत्रों में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के दावे करती है, जबकि दूसरी ओर जनभावनाओं की अनदेखी कर अनुभवी चिकित्सकों का स्थानांतरण कर रही है। उन्होंने कहा कि यह निर्णय दूरस्थ क्षेत्रों की जनता के साथ अन्याय है।
28 वर्ष बाद भी लिवाड़ी स्वास्थ्य केंद्र डॉक्टर और दवाओं से वंचित
रवांई घाटी के सीमांत गांव लिवाड़ी का एलोपैथिक स्वास्थ्य केंद्र आज भी बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में दम तोड़ता नजर आ रहा है। वर्ष 1998 में स्थापित इस स्वास्थ्य केंद्र में आज तक नियमित डॉक्टर, फार्मासिस्ट और पर्याप्त दवाओं की व्यवस्था नहीं हो सकी है।
ग्रामीणों के अनुसार अस्पताल में सामान्य बुखार, जुकाम और दर्द की दवाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में मामूली बीमारी से लेकर प्रसव और गंभीर मरीजों को उपचार के लिए 62 किलोमीटर दूर मोरी अथवा 98 किलोमीटर दूर पुरोला जाना पड़ता है।
ग्रामीणों ने बताया कि वर्ष 1993 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार में पर्वतीय विकास मंत्री रहे स्व. बरफिया लाल जुवांठा की पहल पर लिवाड़ी में एलोपैथिक स्वास्थ्य केंद्र स्वीकृत हुआ था और वर्ष 1998 में इसकी स्थापना की गई। उस समय गांव तक सड़क नहीं थी और मरीजों को 18 किलोमीटर तक डंडी-कंडी के सहारे जखोल मोटर मार्ग तक पहुंचाया जाता था।
ग्रामीण मनोज रावत और गुरुदेव रावत का कहना है कि अस्पताल में प्राथमिक उपचार तक की समुचित व्यवस्था नहीं है। सीमांत क्षेत्र के लोग वर्षों से डॉक्टर, फार्मासिस्ट और दवाओं की मांग कर रहे हैं, लेकिन शासन और स्वास्थ्य विभाग ने अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया।
डॉक्टर ने छोड़ी नौकरी, केवल एएनएम के भरोसे केंद्र
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मोरी के प्रभारी डॉ. नितेश रावत ने बताया कि लिवाड़ी स्वास्थ्य केंद्र में नियुक्त चिकित्सक नौकरी छोड़ चुके हैं। वर्तमान में केंद्र में केवल एएनएम तैनात है।
उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य केंद्र के लिए भूमि उपलब्ध है तथा स्थायी भवन निर्माण का प्रस्ताव दो वर्ष पूर्व शासन को भेजा जा चुका है। प्रस्ताव स्वीकृत होते ही भवन निर्माण कार्य शुरू कराया जाएगा।
स्वास्थ्य सेवाओं पर उठ रहे बड़े सवाल
एक ओर सरकार पर्वतीय क्षेत्रों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर पुरोला जैसे महत्वपूर्ण अस्पताल से अनुभवी चिकित्सकों का स्थानांतरण और सीमांत लिवाड़ी स्वास्थ्य केंद्र में वर्षों से डॉक्टरों की अनुपलब्धता स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर सामने रख रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि शीघ्र प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो दूरस्थ क्षेत्रों के हजारों लोगों को इलाज के लिए और अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।






